Jism par baqi ye sar hai kya karoon

जिस्म पर बाक़ी ये सर है क्या करूँ
दस्त-ए-क़ातिल बे-हुनर है क्या करूँ

चाहता हूँ फूँक दूँ इस शहर को 
शहर में इन का भी घर है क्या करूँ

वो तो सौ सौ मर्तबा चाहें मुझे
मेरी चाहत में कसर है क्या करूँ

पाँव में ज़ंजीर काँटे आबले
और फिर हुक्म-ए-सफ़र है क्या करूँ

‘कैफ़’ का दिल ‘कैफ़’ का दिल है मगर
वो नज़र फिर वो नज़र है क्या करूँ

‘कैफ़’ में हूँ एक नूरानी किताब 
पढ़ने वाला कम-नज़र है क्या करूँ

Kaifi bhopali

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Kis pe Teri shamsheer nahi hai

जिस पे तेरी शमशीर नहीं है
उस की कोई तौक़ीर नहीं है

उस ने ये कह कर फेर दिया ख़त
ख़ून से क्यूँ तहरीर नहीं है

ज़ख्म-ए-ज़िगर में झाँक के देखो
क्या ये तुम्हारा तीर नहीं है

ज़ख़्म लगे हैं खुलने गुल-चीं
ये तो तेरी जागीर नहीं है

शहर में यौम-ए-अमन है वाइज़
आज तेरी तक़रीर नहीं है

ऊदी घटा तो वापस हो जा
आज कोई तदबीर नहीं है

शहर-ए-मोहब्बत का यूँ उजड़ा
दूर तलक तामीर नहीं है

इतनी हया क्यूँ आईने से
ये तो मेरी तस्वीर नहीं है

Kaifi bhopali

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Kyon phir rahe ho kaif ye khatre ka ghar liye

क्यों फिर रहे हो कैफ़ ये ख़तरे का घर लिए
ये कांच का शरीर ये काग़ज़ का सर लिए

शोले निकल रहे हैं गुलाबों के जिस्म से
तितली न जा क़रीब ये रेशम के पर लिए

जाने बहार नाम है लेकिन ये काम है
कलियां तराश लीं तो कभी गुल क़तर लिए

रांझा बने हैं, कैस बने, कोहकन बने
हमने किसी के वास्ते सब रूप धर लिए

ना मेहरबाने शहर ने ठुकरा दिया मुझे
मैं फिर रहा हूं अपना मकां दर-ब-दर लिए

Kaifi bhopali

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Aaj hum apni duaon ka asar dekhenge

आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे

आप तो आँख मिलाते हुए शरमाते हैं,
आप तो दिल के धड़कने से भी डर जाते हैं

फिर भी ये जिद है के हम ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे,
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे

प्यार करना दिल-ए-बेताब बुरा होता है
सुनते आए हैं के ये ख्वाब बुरा होता है

आज इस ख्वाब की ताबीर मगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे

जानलेवा है मुहब्बत का समा आज की रात
शम्मा हो जाएगी जल जल के धुआँ आज की रात

आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे 
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे

Kaifi bhopali

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बन के तुम मेरे …

बन के तुम मेरे मुझको मुकम्मल कर दो
अधूरे अधूरे अब हम खुद को भी अच्छे नही लगते

बन के तुम मेरे मुझको मुकम्मल कर दो
अधूरे अधूरे अब हम खुद को भी अच्छे नही लगते

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होती अगर मोहब्बत …

होती अगर मोहब्बत बादल के साये की तरह,
तो मैं तेरे शहर में कभी धूप ना आने देता।

होती अगर मोहब्बत बादल के साये की तरह,
तो मैं तेरे शहर में कभी धूप ना आने देता।

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जानते हो सब फिर भी अनजान बनते हो।, इसी तरह…

जानते हो सब फिर भी अनजान बनते हो।, इसी तरह रोज मुझे परेशान करते हो…… पूछते हो मुझसे कि हमे क्या पसंद है , खुद जवाब होकर सवाल करते हो।

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क्या करेगा इस दिल को लेके कोई ना मोहब्बत करता…

क्या करेगा इस दिल को लेके कोई
ना मोहब्बत करता है न ही सज़दा..!!

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ये जो चेहरे से लगते है कुछ बीमार से हम,…

ये जो चेहरे से लगते है कुछ बीमार से हम,
खूब रोये है लिपटकर दर-ऒ-दीवार से हम..!!

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जब से वफ़ा पे मेरी सवाल उठने लगा है, तब…

जब से वफ़ा पे मेरी सवाल उठने लगा है,
तब से खुली हवा में भी दम घुटने लगा है..!!

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