Dikhayi diye yu ki bekhud kiya

फ़कीरान: आए, सदा कर चले
मियाँ ख़ुश रहो, हम दुआ कर चले

जो तुझ बिन, न जीने को कहते थे हम
सो इस ‘अहद को अब वफ़ा कर चले

शिफ़ा अपनी तक़दीर ही में न थी
कि मक़्दूर तक तो दवा कर चले

पड़े ऐसे अस्बाब पायान-ए-कार
कि नाचार यूँ जी जलाकर चले

वो क्या चीज़ है आह जिसके लिए
हर इक चीज़ से दिल उठाकर चले

कोई ना-उमीदान: करते निगाह
सो तुम हम से मुँह भी छुपाकर चले

बहुत आरज़ू थी गली की तिरी
सो याँ से लहू में नहा कर चले

दिखाई दिए यूँ, कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले

ज़बीं सजद: करते ही करते गई
हक़-ए-बंदगी हम अदा कर चले

परस्तिश की याँ तक, कि अय बुत तुझे
नज़र में सभू की ख़ुदा कर चले

झड़े फूल जिस रंग गुलबुन से यूँ
चमन में जहाँ के हम आकर चले

न देखा ग़म-ए-दोस्ताँ शुक्र है
हमीं दाग़ अपना दिखाकर चले

गई उम्र दर-बंद-ए-फ़िक्र-ए-ग़ज़ल
सो इस फ़न को ऐसा बड़ा कर चले

कहें क्या जो पूछे कोई हमसे, मीर
जहाँ में तुम आए थे, क्या कर चले

-मीर तक़ी मीर

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Jin jin ko tha yeh ishq ka aazar

जिन जिन को था यह `इश्क़ का आज़ार, मर गए
अक्सर हमारे साथ के बीमार मर गए

होता नहीं है उस लब-ए-नौ-ख़त पे कोई सब्ज़
ईसा-ओ-ख़िज़्र क्या सभी यक बार मर गए

यूँ कानों कान गुल ने न जाना चमन में, आह
सर को पटक के हम, पस-ए-दीवार मर गए

सद कारवाँ वफ़ा है, कोई पूछता नहीं
गोया मता-ए-दिल के ख़रीदार मर गए

मजनूँ न दश्त में है, न फ़रहाद कोह में
था जिन से लुत्फ़-ए-ज़िन्दगी, वे यार मर गए

गर ज़िन्दगी यही है, जो करते हैं हम असीर
तो वे ही जी गए, जो गिरफ़्तार मर गए

अफ़सोस वे शहीद कि जो क़त्ल-गाह में
लगते ही उस के हाथ की तलवार मर गए

तुझ से दो-चार होने की हसरत के मुब्तिला
जब जी हुआ वबाल तो नाचार मर गए

घबरा न मीर इश्क़ में उस सहल-ए-ज़ीस्त पर
जब बस चला न कुछ तो मिरे यार मर गए

-मीर तक़ी मीर

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Hasti Apni Hubab ki si hai

हस्ती अपनी, हुबाब की सी है
यह नुमाइश, सराब की सी है

नाज़ुकी उस के लब की, क्या कहिए
पंखड़ी इक गुलाब की सी है

चश्म-ए-दिल खोल इस भी आलम पर
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है

बार-बार उस के दर प जाता हूँ
हालत अब इज़्तिराब की सी है

नुक़्ता-ए-ख़ाल से तिरा अबरू
बैत इक इन्तिख़ाब की सी है

मैं जो बोला, कहा कि यह आवाज़
उसी ख़ान:ख़राब की सी है

आतिश-ए-ग़म में दिल भुना शायद
देर से बू कबाब की सी है

देखिये अब्र की तरह, अब के
मेरी चश्म-ए-पुर-आब की सी है

मीर, उन नीमबाज़ आँखों में
सारी मस्ती, शराब की सी है

-मीर तक़ी मीर

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Rah-e-daur-e-ishq me

राह-ए-दौर-ए-इश्क़ में, रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या

क़ाफ़िले में सुब्ह के, इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले, सोता है क्या

सब्ज़ होती ही नहीं, यह सरज़मीं
तुख़्म-ए-ख़्वाहिश, दिल में तू बोता है क्या

यह निशान-ए-‘इश्क़ हैं, जाते नहीं
दाग़ छाती के `अबस, धोता है क्या

ग़ैरत-ए-युसुफ़ है, ये वक़्त-ए-‘अज़ीज़
मीर, इसको रायगाँ खोता है क्या

-मीर तक़ी मीर

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Ulti Ho Gayi Sab Tadbire

उलटी हो गई सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया
देखा, इस बीमारि-ए-दिल ने, आख़िर काम तमाम किया

‘अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद
यानि रात बहुत थे जागे, सुबह हुई आराम किया

हर्फ़ नहीं जां-बख़्शी में उस की, ख़ूबी अपनी क़िस्मत की
हम से जो पहले कह भेजा, सो मरने का पैग़ाम किया

नाहक़ हम मजबूरों पर, ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं, हमको अबस बदनाम किया

सारे रिन्द, औबाश, जहाँ के, तुझसे सुजूद में रहते हैं
बाँके, टेढ़े, तिरछे, तीखे, सब का तुझको इमाम किया

सरज़द हम से बेअदबी तो वहशत में भी कम ही हुई
कोसों उस की ओर गए, पर सिज्द: हर हर गाम किया

किसका का’ब:, कैसा क़िब्ल:, कौन हरम है, क्या अहराम
कूचे के, उसके, बाशिन्दों ने, सबको यहीं से सलाम किया

शेख़ जो है मसजिद में नंगा, रात को था मैख़ाने में
जुब्ब:, ख़िरक़:, कुरता, टोपी, मस्ती में इन`आम किया

काश अब बुर्क़: मुंह से उठा दे, वरन: फिर क्या हासिल है
आँख मुंदे पर उन ने गो, दीदार को अपने `आम किया

याँ के सपेद-ओ-सियह में हमको, दख़्ल जो है सो इतना है
रात को रो-रो सुबह किया, या दिन को जूँ तूँ शाम किया

सुबह, चमन में उस को कहीं, तकलीफ़-ए हवा ले आई थी
रुख़ से गुल को मोल लिया, क़ामत से सर्व ग़ुलाम किया

साइद-ए-सीमीं दोनों उसके, हाथ में लाकर छोड़ दिए
भूले उसके क़ौल-ओ-क़सम, पर हाय ख़याल-ए-ख़ाम किया

काम हुए हैं, सारे ज़ाय’अ, हर सा`अत की समाजत से
इस्तिग़ना की चौगुनी उनने, जूँ जूँ मैं इब्राम किया

ऐसे आहू-ए-रम ख़ुर्द: की, वहशत खोनी मुश्किल थी
सिह्र किया, एजाज़ किया, जिन लोगों ने तुझको राम किया

मीर के दीन-ओ-मज़हब को, अब पूछते क्या हो, उनने तो
क़श्क़: खेंचा, दैर में बैठा, कब का तर्क इस्लाम किया

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मेहँदी हसन साहब की आवाज में सुने ये ग़ज़ल

 

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