पकड़ी जब नफ़्ज़ मेरी., …

पकड़ी जब नफ़्ज़ मेरी.,
हकीम लुकमान यू बोला…!
वो ज़िंदा है तुझ में..’
तू मर चूका है जिस में..!🥀✍🏻
#Azhan

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पकड़ी जब नफ़्ज़ मेरी.,
हकीम लुकमान यू बोला…!
वो ज़िंदा है तुझ में..’
तू मर चूका है जिस में..!🥀✍🏻
#Azhan

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हर एक लफ़्ज़ में …

हर एक लफ़्ज़ में सीने का नूर ढाल के रख
कभी कभार तो काग़ज़ पे दिल निकाल के रख !
जो दोस्तों की मोहब्बत से जी नहीं भरता,
तो आस्तीन में दो-चार साँप पाल के रख !
तुझे तो कितनी बहारें सलाम भेजेंगी,
अभी ये फूल सा चेहरा ज़रा सँभाल के रख !
(अंजुम बाराबंकवी)
#Azhan

हर एक लफ़्ज़ में सीने का नूर ढाल के रख
कभी कभार तो काग़ज़ पे दिल निकाल के रख !
जो दोस्तों की मोहब्बत से जी नहीं भरता,
तो आस्तीन में दो-चार साँप पाल के रख !
तुझे तो कितनी बहारें सलाम भेजेंगी,
अभी ये फूल सा चेहरा ज़रा सँभाल के रख !
(अंजुम बाराबंकवी)
#Azhan

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सियासी आदमी की …

सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है
मगर जब गुफ्तगू करता है चिंगारी निकलती है

लबों पर मुस्कराहट दिल में बेजारी निकलती है
बडे लोगों में ही अक्सर ये बीमारी निकलती है

मोहब्बत को जबर्दस्ती तो लादा जा नहीं सकता
कहीं खिडकी से मेरी जान अलमारी निकलती है

यही घर था जहां मिलजुल के सब एक साथ रहते थे
यही घर है अब अलग भाई की अफ्तारी निकलती है
#Azhan

सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है
मगर जब गुफ्तगू करता है चिंगारी निकलती है

लबों पर मुस्कराहट दिल में बेजारी निकलती है
बडे लोगों में ही अक्सर ये बीमारी निकलती है

मोहब्बत को जबर्दस्ती तो लादा जा नहीं सकता
कहीं खिडकी से मेरी जान अलमारी निकलती है

यही घर था जहां मिलजुल के सब एक साथ रहते थे
यही घर है अब अलग भाई की अफ्तारी निकलती है
#Azhan

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न सुना करो मुझे गौर …

न सुना करो मुझे गौर से
न लिखा करो मुझे रेत पे
मैं रिवाज़ हूँ नये”इश्क़” का
मुझे सोचना भी आफ़त है…
#Azhan

न सुना करो मुझे गौर से
न लिखा करो मुझे रेत पे
मैं रिवाज़ हूँ नये”इश्क़” का
मुझे सोचना भी आफ़त है…
#Azhan

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तेरे पीछे..मलंग …

तेरे पीछे..मलंग होने से पहले……
मैं काग़ज़ था..पतंग होने से पहले…..!

बहुत नज़दीक से..देखा था तुझको…..
मेरी आँखों ने..दंग होने से पहले……!
#Azhan

तेरे पीछे..मलंग होने से पहले……
मैं काग़ज़ था..पतंग होने से पहले…..!

बहुत नज़दीक से..देखा था तुझको…..
मेरी आँखों ने..दंग होने से पहले……!
#Azhan

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तुम ज़िसे चाहो 👸 …

तुम ज़िसे चाहो 👸 #कोई_और_ना_चाहे_उसको
#इसको_कहते_हैं_मोहब्बत_मे_सियासत_Karna
❤️😍
#Azhan

तुम ज़िसे चाहो 👸 #कोई_और_ना_चाहे_उसको
#इसको_कहते_हैं_मोहब्बत_मे_सियासत_Karna
❤️😍
#Azhan

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हम तो वो हैं जो खुदा …

हम तो वो हैं जो खुदा को भूल गए
तुम मेरी जान किस गुमानं मे हो
#Azhan

हम तो वो हैं जो खुदा को भूल गए
तुम मेरी जान किस गुमानं मे हो
#Azhan

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दिल जलाया तो अंजाम …

दिल जलाया तो अंजाम क्या हुआ मेरा
लिखा है तेज हवाओं ने मर्सिया मेरा

कहीं शरीफ नमाज़ी कहीं फ़रेबी पीर
कबीला मेरा नसब मेरा सिलसिला मेरा

किसी ने जहर कहा है किसी ने शहद कहा
कोई समझ नहीं पाता है जायका मेरा

मैं चाहता था ग़ज़ल आस्मान हो जाये
मगर ज़मीन से चिपका है काफ़िया मेरा

मैं पत्थरों की तरह गूंगे सामईन में था
मुझे सुनाते रहे लोग वाकिया मेरा

उसे खबर है कि मैं हर्फ़-हर्फ़ सूरज हूँ
वो शख्स पढ़ता रहा है लिखा हुआ मेरा

जहाँ पे कुछ भी नहीं है वहाँ बहुत कुछ है
ये कायनात तो है खाली हाशिया मेरा

बुलंदियों के सफर में ये ध्यान आता है
ज़मीन देख रही होगी रास्ता मेरा

राहत इन्दौरी
#Azhan

दिल जलाया तो अंजाम क्या हुआ मेरा
लिखा है तेज हवाओं ने मर्सिया मेरा

कहीं शरीफ नमाज़ी कहीं फ़रेबी पीर
कबीला मेरा नसब मेरा सिलसिला मेरा

किसी ने जहर कहा है किसी ने शहद कहा
कोई समझ नहीं पाता है जायका मेरा

मैं चाहता था ग़ज़ल आस्मान हो जाये
मगर ज़मीन से चिपका है काफ़िया मेरा

मैं पत्थरों की तरह गूंगे सामईन में था
मुझे सुनाते रहे लोग वाकिया मेरा

उसे खबर है कि मैं हर्फ़-हर्फ़ सूरज हूँ
वो शख्स पढ़ता रहा है लिखा हुआ मेरा

जहाँ पे कुछ भी नहीं है वहाँ बहुत कुछ है
ये कायनात तो है खाली हाशिया मेरा

बुलंदियों के सफर में ये ध्यान आता है
ज़मीन देख रही होगी रास्ता मेरा

राहत इन्दौरी
#Azhan

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मंज़र भोपाली …

मंज़र भोपाली
इक मकाँ और बुलंदी पे बनाने न दिया
हम को पर्वाज़ का मौक़ा ही हवा ने न दिया
तू ख़ुदा बन के मिटाएगा हमें ही इक दिन
सर तिरे दर पे इसी डर ने झुकाने न दिया
मुत्तहिद होने का जज़्बा था सभी में लेकिन
मुत्तहिद होने का मौक़ा ही हवा ने न दिया
तुम पे छा जाते शजर बनते जो नन्हे पौदे
तुम ने अच्छा ही किया पाँव जमाने न दिया
वो तो आमादा था बंदों की शिकायत सुन कर
कुछ फ़रिश्तों ने ज़मीं पर उसे आने न दिया
आप डरते हैं कि खुल जाए न असली चेहरा
इस लिए शहर को आईना बनाने न दिया
#Azhan

मंज़र भोपाली
इक मकाँ और बुलंदी पे बनाने न दिया
हम को पर्वाज़ का मौक़ा ही हवा ने न दिया
तू ख़ुदा बन के मिटाएगा हमें ही इक दिन
सर तिरे दर पे इसी डर ने झुकाने न दिया
मुत्तहिद होने का जज़्बा था सभी में लेकिन
मुत्तहिद होने का मौक़ा ही हवा ने न दिया
तुम पे छा जाते शजर बनते जो नन्हे पौदे
तुम ने अच्छा ही किया पाँव जमाने न दिया
वो तो आमादा था बंदों की शिकायत सुन कर
कुछ फ़रिश्तों ने ज़मीं पर उसे आने न दिया
आप डरते हैं कि खुल जाए न असली चेहरा
इस लिए शहर को आईना बनाने न दिया
#Azhan

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अंधेरों से मिरा …

अंधेरों से मिरा रिश्ता बहुत है
मैं जुगनूँ हूँ मुझे दिखता बहुत है

वतन को छोड़ कर हरगिज़ न जाना
मुहाजिर आँख में चुभता बहुत है

ख़ुशी से उस की तुम धोका न खाना
परेशानी में वो हँसता बहुत है

किसी मौसम की फ़ितरत जानने को
शजर का एक ही पत्ता बहुत है

मोहब्बत का पता देती हैं आँखें
ज़बाँ से वो कहाँ खुलता बहुत है

मियाँ उस शख़्स से होशियार रहना
सभी से झुक के जो मिलता बहुत है
#Azhan

अंधेरों से मिरा रिश्ता बहुत है
मैं जुगनूँ हूँ मुझे दिखता बहुत है

वतन को छोड़ कर हरगिज़ न जाना
मुहाजिर आँख में चुभता बहुत है

ख़ुशी से उस की तुम धोका न खाना
परेशानी में वो हँसता बहुत है

किसी मौसम की फ़ितरत जानने को
शजर का एक ही पत्ता बहुत है

मोहब्बत का पता देती हैं आँखें
ज़बाँ से वो कहाँ खुलता बहुत है

मियाँ उस शख़्स से होशियार रहना
सभी से झुक के जो मिलता बहुत है
#Azhan

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