बरसों से हमें …

बरसों से हमें जिनका इंतज़ार था
उनका दिल कहीं और ही गिरफ़्तार था ।
वो कर रहा था दिल्लगी मेरे दिल के साथ
जमाने मे सबसे ज्यादा हमे जिस से प्यार था
सुना है वो सुकून से रहता है अब हमारे बिना
जिसके बगैर हमे कहीं पर भी ना क़रार था
उसने अपनी नज़रो से हमे क्यूँ गिरा दिया
मेरी नज़र मे जिसका खुदा के बराबर मेयार था
वो दिन भी आया जब वो भी था तन्हा मेरी तरह
मगर मेरे हाथ की लकीरों में उसका प्यार ना था
#brij

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बरसों से हमें जिनका इंतज़ार था
उनका दिल कहीं और ही गिरफ़्तार था ।
वो कर रहा था दिल्लगी मेरे दिल के साथ
जमाने मे सबसे ज्यादा हमे जिस से प्यार था
सुना है वो सुकून से रहता है अब हमारे बिना
जिसके बगैर हमे कहीं पर भी ना क़रार था
उसने अपनी नज़रो से हमे क्यूँ गिरा दिया
मेरी नज़र मे जिसका खुदा के बराबर मेयार था
वो दिन भी आया जब वो भी था तन्हा मेरी तरह
मगर मेरे हाथ की लकीरों में उसका प्यार ना था
#brij

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बर्तनों की आवाज़ …

बर्तनों की आवाज़ देर रात तक आ रही थी,
रसोई का नल चल रहा है,
माँ रसोई में है….

तीनों बहुऐं अपने-अपने कमरे में सोने जा चुकी,
माँ रसोई में है…

माँ का काम बकाया रह गया था,पर काम तो सबका था;
पर माँ तो अब भी सबका काम अपना ही मानती है..

दूध गर्म करके,
ठण्ड़ा करके,
जावण देना है,
ताकि सुबह बेटों को ताजा दही मिल सके;

सिंक में रखे बर्तन माँ को कचोटते हैं,
चाहे तारीख बदल जाये,सिंक साफ होना चाहिये….

बर्तनों की आवाज़ से
बहू-बेटों की नींद खराब हो रही है;
बड़ी बहू ने बड़े बेटे से कहा;
“तुम्हारी माँ को नींद नहीं आती क्या? ना खुद सोती है और ना ही हमें सोने देती है”

मंझली ने मंझले बेटे से कहा; “अब देखना सुबह चार बजे फिर खटर-पटर चालू हो जायेगी, तुम्हारी माँ को चैन नहीं है क्या?”

छोटी ने छोटे बेटे से कहा; “प्लीज़ जाकर ये ढ़ोंग बन्द करवाओ कि रात को सिंक खाली रहना चाहिये”

माँ अब तक बर्तन माँज चुकी थी

झुकी कमर,
कठोर हथेलियां,
लटकी सी त्वचा,
जोड़ों में तकलीफ,
आँख में पका मोतियाबिन्द,
माथे पर टपकता पसीना,
पैरों में उम्र की लड़खडाहट
मगर,
दूध का गर्म पतीला
वो आज भी अपने पल्लू से उठा लेती है,
और…
उसकी अंगुलियां जलती नहीं है,
क्योंकि वो माँ है ।

दूध ठण्ड़ा हो चुका,
जावण भी लग चुका,
घड़ी की सुईयां थक गई,
मगर…
माँ ने फ्रिज में से भिण्ड़ी निकाल ली और काटने लगी;
उसको नींद नहीं आती है, क्योंकि वो माँ है!

कभी-कभी सोचता हूं कि माँ जैसे विषय पर लिखना,बोलना,बताना,जताना क़ानूनन बन्द होना चाहिये;
क्योंकि यह विषय निर्विवाद है,
क्योंकि यह रिश्ता स्वयं कसौटी है!

रात के बारह बजे सुबह की भिण्ड़ी कट गई,
अचानक याद आया कि गोली तो ली ही नहीं;
बिस्तर पर तकिये के नीचे रखी थैली निकाली,
मूनलाईट की रोशनी में
गोली के रंग के हिसाब से मुंह में रखी और गटक कर पानी पी लिया…

बगल में एक नींद ले चुके बाबूजी ने कहा;”आ गई”
“हाँ,आज तो कोई काम ही नहीं था”
-माँ ने जवाब दिया,

और

लेट गई,कल की चिन्ता में
पता नहीं नींद आती होगी या नहीं पर सुबह वो थकान रहित होती हैं,
क्योंकि वो माँ है!

सुबह का अलार्म बाद में बजता है,
माँ की नींद पहले खुलती है;
याद नहीं कि कभी भरी सर्दियों में भी,
माँ गर्म पानी से नहायी हो
उन्हे सर्दी नहीं लगती,
क्योंकि वो माँ है!

अखबार पढ़ती नहीं,मगर उठा कर लाती है;
चाय पीती नहीं,मगर बना कर लाती है;
जल्दी खाना खाती नहीं,मगर बना देती है,
क्योंकि वो माँ है!

माँ पर बात जीवनभर खत्म ना होगी,
शेष अगली बार…

और हाँ,अगर पढ़ते पढ़ते आँखों में आँसु आ जाये तो कृपया खुलकर रोइये और आंसू पोछ कर एक बार अपनी माँ को जादू की झप्पी जरूर दीजिये,
क्योंकि वो किसी और की नही,आपकी ही माँ है!

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बर्तनों की आवाज़ देर रात तक आ रही थी,
रसोई का नल चल रहा है,
माँ रसोई में है….

तीनों बहुऐं अपने-अपने कमरे में सोने जा चुकी,
माँ रसोई में है…

माँ का काम बकाया रह गया था,पर काम तो सबका था;
पर माँ तो अब भी सबका काम अपना ही मानती है..

दूध गर्म करके,
ठण्ड़ा करके,
जावण देना है,
ताकि सुबह बेटों को ताजा दही मिल सके;

सिंक में रखे बर्तन माँ को कचोटते हैं,
चाहे तारीख बदल जाये,सिंक साफ होना चाहिये….

बर्तनों की आवाज़ से
बहू-बेटों की नींद खराब हो रही है;
बड़ी बहू ने बड़े बेटे से कहा;
“तुम्हारी माँ को नींद नहीं आती क्या? ना खुद सोती है और ना ही हमें सोने देती है”

मंझली ने मंझले बेटे से कहा; “अब देखना सुबह चार बजे फिर खटर-पटर चालू हो जायेगी, तुम्हारी माँ को चैन नहीं है क्या?”

छोटी ने छोटे बेटे से कहा; “प्लीज़ जाकर ये ढ़ोंग बन्द करवाओ कि रात को सिंक खाली रहना चाहिये”

माँ अब तक बर्तन माँज चुकी थी

झुकी कमर,
कठोर हथेलियां,
लटकी सी त्वचा,
जोड़ों में तकलीफ,
आँख में पका मोतियाबिन्द,
माथे पर टपकता पसीना,
पैरों में उम्र की लड़खडाहट
मगर,
दूध का गर्म पतीला
वो आज भी अपने पल्लू से उठा लेती है,
और…
उसकी अंगुलियां जलती नहीं है,
क्योंकि वो माँ है ।

दूध ठण्ड़ा हो चुका,
जावण भी लग चुका,
घड़ी की सुईयां थक गई,
मगर…
माँ ने फ्रिज में से भिण्ड़ी निकाल ली और काटने लगी;
उसको नींद नहीं आती है, क्योंकि वो माँ है!

कभी-कभी सोचता हूं कि माँ जैसे विषय पर लिखना,बोलना,बताना,जताना क़ानूनन बन्द होना चाहिये;
क्योंकि यह विषय निर्विवाद है,
क्योंकि यह रिश्ता स्वयं कसौटी है!

रात के बारह बजे सुबह की भिण्ड़ी कट गई,
अचानक याद आया कि गोली तो ली ही नहीं;
बिस्तर पर तकिये के नीचे रखी थैली निकाली,
मूनलाईट की रोशनी में
गोली के रंग के हिसाब से मुंह में रखी और गटक कर पानी पी लिया…

बगल में एक नींद ले चुके बाबूजी ने कहा;”आ गई”
“हाँ,आज तो कोई काम ही नहीं था”
-माँ ने जवाब दिया,

और

लेट गई,कल की चिन्ता में
पता नहीं नींद आती होगी या नहीं पर सुबह वो थकान रहित होती हैं,
क्योंकि वो माँ है!

सुबह का अलार्म बाद में बजता है,
माँ की नींद पहले खुलती है;
याद नहीं कि कभी भरी सर्दियों में भी,
माँ गर्म पानी से नहायी हो
उन्हे सर्दी नहीं लगती,
क्योंकि वो माँ है!

अखबार पढ़ती नहीं,मगर उठा कर लाती है;
चाय पीती नहीं,मगर बना कर लाती है;
जल्दी खाना खाती नहीं,मगर बना देती है,
क्योंकि वो माँ है!

माँ पर बात जीवनभर खत्म ना होगी,
शेष अगली बार…

और हाँ,अगर पढ़ते पढ़ते आँखों में आँसु आ जाये तो कृपया खुलकर रोइये और आंसू पोछ कर एक बार अपनी माँ को जादू की झप्पी जरूर दीजिये,
क्योंकि वो किसी और की नही,आपकी ही माँ है!

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#अहसान_दानिश …

#अहसान_दानिश

यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे
साथ चल मौज़-ए-सबा हो जैसे l

लोग यूँ देख कर हँस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे l

इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा
यूँ न मिल हमसे ख़ुदा हो जैसे l

मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ
मुझपे एहसान किया हो जैसे l

ऐसे अंजान बने बैठे हो
तुम को कुछ भी न पता हो जैसे l

हिचकियाँ रात को आती ही रहीं
तू ने फिर याद किया हो जैसे l

ज़िन्दगी बीत रही है दानिश
एक बेजुर्म सज़ा हो जैसे l

Admin #brij

#अहसान_दानिश

यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे
साथ चल मौज़-ए-सबा हो जैसे l

लोग यूँ देख कर हँस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे l

इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा
यूँ न मिल हमसे ख़ुदा हो जैसे l

मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ
मुझपे एहसान किया हो जैसे l

ऐसे अंजान बने बैठे हो
तुम को कुछ भी न पता हो जैसे l

हिचकियाँ रात को आती ही रहीं
तू ने फिर याद किया हो जैसे l

ज़िन्दगी बीत रही है दानिश
एक बेजुर्म सज़ा हो जैसे l

Admin #brij

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#NaqshLayalpuri …

#NaqshLayalpuri

ज़हर देता है कोई, कोई दवा देता है
जो भी मिलता है मेरा दर्द बढ़ा देता है

किसी हमदम का सरे शाम ख़याल आ जाना
नींद जलती हुई आँखों की उड़ा देता है

प्यास इतनी है मेरी रूह की गहराई में
अश्क गिरता है तो दामन को जला देता है

किसने माज़ी के दरीचों से पुकारा है मुझे
कौन भूली हुई राहों से सदा देता है

वक़्त ही दर्द के काँटों पे सुलाए दिल को
वक़्त ही दर्द का एहसास मिटा देता है

‘नक़्श’ रोने से तसल्ली कभी हो जाती थी
अब तबस्सुम मेरे होटों को जला देता है !

Admin #brij

#NaqshLayalpuri

ज़हर देता है कोई, कोई दवा देता है
जो भी मिलता है मेरा दर्द बढ़ा देता है

किसी हमदम का सरे शाम ख़याल आ जाना
नींद जलती हुई आँखों की उड़ा देता है

प्यास इतनी है मेरी रूह की गहराई में
अश्क गिरता है तो दामन को जला देता है

किसने माज़ी के दरीचों से पुकारा है मुझे
कौन भूली हुई राहों से सदा देता है

वक़्त ही दर्द के काँटों पे सुलाए दिल को
वक़्त ही दर्द का एहसास मिटा देता है

‘नक़्श’ रोने से तसल्ली कभी हो जाती थी
अब तबस्सुम मेरे होटों को जला देता है !

Admin #brij

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#KaifBhopali …

#KaifBhopali

दरो-दीवार पे शक्लें-सी बनाने आई
फिर ये बारिश मेरी तन्हाई चुराने आई

जिंदगी बाप की मानिंद सज़ा देती है
रहम-दिल माँ की तरह मौत बचाने आई

आजकल फिर दिले-बेताब की बातें हैं वही
हम तो समझे थे के कुछ अक्ल ठिकाने आई

दिल में आहट-सी हुई, रूह में दस्तक गूंजी
किसकी खुशबू मुझे ये मेरे सिरहाने आई

मैंने जब पहले-पहल अपना वतन छोड़ा था
दूर तक मुझको इक आवाज़ बुलाने आई

तेरी मानिंद तेरी याद भी ज़ालिम निकली
जब भी आई है, मेरा दिल ही दुखाने आई!

Admin #brij

#KaifBhopali

दरो-दीवार पे शक्लें-सी बनाने आई
फिर ये बारिश मेरी तन्हाई चुराने आई

जिंदगी बाप की मानिंद सज़ा देती है
रहम-दिल माँ की तरह मौत बचाने आई

आजकल फिर दिले-बेताब की बातें हैं वही
हम तो समझे थे के कुछ अक्ल ठिकाने आई

दिल में आहट-सी हुई, रूह में दस्तक गूंजी
किसकी खुशबू मुझे ये मेरे सिरहाने आई

मैंने जब पहले-पहल अपना वतन छोड़ा था
दूर तक मुझको इक आवाज़ बुलाने आई

तेरी मानिंद तेरी याद भी ज़ालिम निकली
जब भी आई है, मेरा दिल ही दुखाने आई!

Admin #brij

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** डा. राही मासूम …

** डा. राही मासूम रजा़ **
जिनसे हम छूट गये अब वो जहाँ कैसे हैं
शाखे गुल कैसे हैं खुश्‍बू के मकाँ कैसे हैं।

ऐ सबा तू तो उधर से ही गुज़रती होगी
उस गली में मेरे पैरों के निशाँ कैसे हैं।

कहीं शबनम के शगूफ़े कहीं अंगारों के फूल
आके देखो मेरी यादों के जहां कैसे हैं।

मैं तो पत्‍थर था मुझे फेंक दिया ठीक किया
आज उस शहर में शीशे के मकाँ कैसे हैं।

Admin #brij

** डा. राही मासूम रजा़ **
जिनसे हम छूट गये अब वो जहाँ कैसे हैं
शाखे गुल कैसे हैं खुश्‍बू के मकाँ कैसे हैं।

ऐ सबा तू तो उधर से ही गुज़रती होगी
उस गली में मेरे पैरों के निशाँ कैसे हैं।

कहीं शबनम के शगूफ़े कहीं अंगारों के फूल
आके देखो मेरी यादों के जहां कैसे हैं।

मैं तो पत्‍थर था मुझे फेंक दिया ठीक किया
आज उस शहर में शीशे के मकाँ कैसे हैं।

Admin #brij

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दोस्तो हमने अपना …

दोस्तो हमने अपना पेज का ग्रुप भी बना लिया है जिसमे आप सब भी अपनी पसंदीदा शायरी और ग़ज़ल पोस्ट कर सकते हो। आज ही ग्रुप के मेंबर बने और ज्यादा से ज्यादा पोस्ट करें।

#brij

दोस्तो हमने अपना पेज का ग्रुप भी बना लिया है जिसमे आप सब भी अपनी पसंदीदा शायरी और ग़ज़ल पोस्ट कर सकते हो। आज ही ग्रुप के मेंबर बने और ज्यादा से ज्यादा पोस्ट करें।

#brij

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#जौन_एलिया …

#जौन_एलिया

आख़िरी बार आह कर ली है
मैं ने ख़ुद से निबाह कर ली है
अपने सर इक बला तो लेनी थी
मैं ने वो ज़ुल्फ़ अपने सर ली है
दिन भला किस तरह गुज़ारोगे
वस्ल की शब भी अब गुज़र ली है
जाँ-निसारों पे वार क्या करना
मैं ने बस हाथ में सिपर ली है
जो भी माँगो उधार दूँगा मैं
उस गली में दुकान कर ली है
मेरा कश्कोल कब से ख़ाली था
मैं ने इस में शराब भर ली है
और तो कुछ नहीं किया मैं ने
अपनी हालत तबाह कर ली है
शैख़ आया था मोहतसिब को लिए
मैं ने भी उन की वो ख़बर ली है

Admin #brij

#जौन_एलिया

आख़िरी बार आह कर ली है
मैं ने ख़ुद से निबाह कर ली है
अपने सर इक बला तो लेनी थी
मैं ने वो ज़ुल्फ़ अपने सर ली है
दिन भला किस तरह गुज़ारोगे
वस्ल की शब भी अब गुज़र ली है
जाँ-निसारों पे वार क्या करना
मैं ने बस हाथ में सिपर ली है
जो भी माँगो उधार दूँगा मैं
उस गली में दुकान कर ली है
मेरा कश्कोल कब से ख़ाली था
मैं ने इस में शराब भर ली है
और तो कुछ नहीं किया मैं ने
अपनी हालत तबाह कर ली है
शैख़ आया था मोहतसिब को लिए
मैं ने भी उन की वो ख़बर ली है

Admin #brij

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#जौन_एलिया …

#जौन_एलिया

बे-क़रारी सी बे-क़रारी है
वस्ल है और फ़िराक़ तारी है
जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है
निघरे क्या हुए कि लोगों पर
अपना साया भी अब तो भारी है
बिन तुम्हारे कभी नहीं आई
क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है
आप में कैसे आऊँ मैं तुझ बिन
साँस जो चल रही है आरी है
उस से कहियो कि दिल की गलियों में
रात दिन तेरी इंतिज़ारी है
हिज्र हो या विसाल हो कुछ हो
हम हैं और उस की यादगारी है
इक महक सम्त-ए-दिल से आई थी
मैं ये समझा तिरी सवारी है
हादसों का हिसाब है अपना
वर्ना हर आन सब की बारी है
ख़ुश रहे तू कि ज़िंदगी अपनी
उम्र भर की उमीदवारी है

Admin #brij

#जौन_एलिया

बे-क़रारी सी बे-क़रारी है
वस्ल है और फ़िराक़ तारी है
जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है
निघरे क्या हुए कि लोगों पर
अपना साया भी अब तो भारी है
बिन तुम्हारे कभी नहीं आई
क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है
आप में कैसे आऊँ मैं तुझ बिन
साँस जो चल रही है आरी है
उस से कहियो कि दिल की गलियों में
रात दिन तेरी इंतिज़ारी है
हिज्र हो या विसाल हो कुछ हो
हम हैं और उस की यादगारी है
इक महक सम्त-ए-दिल से आई थी
मैं ये समझा तिरी सवारी है
हादसों का हिसाब है अपना
वर्ना हर आन सब की बारी है
ख़ुश रहे तू कि ज़िंदगी अपनी
उम्र भर की उमीदवारी है

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कभी आप यूँ …

कभी आप यूँ मुस्कुरा दीजिये
फूल राहों में मेरी बिछा दीजिये
खड़ा हूँ मैं राहों में कब से यूँ ही
की अब हाथ अपना बढ़ा दीजिये
नही हम तलबगार उस चाँद के
हमे आप चेहरा दिखा दीजिये
की है ये जिंदगी तेरे ही हवाले
बना दीजिये या मिटा दीजिये
अगर आप हमको मिल ना सके तो
बिना आपके जी के क्या कीजिये
#brij

कभी आप यूँ मुस्कुरा दीजिये
फूल राहों में मेरी बिछा दीजिये
खड़ा हूँ मैं राहों में कब से यूँ ही
की अब हाथ अपना बढ़ा दीजिये
नही हम तलबगार उस चाँद के
हमे आप चेहरा दिखा दीजिये
की है ये जिंदगी तेरे ही हवाले
बना दीजिये या मिटा दीजिये
अगर आप हमको मिल ना सके तो
बिना आपके जी के क्या कीजिये
#brij

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