Khushbu

बस गई है मेरे अहसास में ये कैसी महक
कोई ख़ुशबू मैं लगाऊँ तेरी ख़ुशबू आए

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Naqab

नक़ाब उलटे हुए गुलशन से वो जब भी गुज़रता है समझ के फूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है!

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Khidki

ऐसा लगता हैं के वो भूल गया है हमको
अब कभी खिडकी का पर्दा नहीं बदला जाता

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Shayar

हम तो शायर हैं सियासत नहीं आती हमको
हम से मुंह देखकर लहजा नहीं बदला जाता

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Sab ke kehne se irada nahi badla jata

सब के कहने से इरादा नहीं बदला जाता
हर सहेली से दुपट्टा नहीं बदला जाता

हम तो शायर हैं सियासत नहीं आती हमको
हम से मुंह देखकर लहजा नहीं बदला जाता

हम फकीरों को फकीरी का नशा रहता हैं
वरना क्या शहर में शजरा* नहीं बदला जाता

ऐसा लगता हैं के वो भूल गया है हमको
अब कभी खिडकी का पर्दा नहीं बदला जाता

जब रुलाया हैं तो हसने पर ना मजबूर करो
रोज बीमार का नुस्खा नहीं बदला जाता

गम से फुर्सत ही कहाँ है के तुझे याद करू
इतनी लाशें हैं तो कान्धा नहीं बदला जाता

उम्र एक तल्ख़ हकीकत हैं दोस्तों फिर भी
जितने तुम बदले हो उतना नहीं बदला जाता

Munawwar rana

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Bulandi der tak kis shakhs ke hisse me rehti hai

 बुलंदी देर तक किस शख्श के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घडी खतरे में रहती है

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता,
मैं जब तक घर न लौटूं, मेरी माँ सज़दे में रहती है

जी तो बहुत चाहता है इस कैद-ए-जान से निकल जाएँ हम
तुम्हारी याद भी लेकिन इसी मलबे में रहती है

अमीरी रेशम-ओ-कमख्वाब में नंगी नज़र आई
गरीबी शान से एक टाट के परदे में रहती है

मैं इंसान हूँ बहक जाना मेरी फितरत में शामिल है
हवा भी उसको छू के देर तक नशे में रहती है

मोहब्बत में परखने जांचने से फायदा क्या है
कमी थोड़ी बहुत हर एक के शज़र* में रहती है

ये अपने आप को तकसीम* कर लेते है सूबों में
खराबी बस यही हर मुल्क के नक़्शे में रहती है

-Munawwar Rana

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Raat aankho me dhali

रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनूँ आए
हम हवाओं की तरह जाके उसे छू आए

बस गई है मेरे अहसास में ये कैसी महक
कोई ख़ुशबू में लगाऊँ तेरी ख़ुशबू आए

उसने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया
मुद्दतों बाद मेरी आँखों में आँसू आए

मेरा आईना भी अब मेरी तरह पागल है
आईना देखने जाऊँ तो नज़र तू आए

किस तकल्लुफ़ से गले मिलने का मौसम आया
कुछ काग़ज़ के फूल लिए काँच के बाजू आए

उन फ़कीरों को ग़ज़ल अपनी सुनाते रहियो
जिनकी आवाज़ में दरगाहों की ख़ुशबू आए

-Bashir Badr

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Raat aankho me dhali

रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनूँ आए
हम हवाओं की तरह जाके उसे छू आए

बस गई है मेरे अहसास में ये कैसी महक
कोई ख़ुशबू में लगाऊँ तेरी ख़ुशबू आए

उसने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया
मुद्दतों बाद मेरी आँखों में आँसू आए

मेरा आईना भी अब मेरी तरह पागल है
आईना देखने जाऊँ तो नज़र तू आए

किस तकल्लुफ़ से गले मिलने का मौसम आया
कुछ काग़ज़ के फूल लिए काँच के बाजू आए

उन फ़कीरों को ग़ज़ल अपनी सुनाते रहियो
जिनकी आवाज़ में दरगाहों की ख़ुशबू आए

-Bashir Badr

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Jidhar jate hai sab

जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता

जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता

मुझे पामाल* रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना, हामी भर लेना

बहुत हैं फ़ायदे इसमें मगर अच्छा नहीं लगता

मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है

किसी का भी हो सर, क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता

बुलंदी पर इन्हें मिट्टी की ख़ुशबू तक  नहीं आती

ये वो शाखें हैं जिनको अब शजर* अच्छा नहीं लगता

ये क्यूँ बाक़ी रहे आतिश-ज़नों*, ये भी जला डालो

कि सब बेघर हों और मेरा हो घर, अच्छा  नहीं लगता

– जावेद अख़्तर

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Ek jehar ke dariya ko

इक ज़हर के दरिया को दिन-रात बरतता हूँ ।
हर साँस को मैं, बनकर सुक़रात, बरतता हूँ ।

खुलते भी भला कैसे आँसू मेरे औरों पर,
हँस-हँस के जो मैं अपने हालात बरतता हूँ ।

कंजूस कोई जैसे गिनता रहे सिक्कों को,
ऐसे ही मैं यादों के लम्हात बरतता हूँ ।

मिलते रहे दुनिया से जो ज़ख्म मेरे दिल को,
उनको भी समझकर मैं सौग़ात, बरतता हूँ ।

कुछ और बरतना तो आता नहीं शे’रों में,
सदमात बरतता था, सदमात बरतता हूँ ।

सब लोग न जाने क्यों हँसते चले जाते हैं,
गुफ़्तार में जब अपनी जज़्बात बरतता हूँ ।

उस रात महक जाते हैं चाँद-सितारे भी,
मैं नींद में ख़्वाबों को जिस रात बरतता हूँ ।

बस के हैं कहाँ मेरी, ये फ़िक्र ये फ़न यारब !,
ये सब तो मैं तेरी ही ख़ैरात बरतता हूँ ।

दम साध के पढ़ते हैं सब ताज़ा ग़ज़ल मेरी,
किस लहजे में अबके मैं क्या बात बरतता हूँ ।

-Rajesh Reddy

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