क़सूर उनका नहीं, जो …

क़सूर उनका नहीं, जो मुझसे दूरियाँ बना ली हैं,
रिवाज़ ही है ज़माने में, पढ़ी किताबें ना पढ़ने का..!!

क़सूर उनका नहीं, जो मुझसे दूरियाँ बना ली हैं,
रिवाज़ ही है ज़माने में, पढ़ी किताबें ना पढ़ने का..!!

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कुछ इस अदा से मिरे …

कुछ इस अदा से मिरे साथ बेवफ़ाई कर
कि तेरे बाद मुझे कोई बेवफ़ा न लगे

कुछ इस अदा से मिरे साथ बेवफ़ाई कर
कि तेरे बाद मुझे कोई बेवफ़ा न लगे

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कुछ बुंदे पानी की… …

कुछ बुंदे पानी की… ना जाने कब से रुकी हैं पल्कों पे साहेब …
ना ही कुछ कह पाती हैं… और… ना ही बह पाती हैं….!

कुछ बुंदे पानी की… ना जाने कब से रुकी हैं पल्कों पे साहेब …
ना ही कुछ कह पाती हैं… और… ना ही बह पाती हैं….!

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सुनकर ज़माने की …

सुनकर ज़माने की बातें, तू अपनी अदा मत बदल,
यकीं रख अपने खुदा पर, यूँ बार बार खुदा मत बदल !!

सुनकर ज़माने की बातें, तू अपनी अदा मत बदल,
यकीं रख अपने खुदा पर, यूँ बार बार खुदा मत बदल !!

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Milo in dino hamse ek raat jaan

मिलो इन दिनों हमसे इक रात जानी
कहाँ हम, कहाँ तुम, कहाँ फिर जवानी

शिकायत करूँ हूँ तो सोने लगे है
मेरी सर-गुज़िश्त अब हुई है कहानी

अदा खींच सकता है बहज़ाद उस की
खींचे सूरत ऐसी तो ये हमने मानl
मुलाक़ात होती है तो है कश-म-कश से
यही हम से है जब न तब खींचा तानी

Mir taqi mir

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Manind e shama majlis e shab ashqbaar paaya

मानिंद-ए-शमा मजलिस-ए-शब अश्कबार पाया
अल क़िस्सा ‘मीर’ को हमने बेइख़्तियार पाया

शहर-ए-दिल एक मुद्दत उजड़ा बसा ग़मों में
आख़िर उजाड़ देना उसका क़रार पाया

इतना न दिल से मिलते न दिल को खो के रहते
जैसा किया था हमने वैसा ही यार पाया

क्या ऐतबार याँ का फिर उस को ख़ार देखा
जिसने जहाँ में आकर कुछ ऐतबार पाया

आहों के शोले जिस् जाँ उठे हैं ‘मीर’ से शब
वाँ जा के सुबह देखा मुश्त-ए-ग़ुबार पाया

Mir taqi mir

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Jo tu hi sanam ham se bezar hoga

जो तू ही सनम हम से बेज़ार होगा
तो जीना हमें अपना दुशवार होगा

ग़म-ए-हिज्र रखेगा बेताब दिल को
हमें कुढ़ते-कुढ़ते कुछ आज़ार होगा

जो अफ़्रात-ए-उल्फ़त है ऐसा तो आशिक़
कोई दिन में बरसों का बिमार होगा

उचटती मुलाक़ात कब तक रहेगी
कभू तो तह-ए-दिल से भी यार होगा

तुझे देख कर लग गया दिल न जाना
के इस संगदिल से हमें प्यार होगा

Mir taqi mir

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Hoti hai agarche kehne se yaron parai baat

होती है अगर्चे कहने से यारों पराई बात
पर हम से तो थमी न कभू मुँह पे आई बात

कहते थे उस से मिलते तो क्या-क्या न कहते लेक
वो आ गया तो सामने उस के न आई बात

बुलबुल के बोलने में सब अंदाज़ हैं मेरे
पोशीदा क्या रही है किसु की उड़ाई बात

इक दिन कहा था ये के ख़ामोशी में है वक़ार
सो मुझ से ही सुख़न नहीं मैं जो बताई बात

अब मुझ ज़ैफ़-ओ-ज़ार को मत कुछ कहा करो
जाती नहीं है मुझ से किसु की उठाई बात

Mir taqi mir

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सुनो ये बादल जब भी बरसता है, मन तुझसे ही…

सुनो ये बादल जब भी बरसता है,
मन तुझसे ही मिलने को तरसता है..!!

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मोहब्बत रोग है दिल का इसे दिल पे ही छोड़…

मोहब्बत रोग है दिल का इसे दिल पे ही छोड़ दो,
दिमाग को अगर बचा लो तो भी गनीमत हो..!!

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