भीगी हुई आँखों का …

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा
घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर न मिलेगा

फिर याद बहुत आयेगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम
जब धूप में साया कोई सर पर न मिलेगा

आँसू को कभी ओस का क़तरा न समझना
ऐसा तुम्हें चाहत का समुंदर न मिलेगा

इस ख़्वाब के माहौल में बे-ख़्वाब हैं आँखें
बाज़ार में ऐसा कोई ज़ेवर न मिलेगा

ये सोच लो अब आख़िरी साया है मुहब्बत
इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा

बशीर बद्र
#Azhan

Advertisements

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा
घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर न मिलेगा

फिर याद बहुत आयेगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम
जब धूप में साया कोई सर पर न मिलेगा

आँसू को कभी ओस का क़तरा न समझना
ऐसा तुम्हें चाहत का समुंदर न मिलेगा

इस ख़्वाब के माहौल में बे-ख़्वाब हैं आँखें
बाज़ार में ऐसा कोई ज़ेवर न मिलेगा

ये सोच लो अब आख़िरी साया है मुहब्बत
इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा

बशीर बद्र
#Azhan

Posted by | View Post | View Group
Advertisements

तज़ल्लियों का नया …

तज़ल्लियों का नया दायरा बनाने में,
मेरे चिराग लगे हैं हवा बनाने में.

अड़े थे ज़िद पे कि सूरज बना के छोड़ेंगे,
पसीने छूट गए इक दिया बनाने में.

तमाम उम्र मुझे दरबदर जो करते रहे,
वो अब लगे हैं मेरा मक़बरा बनाने में.

मेरी निगाह में वो शख्स आदमी भी नहीं,
जिसे लगा है ज़माना खुदा बनाने में.

ये चंद लोग जो बस्ती में सबसे अच्छे हैं,
इन्हीं का हाथ है मुझको बुरा बनाने में.
# राहत इंदौर
#Azhan

तज़ल्लियों का नया दायरा बनाने में,
मेरे चिराग लगे हैं हवा बनाने में.

अड़े थे ज़िद पे कि सूरज बना के छोड़ेंगे,
पसीने छूट गए इक दिया बनाने में.

तमाम उम्र मुझे दरबदर जो करते रहे,
वो अब लगे हैं मेरा मक़बरा बनाने में.

मेरी निगाह में वो शख्स आदमी भी नहीं,
जिसे लगा है ज़माना खुदा बनाने में.

ये चंद लोग जो बस्ती में सबसे अच्छे हैं,
इन्हीं का हाथ है मुझको बुरा बनाने में.
# राहत इंदौर
#Azhan

Posted by | View Post | View Group

समझौतों की …

समझौतों की भीड़-भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया
इतने घुटने टेके हमने, आख़िर घुटना टूट गया

देख शिकारी तेरे कारण एक परिन्दा टूट गया,
पत्थर का तो कुछ नहीं बिगड़ा, लेकिन शीशा टूट गया

घर का बोझ उठाने वाले बचपन की तक़दीर न पूछ
बच्चा घर से काम पे निकला और खिलौना टूट गया

किसको फ़ुर्सत इस दुनिया में ग़म की कहानी पढ़ने की
सूनी कलाई देखके लेकिन, चूड़ी वाला टूट गया

ये मंज़र भी देखे हमने इस दुनिया के मेले में
टूटा-फूटा नाच रहा है, अच्छा ख़ासा टूट गया

पेट की ख़ातिर फ़ुटपाथों पर बेच रहा हूँ तस्वीरें
मैं क्या जानूँ रोज़ा है या मेरा रोज़ा टूट गया

Munnawar Rana………../////
#Azhan

समझौतों की भीड़-भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया
इतने घुटने टेके हमने, आख़िर घुटना टूट गया

देख शिकारी तेरे कारण एक परिन्दा टूट गया,
पत्थर का तो कुछ नहीं बिगड़ा, लेकिन शीशा टूट गया

घर का बोझ उठाने वाले बचपन की तक़दीर न पूछ
बच्चा घर से काम पे निकला और खिलौना टूट गया

किसको फ़ुर्सत इस दुनिया में ग़म की कहानी पढ़ने की
सूनी कलाई देखके लेकिन, चूड़ी वाला टूट गया

ये मंज़र भी देखे हमने इस दुनिया के मेले में
टूटा-फूटा नाच रहा है, अच्छा ख़ासा टूट गया

पेट की ख़ातिर फ़ुटपाथों पर बेच रहा हूँ तस्वीरें
मैं क्या जानूँ रोज़ा है या मेरा रोज़ा टूट गया

Munnawar Rana………../////
#Azhan

Posted by | View Post | View Group

सजर की शाक पर जब भी …

सजर की शाक पर जब भी समर लहराने लगते है
वो कच्चे हो के पक्के उन पे पत्थर आने लगते है

में जब उनकी गली से आईना बनकर गुजरता हु
वो मुझको दूर ही से देखकर सरमाने लगते है

चलें हे बेचने वो आईना अन्धो की बस्ती में।
मुझे इस शहर के लोग होशियार सब दीवाने लगते हे।।

अल्ताफ जिया
#Azhan

सजर की शाक पर जब भी समर लहराने लगते है
वो कच्चे हो के पक्के उन पे पत्थर आने लगते है

में जब उनकी गली से आईना बनकर गुजरता हु
वो मुझको दूर ही से देखकर सरमाने लगते है

चलें हे बेचने वो आईना अन्धो की बस्ती में।
मुझे इस शहर के लोग होशियार सब दीवाने लगते हे।।

अल्ताफ जिया
#Azhan

Posted by | View Post | View Group

जहां तक हो सका हमने …

जहां तक हो सका हमने तुम्हें परदा कराया है
मगर ऐ आंसुओं! तुमने बहुत रुसवा कराया है

चमक यूं ही नहीं आती है खुद्दारी के चेहरे पर
अना को हमने दो दो वक्त का फाका कराया है

बड़ी मुद्दत पे खायी हैं खुशी से गालियाँ हमने
बड़ी मुद्दत पे उसने आज मुंह मीठा कराया है

बिछड़ना उसकी ख्वाहिश थी न मेरी आरजू लेकिन
जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है

कहीं परदेस की रंगीनियों में खो नहीं जाना
किसी ने घर से चलते वक्त ये वादा कराया है

खुदा महफूज रखे मेरे बच्चों को सियासत से
ये वो औरत है जिसने उम्र भर पेशा कराया है

मुनव्वर राना साहब
#Azhan

जहां तक हो सका हमने तुम्हें परदा कराया है
मगर ऐ आंसुओं! तुमने बहुत रुसवा कराया है

चमक यूं ही नहीं आती है खुद्दारी के चेहरे पर
अना को हमने दो दो वक्त का फाका कराया है

बड़ी मुद्दत पे खायी हैं खुशी से गालियाँ हमने
बड़ी मुद्दत पे उसने आज मुंह मीठा कराया है

बिछड़ना उसकी ख्वाहिश थी न मेरी आरजू लेकिन
जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है

कहीं परदेस की रंगीनियों में खो नहीं जाना
किसी ने घर से चलते वक्त ये वादा कराया है

खुदा महफूज रखे मेरे बच्चों को सियासत से
ये वो औरत है जिसने उम्र भर पेशा कराया है

मुनव्वर राना साहब
#Azhan

Posted by | View Post | View Group

चलते चलते मुझसे …

चलते चलते मुझसे पूछा मेरे पॉंव के छालों
ने,
बस्ती कितनी दूर बसा ली दिल में
बसने वालों न #AZhan

चलते चलते मुझसे पूछा मेरे पॉंव के छालों
ने,
बस्ती कितनी दूर बसा ली दिल में
बसने वालों न #AZhan

Posted by | View Post | View Group