कहाँ से लाये हो …

कहाँ से लाये हो अंदाज़ इतने मुस्कुराने के
तुम्हारा दिल मुझे टूटा हुआ मालूम होता है

मैं इस आलम-ए-तन्हाई में भी तन्हा नहीं ऐ दोस्त
मुझे हर एक आंसू आशना मालूम होता है
#Azhan

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कहाँ से लाये हो अंदाज़ इतने मुस्कुराने के
तुम्हारा दिल मुझे टूटा हुआ मालूम होता है

मैं इस आलम-ए-तन्हाई में भी तन्हा नहीं ऐ दोस्त
मुझे हर एक आंसू आशना मालूम होता है
#Azhan

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हमारा तीर कुछ भी …

हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है
परिन्दा कोई मौसम हो ठिकाने तक पहुँचता है

धुआँ बादल नहीं होता कि बादल दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारख़ाने तक पहुँचता है

हमारी मुफ़लिसी पर आपको हँसना मुबारक हो
मगर यह तंज़ हर सैयद घराने तक पहुँचता है

मैं चाहूँ तो मिठाई की दुकानें खोल सकता हूँ
मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है

अभी ऐ ज़िन्दगी तुमको हमारा साथ देना है
अभी बेटा हमारा सिर्फ़ शाने तक पहुँचता है

सफ़र का वक़्त आ जाये तो फिर कोई नहीं रुकता
मुसाफ़िर ख़ुद से चल कर आब-ओ-दाने तक पहुँचता
#Munnavar_Rana
#Azhan

हमारा तीर कुछ भी हो निशाने तक पहुँचता है
परिन्दा कोई मौसम हो ठिकाने तक पहुँचता है

धुआँ बादल नहीं होता कि बादल दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारख़ाने तक पहुँचता है

हमारी मुफ़लिसी पर आपको हँसना मुबारक हो
मगर यह तंज़ हर सैयद घराने तक पहुँचता है

मैं चाहूँ तो मिठाई की दुकानें खोल सकता हूँ
मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है

अभी ऐ ज़िन्दगी तुमको हमारा साथ देना है
अभी बेटा हमारा सिर्फ़ शाने तक पहुँचता है

सफ़र का वक़्त आ जाये तो फिर कोई नहीं रुकता
मुसाफ़िर ख़ुद से चल कर आब-ओ-दाने तक पहुँचता
#Munnavar_Rana
#Azhan

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मैने हर रोज जमाने …

मैने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा है
उम्र के साथ जिन्दगी को ढंग बदलते देखा है

बो जो चलते थे तो शेर के चलने का होता था गुमान
उनको को भी पांव उठाने के लिये सहारे को तरसते देखा है

ज़िनकी नजरो की चमक देख कर सहम जाते थे लोग
उन्ही नजरो को बरसात की तरह रोते देखा है

ये जवानी ये ताकत ये दौलत सब कुदरत की इनायत है
इनके रहते हुए भी इंसान को बेजान हुआ देखा है

अपने आज पर इतना न इतराना मेरे यारो
वक्त की धारा में अच्छे अच्छो को मजबूर हुआ देखा है

कर सको तो किसी को खुश करके देखो
दुख देते हुए तो हमने हजारो को देखा है …

( राहत इंदौरी )
#Azhan

मैने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा है
उम्र के साथ जिन्दगी को ढंग बदलते देखा है

बो जो चलते थे तो शेर के चलने का होता था गुमान
उनको को भी पांव उठाने के लिये सहारे को तरसते देखा है

ज़िनकी नजरो की चमक देख कर सहम जाते थे लोग
उन्ही नजरो को बरसात की तरह रोते देखा है

ये जवानी ये ताकत ये दौलत सब कुदरत की इनायत है
इनके रहते हुए भी इंसान को बेजान हुआ देखा है

अपने आज पर इतना न इतराना मेरे यारो
वक्त की धारा में अच्छे अच्छो को मजबूर हुआ देखा है

कर सको तो किसी को खुश करके देखो
दुख देते हुए तो हमने हजारो को देखा है …

( राहत इंदौरी )
#Azhan

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दुश्मनी की तो क्या …

दुश्मनी की तो क्या पूछिये, दोस्ती का भरोसा नहीं
आप मुझसे भी पर्दा करें, अब किसी का भरोसा नहीं

कल ये मेरे भी आंगन में थी, जिसपे तुझको ग़ुरूर आज है
कल ये शायद तुझे छोड़ दे, इस ख़ुशी का भरोसा नही

क्या ज़रूरी हर रात में, चाँद तुमको मिले जान_ए_ जाँ
जुगनुओं से भी निस्बत रखो, चाँदनी का भरोसा नहीं

रात दिन मुस्तक़िल कोशिशें, के ज़िन्दगी कैसे बेहतर बने
इतने दुख ज़िन्दगी के लिए, और इसी का भरोसा नहीं

पत्थरों से कहो राज़े दिल, ये नः देंगे दग़ा आपको
ऐ नदीम आज के दौर में, आदमी का भरोसा नहीं ,,,

नदीम शाद
#Azhan

दुश्मनी की तो क्या पूछिये, दोस्ती का भरोसा नहीं
आप मुझसे भी पर्दा करें, अब किसी का भरोसा नहीं

कल ये मेरे भी आंगन में थी, जिसपे तुझको ग़ुरूर आज है
कल ये शायद तुझे छोड़ दे, इस ख़ुशी का भरोसा नही

क्या ज़रूरी हर रात में, चाँद तुमको मिले जान_ए_ जाँ
जुगनुओं से भी निस्बत रखो, चाँदनी का भरोसा नहीं

रात दिन मुस्तक़िल कोशिशें, के ज़िन्दगी कैसे बेहतर बने
इतने दुख ज़िन्दगी के लिए, और इसी का भरोसा नहीं

पत्थरों से कहो राज़े दिल, ये नः देंगे दग़ा आपको
ऐ नदीम आज के दौर में, आदमी का भरोसा नहीं ,,,

नदीम शाद
#Azhan

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मुहब्बत करने वालों …

मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है
सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है

तवायफ़ की तरह अपने ग़लत कामों के चेहरे पर
हुकूमत मंदिरों-मस्जिद का पर्दा डाल देती है

हुकूमत मुँह-भराई के हुनर से ख़ूब वाक़िफ़ है
ये हर कुत्ते आगे शाही टुकड़ा डाल देती है

कहाँ की हिजरतें कैसा सफ़र कैसा जुदा होना
किसी की चाह पैरों में दुपट्टा डाल देती है

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती-जुलती है
कहीं भी शाख़े-गुल देखे तो झूला डाल देती है

भटकती है हवस दिन-रात सोने की दुकानों में
ग़रीबी कान छिदवाती है तिनका डाल देती है

हसद की आग में जलती है सारी रात वह औरत
मगर सौतन के आगे अपना जूठा डाल देती है
#Azhan

मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है
सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है

तवायफ़ की तरह अपने ग़लत कामों के चेहरे पर
हुकूमत मंदिरों-मस्जिद का पर्दा डाल देती है

हुकूमत मुँह-भराई के हुनर से ख़ूब वाक़िफ़ है
ये हर कुत्ते आगे शाही टुकड़ा डाल देती है

कहाँ की हिजरतें कैसा सफ़र कैसा जुदा होना
किसी की चाह पैरों में दुपट्टा डाल देती है

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती-जुलती है
कहीं भी शाख़े-गुल देखे तो झूला डाल देती है

भटकती है हवस दिन-रात सोने की दुकानों में
ग़रीबी कान छिदवाती है तिनका डाल देती है

हसद की आग में जलती है सारी रात वह औरत
मगर सौतन के आगे अपना जूठा डाल देती है
#Azhan

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उदास आँखों से आँसू …

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते है
ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं

घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँखें मलते हैं
तमाम रात खजूरों के पेड़ जलते हैं

मैं शाह राह नहीं, रास्ते का पत्थर हूँ
यहाँ सवार भी पैदल उतर कर चलते हैं

उन्हें कभी न बताना मैं उनकी आँखें हूँ
वो लोग फूल समझकर मुझे मसलते हैं

ये एक पेड़ है, आ इस से मिलकर रो लें हम
यहाँ से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं

कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से
कहीं भी जाऊँ मेरे साथ साथ चलते हैं

बशीर बद्र
#Azhan

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते है
ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं

घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँखें मलते हैं
तमाम रात खजूरों के पेड़ जलते हैं

मैं शाह राह नहीं, रास्ते का पत्थर हूँ
यहाँ सवार भी पैदल उतर कर चलते हैं

उन्हें कभी न बताना मैं उनकी आँखें हूँ
वो लोग फूल समझकर मुझे मसलते हैं

ये एक पेड़ है, आ इस से मिलकर रो लें हम
यहाँ से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं

कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से
कहीं भी जाऊँ मेरे साथ साथ चलते हैं

बशीर बद्र
#Azhan

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तेरे वादे तेरे …

तेरे वादे तेरे प्यार का मोहताज नहीं
ये कहानी किसी किरदार की मोहताज नहीं

खाली कशकोल पे इतरायी हुई फिरती है
ये फकीरी किसी दस्तार का मोहताज नहीं

लोग होठों पे सजाये हुए फिरते हैं मुझे
मेरी शोहरत किसी अखबार का मोहताज नहीं

इसे तूफान ही किनारे से लगा सकता है
मेरी कीस्ती किसी पतवार का मोहताज नहीं

मैंने मुल्कों की तरह लोगों का दिल जीतें है
ये हुकूमत किसी तलवार का मोहताज नहीं

राहत इंदौरी साहब
#Azhan

तेरे वादे तेरे प्यार का मोहताज नहीं
ये कहानी किसी किरदार की मोहताज नहीं

खाली कशकोल पे इतरायी हुई फिरती है
ये फकीरी किसी दस्तार का मोहताज नहीं

लोग होठों पे सजाये हुए फिरते हैं मुझे
मेरी शोहरत किसी अखबार का मोहताज नहीं

इसे तूफान ही किनारे से लगा सकता है
मेरी कीस्ती किसी पतवार का मोहताज नहीं

मैंने मुल्कों की तरह लोगों का दिल जीतें है
ये हुकूमत किसी तलवार का मोहताज नहीं

राहत इंदौरी साहब
#Azhan

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मुझे रहजन से यूं …

मुझे रहजन से यूं खतरा नही था
मेरे अपनो ने कुछ छोडा नही था .

जो मौसम देख कर खुद को बदल ले
हमारे पास वो चेहरा ही नही था .

तरक्की यूँ न कर पाये कभी हम
अमीर -ए -शहर से कोई रिश्ता नही था .

ये सख्ती सिर्फ खुशियों पर ही क्यूँ थी
गमो पर क्यूँ कोई पहरा नही था .

महक बनकर बिखर जाता हवा में
बहारों ने मुझे कभी देखा ही नही था .

विजय कैसे बतायें हम अपनी कीमत
ज़मीर अपना हमने कभी बेचा नही था ….

(विजय तिवारी )
#Azhan

मुझे रहजन से यूं खतरा नही था
मेरे अपनो ने कुछ छोडा नही था .

जो मौसम देख कर खुद को बदल ले
हमारे पास वो चेहरा ही नही था .

तरक्की यूँ न कर पाये कभी हम
अमीर -ए -शहर से कोई रिश्ता नही था .

ये सख्ती सिर्फ खुशियों पर ही क्यूँ थी
गमो पर क्यूँ कोई पहरा नही था .

महक बनकर बिखर जाता हवा में
बहारों ने मुझे कभी देखा ही नही था .

विजय कैसे बतायें हम अपनी कीमत
ज़मीर अपना हमने कभी बेचा नही था ….

(विजय तिवारी )
#Azhan

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भीगी हुई आँखों का …

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा
घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर न मिलेगा

फिर याद बहुत आयेगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम
जब धूप में साया कोई सर पर न मिलेगा

आँसू को कभी ओस का क़तरा न समझना
ऐसा तुम्हें चाहत का समुंदर न मिलेगा

इस ख़्वाब के माहौल में बे-ख़्वाब हैं आँखें
बाज़ार में ऐसा कोई ज़ेवर न मिलेगा

ये सोच लो अब आख़िरी साया है मुहब्बत
इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा

बशीर बद्र
#Azhan

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा
घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर न मिलेगा

फिर याद बहुत आयेगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम
जब धूप में साया कोई सर पर न मिलेगा

आँसू को कभी ओस का क़तरा न समझना
ऐसा तुम्हें चाहत का समुंदर न मिलेगा

इस ख़्वाब के माहौल में बे-ख़्वाब हैं आँखें
बाज़ार में ऐसा कोई ज़ेवर न मिलेगा

ये सोच लो अब आख़िरी साया है मुहब्बत
इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा

बशीर बद्र
#Azhan

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तज़ल्लियों का नया …

तज़ल्लियों का नया दायरा बनाने में,
मेरे चिराग लगे हैं हवा बनाने में.

अड़े थे ज़िद पे कि सूरज बना के छोड़ेंगे,
पसीने छूट गए इक दिया बनाने में.

तमाम उम्र मुझे दरबदर जो करते रहे,
वो अब लगे हैं मेरा मक़बरा बनाने में.

मेरी निगाह में वो शख्स आदमी भी नहीं,
जिसे लगा है ज़माना खुदा बनाने में.

ये चंद लोग जो बस्ती में सबसे अच्छे हैं,
इन्हीं का हाथ है मुझको बुरा बनाने में.
# राहत इंदौर
#Azhan

तज़ल्लियों का नया दायरा बनाने में,
मेरे चिराग लगे हैं हवा बनाने में.

अड़े थे ज़िद पे कि सूरज बना के छोड़ेंगे,
पसीने छूट गए इक दिया बनाने में.

तमाम उम्र मुझे दरबदर जो करते रहे,
वो अब लगे हैं मेरा मक़बरा बनाने में.

मेरी निगाह में वो शख्स आदमी भी नहीं,
जिसे लगा है ज़माना खुदा बनाने में.

ये चंद लोग जो बस्ती में सबसे अच्छे हैं,
इन्हीं का हाथ है मुझको बुरा बनाने में.
# राहत इंदौर
#Azhan

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