Mazboor

आँख मजबूर-ए-तमाशा है ‘फ़राज़’
एक सूरत है कि हरसू चमके

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Hunar

मुझे यकीन है अपने लफ्जो के हुनर पर…
कि लोग मेरा चेहरा भूल सकते है पर शेर नही…

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Chehra

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे 
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे

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