Ishq

इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले 
मौत की राह नहीं देखते मरने वाले 

Posted by | View Post | View Group

Sarakti jaye hai rukh se nakab

सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता 
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता-आहिस्ता 

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा 
हया यकलख़त आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता 

शब-ए-फ़ुर्कत का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो 
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता 

सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना 
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता 

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतना 
इधर तो जल्दी जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता 

वो बेदर्दी से सर काटे ‘अमीर’ और मैं कहूँ उन से 
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता

Amir minai

Posted by | View Post | View Group

Sarakti jaye hai rukh se nakab

सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता 
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता-आहिस्ता 

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा 
हया यकलख़त आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता 

शब-ए-फ़ुर्कत का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो 
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता 

सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना 
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता 

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतना 
इधर तो जल्दी जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता 

वो बेदर्दी से सर काटे ‘अमीर’ और मैं कहूँ उन से 
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता

Amir minai

Posted by | View Post | View Group

Us ki hasrat hai jise dil se mita bhi na sakun

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ
ढूँढने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ

डाल कर ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा
कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी के मिटा भी न सकूँ

ज़ब्त  कमबख़्त ने और आ के गला घोंटा है
के उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ

उस के पहलू में जो ले जा के सुला दूँ दिल को
नींद ऐसी उसे आए के जगा भी न सकूँ

नक्श-ऐ-पा देख तो लूँ लाख करूँगा सजदे
सर मेरा अर्श नहीं है कि झुका भी न सकूँ

बेवफ़ा लिखते हैं वो अपनी कलम से मुझ को
ये वो किस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ

इस तरह सोये हैं सर रख के मेरे जानों पर
अपनी सोई हुई किस्मत को जगा भी न सकूँ 

Amir minai

Posted by | View Post | View Group

Ab ke rut badli to

अब के रुत बदली तो ख़ुशबू का सफ़र देखेगा कौन 
ज़ख़्म फूलों की तरह महकेंगे पर देखेगा कौन 

देखना सब रक़्स-ए-बिस्मल में मगन हो जाएँगे 
जिस तरफ़ से तीर आयेगा उधर देखेगा कौन 

वो हवस हो या वफ़ा हो बात महरूमी की है 
लोग तो फल-फूल देखेंगे शजर देखेगा कौन 

हम चिराग़-ए-शब ही जब ठहरे तो फिर क्या सोचना 
रात थी किस का मुक़द्दर और सहर देखेगा कौन 

आ फ़सील-ए-शहर से देखें ग़नीम-ए-शहर को 
शहर जलता हो तो तुझ को बाम पर देखेगा कौन

Ahmad faraz

Posted by | View Post | View Group

Faraz ab koi souda koi junun bhi nahi

“फ़राज़ अब कोई सौदा कोई जुनूँ भी नहीं 
मगर क़रार से दिन कट रहे हों यूँ भी नहीं 

लब-ओ-दहन भी मिला गुफ़्तगू का फ़न भी मिला 
मगर जो दिल पे गुज़रती है कह सकूँ भी नहीं 

मेरी ज़ुबाँ की लुक्नत से बदगुमाँ न हो 
जो तू कहे तो तुझे उम्र भर मिलूँ भी नहीं 

“फ़राज़” जैसे कोई दिया तुर्बत-ए-हवा चाहे है 
तू पास आये तो मुमकिन है मैं रहूँ भी नहीं
Ahmad faraz

Posted by | View Post | View Group