Jhuki jhuki se nazar bekarar hai ki nahi

झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं 
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं 

तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता 
मेरी तरह तेरा दिल बेक़रार है कि नहीं 

वो पल के जिस में मुहब्बत जवान होती है 
उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं 

तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को 
तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है कि नहीं

Kaifi azmi

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Dosheeza malin

लो पौ फटी वह छुप गई तारों की अंज़ुमन
लो जाम-ए-महर से वह छलकने लगी किरन

खुपने लगा निगाह में फितरत का बाँकपन
जलवे ज़मीं पे बरसे ज़मीं बन गई दुल्हन

गूँजे तराने सुबह के इक शोर हो गया
आलम तमाम रस में सराबोर हो गया

फूली शफ़क फ़ज़ा में हिना तिलमिला गई
इक मौज़-ए-रंग काँप के आलम पे छा गई

कुल चाँदनी सिमट के गिलो में समा गई
ज़र्रे बने नुजूम ज़मीं जगमगा गई

छोड़ा सहर ने तीरगी-ए-शब को काट के
उड़ने लगी हवा में किरन ओस चाट के

मचली जबीने-शर्क पे इस तरह मौज-ए-नूर
लहरा के तैरने लगी आलम में बर्क-ए-तूर

उड़ने लगी शमीय छलकने लगा सुरूर
खिलने लगे शिगूके चहकने लगे तयूर

झोंके चले हवा के शजर झूमने लगे
मस्ती में फूल काँटों का मुँह चूमने लगे

थम थम के जूफ़िशाँ हुआ ज़र्रों पे आफ़ताब
छिड़का हवा ने सब्जा-ए-ख्वाबीदा पर गुलाब

मुरझायी पत्तियों में मचलने लगा शबाब
लर्ज़िश हुई गुलों में बरसने लगी शराब

रिन्दाने-मस्त और भी बदमस्त हो गये
थर्रा के होंठ ज़ाम में पेवस्त हो गये

दोशीज़ा एक खुशकदो-खुशरंगो-खूबरू
मालिन की नूरे-दीद गुलिस्ताँ की आबरू

महका रही है फूलों से दामान-ए-आरजू
तिफ़ली लिये है गोद में तूफ़ाने-रंगो-बू

रंगीनियों में खेली, गुलों में पली हुई
नौरस कली में कौसे-कज़ह है ढली हुई

मस्ती में रुख पे बाल-ए-परीशाँ किये हुये
बादल में शमा-ए-तूर फ़रोज़ाँ किये हुये

हर सिम्त नक्शे-पा से चरागाँ किये हुये
आँचल को बारे-गुल से गुलिस्ताँ किये हुये

लहरा रही है बादे-सहर पाँव चूम के
फिरती है तीतरी सी गज़ब झूम झूम के

ज़ुल्फ़ों में ताबे-सुंबुले-पेचाँ लिये हुये
आरिज़ पे शोख रंगे-गुलिस्ताँ लिये हुये

आँखों में बोलते हुये अरमाँ लिये हुये
होठों पे आबे-लाले-बदख्शाँ लिये हुये

फितरत ने तौल तौल के चश्मे-कबूल में
सारा चमन निचोड़ दिया एक फूल में

ऐ हुस्ने-बेनियाज़ खुदी से न काम ले
उड़ कर शमीमे-गुल कहीं आँचल न थाम ले

कलियों का ले पयाम गुलों का सलाम ले
कैफ़ी से हुस्ने-दोस्त का ताज़ा कलाम ले

शाइर का दिल है मुफ़्त में क्यों दर्दमंद हो
इक गुल इधर भी नज़्म अगर यह पसंद हो

Kaifi azmi

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Do pehar

ये जीत-हार तो इस दौर का मुक्द्दर है
ये दौर जो के पुराना नही नया भी नहीं
ये दौर जो सज़ा भी नही जज़ा भी नहीं
ये दौर जिसका बा-जहिर कोइ खुदा भी नहीं

तुम्हारी जीत अहम है ना मेरी हार अहम
के इब्तिदा भी नहीं है ये इन्तेहा भी नहीं
शुरु मारका-ए-जान अभी हुआ भी नहीं
शुरु तो ये हंगाम-ए-फ़ैसला भी नहीं

पयाम ज़ेर-ए-लब अब तक है सूर-ए-इसराफ़ील
सुना किसी ने किसी ने अभी सुना भी नहीं
किया किसी ने किसी ने यकीं किया भी नहीं
उठा जमीं से कोई, कोई उठा भी नहीं

कदम कदम पर दिया है रहज़नों ने फ़रेब
के अब निगाह मे तौकीर-ए-रहनुमा भी नहीं
उसे समझते है मंजिल जो रास्ता भी नहीं
वहाँ लगाते हैं डेरा जहाँ वफ़ा भी नही

ये कारवाँ है तो अनज़ाम-ए-कारवाँ मालूम
के अजनबी भी नहीं कोई आशना भी नहीं
किसी से खुश भी नहीं कोई खफ़ा भी नहीं
किसी का हाल मुड़ कर कोइ पूछता भी नहीं

Kaifi azmi

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Roz badhta hoon jahan se aage

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे 
फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ 
बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को 
इन्हीं दीवारों से टकराता हूँ 
रोज़ बसते हैं कई शहर नये 
रोज़ धरती में समा जाते हैं 
ज़लज़लों में थी ज़रा सी गिरह 
वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं 

जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत 
न कहीं धूप न साया न सराब 
कितने अरमाँ है किस सहरा में 
कौन रखता है मज़ारों का हिसाब 
नफ़्ज़ बुझती भी भड़कती भी है 
दिल का मामूल है घबराना भी 
रात अँधेरे ने अँधेरे से कहा 
इक आदत है जिये जाना भी 

क़ौस एक रंग की होती है तुलू’अ 
एक ही चाल भी पैमाना भी 
गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद 
मुश्किल क्या हो गई मयख़ाने की 
कोई कहता था समंदर हूँ मैं 
और मेरी जेब में क़तरा भी नहीं 
ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ 
अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं 

अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ 
कभी क़ुरान कभी गीता की तरह 
चंद रेखाओं में समाऊँ मैं 
ज़िन्दगी क़ैद है सीता की तरह 
राम कब लौटेंगे मालूम नहीं 
काश रावन ही कोई आ जाता 

Kaifi azmi

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फना हो कर मोहब्बत करूँ या बेपनाह मोहब्बत करूँ बता…

फना हो कर मोहब्बत करूँ या बेपनाह मोहब्बत करूँ
बता तुझे कैसी मोहब्बत पसन्द है, तुझे वैसे मोहब्बत करूँ..!!!

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Dastoor kya ye shahere sitamgar ke ho gaye

दस्तूर क्या ये शहरे-सितमगर के हो गए ।
जो सर उठा के निकले थे बे सर के हो गए ।

ये शहर तो है आप का, आवाज़ किस की थी
देखा जो मुड़ के हमने तो पत्थर के हो गए ।

जब सर ढका तो पाँव खुले फिर ये सर खुला
टुकड़े इसी में पुरखों की चादर के हो गए ।

दिल में कोई सनम ही बचा, न ख़ुदा रहा
इस शहर पे ज़ुल्म भी लश्कर के हो गए ।

हम पे बहुत हँसे थे फ़रिश्ते सो देख लें
हम भी क़रीब गुम्बदे-बेदर  के हो गए ।

Kaifi azmi

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Tum pareshan na ho

तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा
इसी कूचे में जहां चांद उगा करते थे
शब-ए-तारीक गुज़ारूंगा चला जाऊंगा

रास्ता भूल गया या यहां मंज़िल है मेरी
कोई लाया है या ख़ुद आया हूं मालूम नहीं
कहते हैं कि नज़रें भी हसीं होती हैं
मैं भी कुछ लाया हूं क्या लाया मालूम नहीं

यूं तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब कुछ बेच आया
कहीं इनाम मिला और कहीं क़ीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा है
देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं

फिर भी इक राह में सौ तरह के मोड़ आते हैं
काश तुम को कभी तन्हाई का एहसास न हो
काश ऐसा न हो ग़ैर-ए-राह-ए-दुनिया तुम को
और इस तरह कि जिस तरह कोई पास न हो

आज की रात जो मेरी तरह तन्हा है
मैं किसी तरह गुज़ारूंगा चला जाऊंगा
तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा

Kaifi azmi

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Tum pareshan na ho

तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा
इसी कूचे में जहां चांद उगा करते थे
शब-ए-तारीक गुज़ारूंगा चला जाऊंगा

रास्ता भूल गया या यहां मंज़िल है मेरी
कोई लाया है या ख़ुद आया हूं मालूम नहीं
कहते हैं कि नज़रें भी हसीं होती हैं
मैं भी कुछ लाया हूं क्या लाया मालूम नहीं

यूं तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब कुछ बेच आया
कहीं इनाम मिला और कहीं क़ीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा है
देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं

फिर भी इक राह में सौ तरह के मोड़ आते हैं
काश तुम को कभी तन्हाई का एहसास न हो
काश ऐसा न हो ग़ैर-ए-राह-ए-दुनिया तुम को
और इस तरह कि जिस तरह कोई पास न हो

आज की रात जो मेरी तरह तन्हा है
मैं किसी तरह गुज़ारूंगा चला जाऊंगा
तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा

Kaifi azmi

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Tum itna jo muskura rahe ho

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो 
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो 

आँखों में नमी हँसी लबों पर 
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो 

बन जायेंगे ज़हर पीते पीते 
ये अश्क जो पीते जा रहे हो 

जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है 
तुम क्यों उन्हें छेड़े जा रहे हो 

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर 
रेखाओं से मात खा रहे हो 

Kaifi azmi

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Tum itna jo muskura rahe ho

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो 
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो 

आँखों में नमी हँसी लबों पर 
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो 

बन जायेंगे ज़हर पीते पीते 
ये अश्क जो पीते जा रहे हो 

जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है 
तुम क्यों उन्हें छेड़े जा रहे हो 

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर 
रेखाओं से मात खा रहे हो 

Kaifi azmi

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