Kabhi yu mile koi maslehat

कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो
मुझे अपनी कोई ख़बर न हो, तुझे अपना कोई पता न हो

वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन
वो ग़ुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिलो-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं
मगर उस नगर में न क़ैद कर, जहाँ ज़िन्दगी का हवा न हो

वो हज़ारों बाग़ों का बाग़ हो, तेरी बरक़तों की बहार से
जहाँ कोई शाख़ हरी न हो, जहाँ कोई फूल खिला न हो

तेरे इख़्तियार में क्या नहीं, मुझे इस तरह से नवाज़ दे
यूँ दुआयें मेरी क़ुबूल हों, मेरे दिल में कोई दुआ न हो

कभी हम भी जिस के क़रीब थे, दिलो-जाँ से बढ़कर अज़ीज़ थे
मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला न हो

Bashir badr

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Wasl

वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिये

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Ishq

इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले 
मौत की राह नहीं देखते मरने वाले 

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Sarakti jaye hai rukh se nakab

सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता 
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता-आहिस्ता 

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा 
हया यकलख़त आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता 

शब-ए-फ़ुर्कत का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो 
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता 

सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना 
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता 

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतना 
इधर तो जल्दी जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता 

वो बेदर्दी से सर काटे ‘अमीर’ और मैं कहूँ उन से 
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता

Amir minai

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Sarakti jaye hai rukh se nakab

सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता 
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता-आहिस्ता 

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा 
हया यकलख़त आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता 

शब-ए-फ़ुर्कत का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो 
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता 

सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना 
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता 

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतना 
इधर तो जल्दी जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता 

वो बेदर्दी से सर काटे ‘अमीर’ और मैं कहूँ उन से 
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता

Amir minai

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