अजीब तरह से दोनों …

अजीब तरह से दोनों इश्क में नाकाम हुये,

वो मुझे चाह ना सकी और मैं उसको भुला ना सका !!

#brij

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अजीब तरह से दोनों इश्क में नाकाम हुये,

वो मुझे चाह ना सकी और मैं उसको भुला ना सका !!

#brij

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दिल तो तोड़ ही दिया …

दिल तो तोड़ ही दिया है,
अब जला दो अशियाना मेरा,
ताकि हम जलकर खाक हो जाये,
ना देख सकें गैरो के संग मुस्कुराना तेरा।

#brij

दिल तो तोड़ ही दिया है,
अब जला दो अशियाना मेरा,
ताकि हम जलकर खाक हो जाये,
ना देख सकें गैरो के संग मुस्कुराना तेरा।

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#अन्जुम_रहबर …

#अन्जुम_रहबर

जिनके आँगन में अमीरी का शजर लगता है,
उनका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है

चाँद तारे मेरे क़दमों में बिछे जाते हैं,
ये बुजुर्गों की दुआओं का असर लगता है

माँ मुझे देख के नाराज़ न हो जाए कहीं
सर पे आँचल नही होता है तो डर लगता है !

Admin #brij

#अन्जुम_रहबर

जिनके आँगन में अमीरी का शजर लगता है,
उनका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है

चाँद तारे मेरे क़दमों में बिछे जाते हैं,
ये बुजुर्गों की दुआओं का असर लगता है

माँ मुझे देख के नाराज़ न हो जाए कहीं
सर पे आँचल नही होता है तो डर लगता है !

Admin #brij

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#unknown …

#unknown

कमाने जब निकलता हूँ पसीना छूट जाता है
मैं इस शिद्दत से मरता हूँ कि जीना छूट जाता है

सफ़्हे कुछ बीच में कोरे से रह जाते हैं अब मुझसे
मैं जब भी साल लिखता हूँ महीना छूट जाता है

जलाऊँ किस तरह चूल्हा और ईमान भी रक्खूँ
मैं गर रोटी पकड़ता हूँ मदीना छूट जाता है

मुझे अब खौफ रहता मैं जब भी घर पहुँचता हूँ
मैं अपनी माँ का मुँह देखूँ तो पीना छूट जाता है

मुझे रहने दे साहिल पर कहीं अब और न ले जा
सुना है दूर जाने पर सफीना छूट जाता है

Admin #brij

#unknown

कमाने जब निकलता हूँ पसीना छूट जाता है
मैं इस शिद्दत से मरता हूँ कि जीना छूट जाता है

सफ़्हे कुछ बीच में कोरे से रह जाते हैं अब मुझसे
मैं जब भी साल लिखता हूँ महीना छूट जाता है

जलाऊँ किस तरह चूल्हा और ईमान भी रक्खूँ
मैं गर रोटी पकड़ता हूँ मदीना छूट जाता है

मुझे अब खौफ रहता मैं जब भी घर पहुँचता हूँ
मैं अपनी माँ का मुँह देखूँ तो पीना छूट जाता है

मुझे रहने दे साहिल पर कहीं अब और न ले जा
सुना है दूर जाने पर सफीना छूट जाता है

Admin #brij

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हुज़ूर आपका भी …

हुज़ूर आपका भी एहतराम करता चलूँ
इधर से गुज़रा था सोचा सलाम करता चलूँ,

निगाह-ओ-दिल की यही आखरी तमन्ना है
तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साए में शाम करता चलूँ,

उन्हें ये ज़िद कि मुझे देख कर किसी को न देख
मेरा ये शौक के सबसे कलाम करता चलूँ !

Admin #brij

हुज़ूर आपका भी एहतराम करता चलूँ
इधर से गुज़रा था सोचा सलाम करता चलूँ,

निगाह-ओ-दिल की यही आखरी तमन्ना है
तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साए में शाम करता चलूँ,

उन्हें ये ज़िद कि मुझे देख कर किसी को न देख
मेरा ये शौक के सबसे कलाम करता चलूँ !

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#बशीर_बद्र …

#बशीर_बद्र

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो
मेरी तरह तुम भी झूठे हो

इक टहनी पर चाँद टिका था
मैं ये समझा तुम बैठे हो

उजले-उजले फूल खिले थे
बिल्कुल जैसे तुम हँसते हो

मुझ को शाम बता देती है
तुम कैसे कपड़े पहने हो

तुम तन्हा दुनिया से लड़ोगे
बच्चों सी बातें करते हो

Admin #brij

#बशीर_बद्र

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो
मेरी तरह तुम भी झूठे हो

इक टहनी पर चाँद टिका था
मैं ये समझा तुम बैठे हो

उजले-उजले फूल खिले थे
बिल्कुल जैसे तुम हँसते हो

मुझ को शाम बता देती है
तुम कैसे कपड़े पहने हो

तुम तन्हा दुनिया से लड़ोगे
बच्चों सी बातें करते हो

Admin #brij

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#Gulzar …

#Gulzar

हज़ार राहें मुड़ के देखी, कहीं से कोई सदा ना आई
बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने, हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

जहाँ से तुम मोड़ मुड़ गये थे, ये मोड़ अब भी वही पड़े हैं
हम अपने पैरों में जाने कितने भंवर लपेटे हुये खड़े हैं

कहीं किसी रोज यूँ भी होता, हमारी हालत तुम्हारी होती
जो रात हम ने गुज़ारी मर के, वो रात तुम ने गुज़ारी होती

तुम्हें ये ज़िद थी के हम बुलाते, हमें ये उम्मीद वो पुकारे
है नाम होठों पे अब भी लेकिन, आवाज़ में पड़ गई दरारें

Admin #brij

#Gulzar

हज़ार राहें मुड़ के देखी, कहीं से कोई सदा ना आई
बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने, हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

जहाँ से तुम मोड़ मुड़ गये थे, ये मोड़ अब भी वही पड़े हैं
हम अपने पैरों में जाने कितने भंवर लपेटे हुये खड़े हैं

कहीं किसी रोज यूँ भी होता, हमारी हालत तुम्हारी होती
जो रात हम ने गुज़ारी मर के, वो रात तुम ने गुज़ारी होती

तुम्हें ये ज़िद थी के हम बुलाते, हमें ये उम्मीद वो पुकारे
है नाम होठों पे अब भी लेकिन, आवाज़ में पड़ गई दरारें

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आवारगी by …

आवारगी by #मोहसिन_नक़वी

ये दिल, ये पागल दिल मेरा, क्यों बुझ गया, आवारगी
इस दश्त में इक शहर था, वो क्या हुआ, आवारगी

कल शब मुझे बे-शक्ल सी, आवाज़ ने चौँका दिया
मैंने कहा तू कौन है, उसने कहा, आवारगी

इक तू कि सदियों से, मेरे हम-राह भी हम-राज़ भी
इक मैं कि तेरे नाम से ना-आश्ना, आवारगी

ये दर्द की तनहाइयाँ, ये दश्त का वीरां सफ़र
हम लोग तो उकता गये अपनी सुना, आवारगी

इक अजनबी झोंके ने पूछा, मेरे ग़म का सबब
सहरा की भीगी रेत मैंने लिखा, आवारगी

ले अब तो दश्त-ए-शब की, सारी वुस’अतें सोने लगीं
अब जागना होगा हमें कब तक बता, आवारगी

कल रात तनहा चाँद को, देखा था मैंने ख़्वाब में
‘मोहसिन’ मुझे रास आयेगी शायद सदा, आवारगी

Admin #brij

आवारगी by #मोहसिन_नक़वी

ये दिल, ये पागल दिल मेरा, क्यों बुझ गया, आवारगी
इस दश्त में इक शहर था, वो क्या हुआ, आवारगी

कल शब मुझे बे-शक्ल सी, आवाज़ ने चौँका दिया
मैंने कहा तू कौन है, उसने कहा, आवारगी

इक तू कि सदियों से, मेरे हम-राह भी हम-राज़ भी
इक मैं कि तेरे नाम से ना-आश्ना, आवारगी

ये दर्द की तनहाइयाँ, ये दश्त का वीरां सफ़र
हम लोग तो उकता गये अपनी सुना, आवारगी

इक अजनबी झोंके ने पूछा, मेरे ग़म का सबब
सहरा की भीगी रेत मैंने लिखा, आवारगी

ले अब तो दश्त-ए-शब की, सारी वुस’अतें सोने लगीं
अब जागना होगा हमें कब तक बता, आवारगी

कल रात तनहा चाँद को, देखा था मैंने ख़्वाब में
‘मोहसिन’ मुझे रास आयेगी शायद सदा, आवारगी

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#मोहसिन_नक़वी …

#मोहसिन_नक़वी

रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाया न करो
आँख सच बोलती हैं प्यार छुपाया न करो

लोग हर बात का अफ़साना बना लेते हैं
सबको हालात की रूदाद सुनाया न करो

ये जरूरी नहीं हर शख़्स मसीहा ही हो
प्यार के ज़ख़्म अमानत हैं दिखाया न करो

शहर-ए-एहसास में पथरां बहुत हैं ‘मोहसिन’
दिल को शीशे के झरोखों में सजाया न करो

Admin #brij

#मोहसिन_नक़वी

रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाया न करो
आँख सच बोलती हैं प्यार छुपाया न करो

लोग हर बात का अफ़साना बना लेते हैं
सबको हालात की रूदाद सुनाया न करो

ये जरूरी नहीं हर शख़्स मसीहा ही हो
प्यार के ज़ख़्म अमानत हैं दिखाया न करो

शहर-ए-एहसास में पथरां बहुत हैं ‘मोहसिन’
दिल को शीशे के झरोखों में सजाया न करो

Admin #brij

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#सलीम_कौसर …

#सलीम_कौसर
———————————————
मैं ख़्याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सरे-आईना मेरा अक्स है पसे-आइना कोई और है।

मैं किसी की दस्ते-तलब में हूँ तो किसी की हर्फ़े-दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है।

अजब ऐतबार-ओ-बे-ऐतबार के दरम्यान है ज़िंदगी
मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है।

तेरी रोशनी मेरे खद्दो-खाल से मुख्तलिफ़ तो नहीं मगर
तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है।

तुझे दुश्मनों की खबर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं
तेरी दास्ता कोई और थी मेरा वाक़्या कोई और है।

वही मुंसिफ़ों की रवायतें वहीं फैसलों की इबारतें
मेरा जुर्म तो कोई और था पर मेरी सजा कोई और है।

कभी लौट आएँ तो पूछना नहीं देखना उन्हें ग़ौर से
जिन्हें रास्ते में ख़बर हुईं कि ये रास्ता कोई और है।

जो मेरी रियाज़त-ए-नीम-शब को ‘सलीम’ सुबह न मिल सकी
तो फिर इसके माने तो ये हुए कि यहाँ ख़ुदा कोई और है।

Admin #brij

#सलीम_कौसर
———————————————
मैं ख़्याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सरे-आईना मेरा अक्स है पसे-आइना कोई और है।

मैं किसी की दस्ते-तलब में हूँ तो किसी की हर्फ़े-दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है।

अजब ऐतबार-ओ-बे-ऐतबार के दरम्यान है ज़िंदगी
मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है।

तेरी रोशनी मेरे खद्दो-खाल से मुख्तलिफ़ तो नहीं मगर
तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है।

तुझे दुश्मनों की खबर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं
तेरी दास्ता कोई और थी मेरा वाक़्या कोई और है।

वही मुंसिफ़ों की रवायतें वहीं फैसलों की इबारतें
मेरा जुर्म तो कोई और था पर मेरी सजा कोई और है।

कभी लौट आएँ तो पूछना नहीं देखना उन्हें ग़ौर से
जिन्हें रास्ते में ख़बर हुईं कि ये रास्ता कोई और है।

जो मेरी रियाज़त-ए-नीम-शब को ‘सलीम’ सुबह न मिल सकी
तो फिर इसके माने तो ये हुए कि यहाँ ख़ुदा कोई और है।

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