Aaj ki raat bahut garm hawa chalti hai

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी,
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी ।

ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थी,
पाँव जब टूटती शाखों से उतारे हमने,
इन मकानों को ख़बर है न, मकीनों को ख़बर
उन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हमने ।

हाथ ढलते गए साँचों में तो थकते कैसे,
नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हमने,
की ये दीवार बुलन्द, और बुलन्द, और बुलन्द,
बाम-ओ-दर और ज़रा और निखारे हमने ।

आँधियाँ तोड़ लिया करतीं थीं शामों की लौएँ,
जड़ दिए इस लिए बिजली के सितारे हमने,
बन गया कस्र  तो पहरे पे कोई बैठ गया,
सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश -ए-तामीर  लिए ।

अपनी नस-नस में लिए मेहनत-ए-पैहम की थकन,
बन्द आँखों में इसी कस्र  की तस्वीर लिए,
दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक,
रात आँखों में खटकती है सियाह तीर लिए ।

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी,
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी ।

Kaifi azmi

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Aza main behte the aansu yaha lahu to nahi

अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ, लहू तो नहीं 
ये कोई और जगह है ये लखनऊ तो नहीं 

यहाँ तो चलती हैं छुरिया ज़ुबाँ से पहले 
ये मीर अनीस की, आतिश की गुफ़्तगू तो नहीं 

चमक रहा है जो दामन पे दोनों फ़िरक़ों के 
बग़ौर देखो ये इस्लाम का लहू तो नहीं

Kaifi azmi

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Ab tum aagosh a tasavvur mein bhi aaya na karo

अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो 
मुझ से बिखरे हुये गेसू नहीं देखे जाते 
सुर्ख़ आँखों की क़सम काँपती पलकों की क़सम 
थर-थराते हुये आँसू नहीं देखे जाते 

अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो 
छूट जाने दो जो दामन-ए-वफ़ा छूट गया 
क्यूँ ये लग़ज़ीदा ख़रामी ये पशेमाँ नज़री
तुम ने तोड़ा नहीं रिश्ता-ए-दिल टूट गया 

अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो 
मेरी आहों से ये रुख़सार न कुम्हला जायें 
ढूँढती होगी तुम्हें रस में नहाई हुई रात 
जाओ कलियाँ न कहीं सेज की मुरझा जायें 

अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो 
मैं इस उजड़े हुये पहलू में बिठा लूँ न कहीं 
लब-ए-शीरीं  का नमक आरिज़-ए-नमकीं की मिठास 
अपने तरसे हुये होंठों में चुरा लूँ न कहीं

Kaifi azmi

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हमें आप भूल भी जाओ तो कोई गम नहीं…….जिस दिन…

हमें आप भूल भी जाओ तो कोई गम नहीं…….जिस
दिन हम याद न करे तुम्हे तो समझ जाना हम नहीं।

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कभी कभी इतनी शिद्दत से…उस की याद आती है, मैं…

कभी कभी इतनी शिद्दत से…उस की याद आती है,
मैं पलकों को मिलाता हू…तो आंखे भीग जाती है…!!

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शाम ढलते ही तेरी याद कुछ यु मुलाकात को आये…

शाम ढलते ही तेरी याद कुछ यु मुलाकात को आये ,
जैसे दरवेश कोई गलियों में जुम्मे-रात को आये..!!

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जाट बैठे सड़कां पैं, अर पुलिस पड़ी सै थाणा मैं।।…

जाट बैठे सड़कां पैं, अर पुलिस पड़ी सै थाणा मैं।।
भूल कै भी बड़ मत जाईयो, इस बखत हरयाणे मैं।।
#Haryana_Tourism

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Fool ke baad falna jaroori laga

फूल के बाद फलना ज़रूरी लगा,
भूमिकाएँ बदलना ज़रूरी लगा।
दर्द ढलता रहा आँसुओं में मगर
दर्द शब्दों में ढलना ज़रूरी लगा।
‘कूपमंडूक’ छवि को नमस्कार कर,
घर से बाहर निकलना ज़रूरी लगा।
अपने द्वंद्वों से दो-चार होते हुए,
हिम की भट्टी में जलना ज़रूरी लगा।
मोमबत्ती से उजियारे की चाह में,
मोम बन कर पिघलना ज़रूरी लगा।
उनके पैरों से चलकर न मंज़िल मिली,
अपने पाँवों पे चलना ज़रूरी लगा।
आदमीयत की रक्षा के परिप्रेक्ष्य में
विश्व-युद्धों का टलना ज़रूरी लगा।

Zaheer quraishi

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Muskurana bhi ek chumbak hai

मुस्कुराना भी एक चुम्बक है,
मुस्कुराओ, अगर तुम्हें शक है!
उसको छू कर कभी नहीं देखा,
उससे सम्बन्ध बोलने तक है।
डाक्टर की सलाह से लेना,
ये दवा भी ज़हर-सी घातक है।
दिन में सौ बार खनखनाती है
एक बच्चे की बंद गुल्लक है।
उससे उड़ने की बात मत करना,
वो जो पिंजरे में अज बंधक है।
हक्का-बक्का है बेवफ़ा पत्नी,
पति का घर लौटना अचानक है!
‘स्वाद’ को पूछना है ‘बंदर’ से,
जिसके हाथ और मुँह में अदरक है।

Zaheer quraishi

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