Ye daulat bhi le lo ye shohrat bhi le lo

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

मुहल्ले की सबसे निशानी पुरानी
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी
वो नानी की बातों में परियों का डेरा
वो चहरे की झुरिर्यों में सदियों का फेरा
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई
वो छोटी सी रातें वो लम्बी कहानी

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना
वो गुड़िया की शादी में लड़ना झगड़ना
वो झूलों से गिरना वो गिर के सम्भलना
वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफ़े
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरोंदे बनाना बना के मिटाना
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी
वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी
न दुनिया का ग़म था न रिश्तों के बंधन
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िंदगानी

– सुदर्शन फ़ाकिर

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agar ham kahen aur wo muskura de

अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें 
हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें 

हर एक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें 
चलो ज़िन्दगी को मोहब्बत बना दें 

अगर ख़ुद को भूले तो, कुछ भी न भूले 
कि चाहत में उनकी, ख़ुदा को भुला दें 

कभी ग़म की आँधी, जिन्हें छू न पाये 
वफ़ाओं के हम, वो नशेमन बना दें 

क़यामत के दीवाने कहते हैं हमसे 
चलो उनके चहरे से पर्दा हटा दें 

सज़ा दें, सिला दें, बना दें, मिटा दें 
मगर वो कोई फ़ैसला तो सुना दें
Sudarshan faakir

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Aaj ke daur me e dost

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है 
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है 

जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है 
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है 

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी 
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है

ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब “फ़ाकिर” 
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है

Sudarshan faakir

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Dosti

हमसे पूछो दोस्ती का सिला 
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा 

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Samne hai jo use log bura kehte hain

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं 

जिसको देखा ही नहीं उसको ख़ुदा कहते हैं 

ज़िन्दगी को भी सिला* कहते हैं कहनेवाले 

जीनेवाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं 

फ़ासले उम्र के कुछ और बढा़ देती है 

जाने क्यूँ लोग उसे फिर भी दवा कहते हैं 

चंद मासूम से पत्तों का लहू है “फ़ाकिर” 

जिसको महबूब के हाथों की हिना* कहते हैं

* सिला – इनाम, उपहार 

* हिना – मेहंदी 

    सुदर्शन फ़ाकिर 

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Samne hai jo use log bura kehte hain

Jisko dekha hi nahin usko khuda kehte hai 

Zindagai ko bhi sila kahte hai kahne wale

Jeene wale to gunahon ki saza kehte hain

Faasle umar ke kuchh aur badha deti hai

Jane kyun log use phir bhi dawa kehte hai 

Chand masoom se patton ka lahoo hai Faakir

Jisko mahboob ke haathon ki hina kehte hain

Sudarshan Faakir 

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