Aankhon ka tha kusoor na dil ka kusoor tha

आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था
आया जो मेरे सामने मेरा ग़ुरूर था

वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था
आता न था नज़र को नज़र का क़ुसूर था

कोई तो दर्दमंदे-दिले-नासुबूर था
माना कि तुम न थे, कोई तुम-सा ज़रूर था

लगते ही ठेस टूट गया साज़े-आरज़ू
मिलते ही आँख शीशा-ए-दिल चूर-चूर था

ऐसा कहाँ बहार में रंगीनियों का जोश
शामिल किसी का ख़ूने-तमन्ना  ज़रूर था

साक़ी की चश्मे-मस्त का क्या कीजिए बयान
इतना सुरूर था कि मुझे भी सुरूर था

जिस दिल को तुमने लुत्फ़ से अपना बना लिया
उस दिल में इक छुपा हुआ नश्तर ज़रूर था

देखा था कल ‘जिगर’ को सरे-राहे-मैकदा
इस दर्ज़ा पी गया था कि नश्शे में चूर था

Jigar moradabadi

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Muhabbat mein kya kya mukam aa rahe hai

मोहब्बत में क्या-क्या मुक़ाम आ रहे हैं
कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं

ये कह-कह के हम दिल को बहला रहे हैं
वो अब चल चुके हैं वो अब आ रहे हैं

वो अज़-ख़ुद ही नादिम हुए जा रहे हैं
ख़ुदा जाने क्या ख़याल आ रहे हैं

हमारे ही दिल से मज़े उनके पूछो
वो धोके जो दानिस्ता हम खा रहे हैं

जफ़ा करने वालों को क्या हो गया है
वफ़ा करके हम भी तो शरमा रहे हैं

वो आलम है अब यारो-अग़ियार कैसे
हमीं अपने दुश्मन हुए जा रहे हैं

मिज़ाजे-गिरामी की हो ख़ैर यारब
कई दिन से अक्सर वो याद आ रहे हैं

Jigar moradabadi

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Dil ko sukoon rooh ko aaram aa gaya

दिल को सुकून रूह को आराम आ गया 
मौत आ गयी कि दोस्त का पैगाम आ गया 

जब कोई ज़िक्रे-गर्दिशे-अय्याम आ गया 
बेइख्तियार लब पे तिरा नाम आ गया 

दीवानगी हो, अक्ल हो, उम्मीद हो कि यास 
अपना वही है वक़्त पे जो काम आ गया

दिल के मुआमलात में नासेह ! शिकस्त क्या 
सौ बार हुस्न पर भी ये इल्ज़ाम आ गया 

सैयाद शादमां है मगर ये तो सोच ले 
मै आ गया कि साया तहे – दाम आ गया 

दिल को न पूछ मार्काए – हुस्नों – इश्क़ में
क्या जानिये गरीब कहां काम आ गया 

ये क्या मुक़ामे-इश्क़ है ज़ालिम कि इन दिनों 
अक्सर तिरे बगैर भी आराम आ गया

Jigar moradabadi

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Na jan dil banegi na dil jaan hoga

न जाँ दिल बनेगी न दिल जान होगा
ग़मे-इश्क़ ख़ुद अपना उन्वान होगा

ठहर ऐ दिले-दर्दमंदे-मोहब्बत
तसव्वुर किसी का परेशान होगा

मेरे दिल में भी इक वो सूरत है पिन्हाँ
जहाँ हम रहेंगे ये सामान होगा

गवारा नहीं जान देकर भी दिल को
तिरी इक नज़र का जो नुक़सान हेगा

चलो देख आएँ `जिगर’ का तमाशा
सुना है वो क़ाफ़िर मुसलमान होगा

Jigar moradabadi

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Wo adaye dilbari ho ki nawae aashikana

वो अदाए-दिलबरी हो कि नवाए-आशिक़ाना।
जो दिलों को फ़तह कर ले, वही फ़ातहेज़माना॥

कभी हुस्न की तबीयत न बदल सका ज़माना।
वही नाज़े-बेनियाज़ी वही शाने-ख़ुसरवाना॥

मैं हूँ उस मुक़ाम पर अब कि फ़िराक़ोवस्ल कैसे?
मेरा इश्क़ भी कहानी, तेरा हुस्न भी फ़साना॥

तेरे इश्क़ की करामत यह अगर नहीं तो क्या है।
कभी बेअदब न गुज़रा, मेरे पास से ज़माना॥

मेरे हमसफ़ीर बुलबुल! मेरा-तेरा साथ ही क्या?
मैं ज़मीरे-दश्तोदरिया तू असीरे-आशियाना॥

तुझे ऐ ‘जिगर’! हुआ क्या कि बहुत दिनों से प्यारे।
न बयाने-इश्को़-मस्ती न हदीसे-दिलबराना॥

Jigar moradabadi

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Zarron se baate karte hai diwarodar se ham

ज़र्रों से बातें करते हैं दीवारोदर से हम।
मायूस किस क़दर है, तेरी रहगुज़र से हम॥

कोई हसीं हसीं ही ठहरता नहीं ‘जिगर’।
बाज़ आये इस बुलन्दिये-ज़ौक़े-नज़र से हम॥

इतनी-सी बात पर है बस इक जंगेज़रगरी।
पहले उधर से बढ़ते हैं वो या इधर से हम॥

Jigar moradabadi

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Aa ki tujh bin is tarah e dost ghabrata hoo main

आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त! घबराता हूँ मैं।
जैसे हर शै में किसी शै की कमी पाता हूँ मैं॥

कू-ए-जानाँ की हवा तक से भी थर्राता हूँ मैं।
क्या करूँ बेअख़्तयाराना चला जाता हूँ मैं॥

मेरी हस्ती शौक़-ए-पैहम, मेरी फ़ितरत इज़्तराब।
कोई मंज़िल हो मगर गुज़रा चला जाता हूँ मैं॥

Jigar moradabadi

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Agar na zohra jabino ke darmiyan guzre

अगर न ज़ोहरा जबीनों के दरमियाँ गुज़रे 
तो फिर ये कैसे कटे ज़िन्दगी कहाँ गुज़रे 

जो तेरे आरिज़-ओ-गेसू के दरमियाँ गुज़रे 
कभी-कभी तो वो लम्हे बला-ए-जाँ गुज़रे 

मुझे ये वहम रहा मुद्दतों के जुर्रत-ए-शौक़ 
कहीं ना ख़ातिर-ए-मासूम पर गिराँ गुज़रे 

हर इक मुक़ाम-ए-मोहब्बत बहुत ही दिल-कश था 
मगर हम अहल-ए-मोहब्बत कशाँ-कशाँ गुज़रे 

जुनूँ के सख़्त मराहिल भी तेरी याद के साथ 
हसीं-हसीं नज़र आये जवाँ-जवाँ गुज़रे 

मेरी नज़र से तेरी जुस्तजू के सदक़े में 
ये इक जहाँ ही नहीं सैकड़ों जहाँ गुज़रे 

हजूम-ए-जल्वा में परवाज़-ए-शौक़ क्या कहना 
के जैसे रूह सितारों के दरमियाँ गुज़रे 

ख़ता मु’आफ़ ज़माने से बदगुमाँ होकर 
तेरी वफ़ा पे भी क्या क्या हमें गुमाँ गुज़रे 

ख़ुलूस जिस में हो शामिल वो दौर-ए-इश्क़-ओ-हवस 
नारैगाँ कभी गुज़रा न रैगाँ गुज़रे 

इसी को कहते हैं जन्नत इसी को दोज़ख़ भी 
वो ज़िन्दगी जो हसीनों के दरमियाँ गुज़रे 

बहुत हसीन सही सुहबतें गुलों की मगर 
वो ज़िन्दगी है जो काँटों के दरमियाँ गुज़रे 

मुझे था शिक्वा-ए-हिज्राँ कि ये हुआ महसूस 
मेरे क़रीब से होकर वो नागहाँ गुज़रे 

बहुत हसीन मनाज़िर भी हुस्न-ए-फ़ितरत के 
न जाने आज तबीयत पे क्यों गिराँ गुज़रे 

मेरा तो फ़र्ज़ चमन बंदी-ए-जहाँ है फ़क़त 
मेरी बला से बहार आये या ख़िज़ाँ गुज़रे 

कहाँ का हुस्न कि ख़ुद इश्क़ को ख़बर न हुई 
राह-ए-तलब में कुछ ऐसे भी इम्तहाँ गुज़रे 

भरी बहार में ताराजी-ए-चमन मत पूछ 
ख़ुदा करे न फिर आँखों से वो समाँ गुज़रे 

कोई न देख सका जिनको दो दिलों के सिवा 
मु’आमलात कुछ ऐसे भी दरमियाँ गुज़रे 

कभी-कभी तो इसी एक मुश्त-ए-ख़ाक के गिर्द 
तवाफ़ करते हुये हफ़्त आस्माँ गुज़रे 

बहुत अज़ीज़ है मुझको उन्हीं की याद “जिगर” 
वो हादसात-ए-मोहब्बत जो नागहाँ गुज़रे

Jigar moradabadi

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Shyer e fitrat hoo main jab fikr farmata hoo main

शायर-ए-फ़ितरत हूँ मैं जब फ़िक्र फ़र्माता हूँ मैं 
रूह बन कर ज़र्रे-ज़र्रे में समा जाता हूँ मैं 

आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं 
जैसे हर शै में किसी शै की कमी पाता हूँ मैं 

जिस क़दर अफ़साना-ए-हस्ती को दोहराता हूँ मैं 
और भी बेग़ाना-ए-हस्ती हुआ जाता हूँ मैं 

जब मकान-ओ-लामकाँ सब से गुज़र जाता हूँ मैं 
अल्लाह-अल्लाह तुझ को ख़ुद अपनी जगह पाता हूँ मैं 

हाय री मजबूरियाँ तर्क-ए-मोहब्बत के लिये 
मुझ को समझाते हैं वो और उन को समझाता हूँ मैं 

मेरी हिम्मत देखना मेरी तबीयत देखना 
जो सुलझ जाती है गुत्थी फिर से उलझाता हूँ मैं 

हुस्न को क्या दुश्मनी है इश्क़ को क्या बैर है 
अपने ही क़दमों की ख़ुद ही ठोकरें खाता हूँ मैं 

तेरी महफ़िल तेरे जल्वे फिर तक़ाज़ा क्या ज़रूर 
ले उठा जाता हूँ ज़ालिम ले चला जाता हूँ मैं 

वाह रे शौक़-ए-शहादत कू-ए-क़ातिल की तरफ़ 
गुनगुनाता रक़्स करता झूमता जाता हूँ मैं 

देखना उस इश्क़ की ये तुर्फ़ाकारी देखना 
वो जफ़ा करते हैं मुझ पर और शर्माता हूँ मैं 

एक दिल है और तूफ़ान-ए-हवादिस ऐ “ज़िगर” 
एक शीशा है कि हर पत्थर से टकराता हूँ मैं

Jigar moradabadi

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Tujhi se ibtda hai

तुझी से इब्तदा है तू ही इक दिन इंतहा होगा 
सदा-ए-साज़ होगी और न साज़-ए-बेसदा होगा 

हमें मालूम है हम से सुनो महशर में क्या होगा 
सब उस को देखते होंगे वो हमको देखता होगा 

सर-ए-महशर हम ऐसे आसियों का और क्या होगा 
दर-ए-जन्नत न वा होगा दर-ए-रहमत तो वा होगा 

जहन्नुम हो कि जन्नत जो भी होगा फ़ैसला होगा 
ये क्या कम है हमारा और उस का सामना होगा 

निगाह-ए-क़हर पर ही जान-ओ-दिल सब खोये बैठा है 
निगाह-ए-मेहर आशिक़ पर अगर होगी तो क्या होगा 

ये माना भेज देगा हम को महशर से जहन्नुम में 
मगर जो दिल पे गुज़रेगी वो दिल ही जानता होगा 

समझता क्या है तू दीवानगी-ए-इश्क़ को ज़ाहिद 
ये हो जायेंगे जिस जानिब उसी जानिबख़ुदा होगा 

“ज़िगर” का हाथ होगा हश्र में और दामन-ए-हज़रत 
शिकायत हो कि शिकवा जो भी होगा बरमला होगा

Jigar moradabadi

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