Unki gali mein jaata hoon

उनकी गली में जाता हूँ तो क़दम मेरे रुक जाते हैं

देख के वो हँसते हैं मुझको पर्दे में छुप जाते हैं

उनका मुस्काना फूलों को इतना अच्छा लगता है
उनकी एक मुस्कान पे गुल हँसते-हँसते थक जाते हैं

वो गर काँटे भी दें तो फूल से नाज़ुक लगते हैं
वर्ना ये भी होता है मुझे फूल चुभ जाते हैं

ख़ुशबू तितली चाँद सितारे उनके संग-संग चलते हैं
रुक जाएँ तो लहरेँ साँसे दरिया भी रुक जाते हैं

उनकी बोली उनकी बातें उनकी पायल की छम-छम
बागों मेँ गाते पंछी जब सुनते हैं चुप जाते हैं

उनके एक इशारे पर सब मिलकर मुझे सताते हैं
देख के हाथोँ में ख़त पंछी दूरी से ही उड़ जाते हैं

मैँ उनकी आँखों का दिवाना बन बैठा तो हैरत क्या
नज़र उठा लेते हैं वो जब तारे भी गिर जाते हैं

उनकी ज़ुल्फें बादल हैं या काली-काली राते हैँ
जिनके साये में आकर हम सूरज से बच जाते हैं

Siraj faisal khan

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There baad mausam suhane nahi hai

तेरे बाद मौसम सुहाने नहीं हैं

फिज़ाओं में अब वो तराने नहीं हैं

बढ़ाया था आगे हमें दोस्तों ने
कि आशिक़ तो हम भी पुराने नहीं हैं

किसी काम के अब नहीं रह गए ये
मगर ख़त तुम्हारे जलाने नहीं हैं

ये बिकती है ये बात सबको पता है
मोहब्बत की लेकिन दुकानें नहीं हैं

आओ मोहब्बत में वादे करें हम
मगर याद रखना निभाने नहीं हैँ

किसी काम की फिर नहीं उनकी सूरत
मेरे साथ उनके फसाने नहीं हैं

पतंगे तो अब भी उड़ाएँगे लेकिन
हमे अब कबूतर उड़ाने नहीं हैं

ये माना कि सब ज़ख़्म अपनो से पाए
मगर दुश्मनों को दिखाने नहीं हैं

तभी दोस्ती अब मैँ करता नहीं हूँ
मुझे और दुश्मन बनाने नहीं हैं

ख़ुदा सबको देता नहीं है मोहब्बत
ये पल भूलकर भी भुलाने नहीं हैं

Siraj Faisal khan

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Roz naya ek khwab sajana bhool gaye

रोज़ नया एक ख़्वाब सजाना भूल गए

हम पलकों से बोझ उठाना भूल गए

साथ निभाने की कसमें खाने वाले
भूले तो सपनों में आना भूल गए

उसे भुलाने की इतनी कसमें खाईं
कि हम अपना पता ठिकाना भूल गए

नज़र मिलाना जबसे तुमने छोड़ दिया
हम लोगोँ से हाथ मिलाना भूल गए

शहर में आकर क्या पाया कुछ याद नहीं
गाँव की गलियाँ वक़्त पुराना भूल गए

मंज़िल तक जिन लोगों को पहुँचाया था
वही हमारा साथ निभाना भूल गए

पीने वाले मस्जिद तक कैसे आए
हैरत है ग़ालिब मैख़ाना भूल गए

झूठों ने सारी सच्ची बातें सुन लीं
सूली पर मुझको लटकाना भूल गए

ज़रा जवानी ढली तो दुनिया बदल गई
वो नज़रों से तीर चलाना भूल गए

तुमने जबसे छत पर आना शुरु किया
लोग उतरकर नीचे जाना भूल गए

चकाचौंध में बिजली की ऐसे खोए
क़ब्रों पर हम दिये जलाना भूल गए

तेज़ धूप से कुछ ऐसा घबराए वो
औरों के घर आग लगाना भूल गए

दर्द पे कुछ लिखने की मैंने क्या सोची
मीर भी अपना दर्द सुनाना भूल गए

सुकरात को देकर ज़हर उन्होंने मार दिया
बातों को वो ज़हर पिलाना भूल गए

भला ग़रीबों से क्यों तुमको नफ़रत है
लगता है तुम बुरा ज़माना भूल गए

अँग्रेज़ी का भूत चढ़ा ऐसा सिर पर
बच्चे हिन्दी में तुतलाना भूल गए

वह भी पहचान नहीं पाया हमको
हम भी उसको याद दिलाना भूल गए

Siraj Faisal khan

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Bad iske mujhe gham de ke rulaya jaye

बाद इसके मुझे ग़म दे के रुलाया जाए

पहले रोने का सलीक़ा तो सिखाया जाए ।

हुस्न को चाँद जवानी को कँवल लिख दूँगा
कोई ऐसा मुझे दुनियाँ मेँ दिखाया जाए ।

वो बुरा कह के मुझे ख़ुद भी तो शर्मिन्दा है
सोँचता है मुझे सीने से लगाया जाए ।

जान जब आ के अटक जाए मेरे होटोँ पर
मुझको ग़ालिब का कोई शे’र सुनाया जाए ।

उनसे शिकवा है शिकायत है गिला भी लेकिन
मैँ चला आऊँगा गर मुझको बुलाया जाए ।

Siraz Faisal khan

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Aankho ko meri chand sunehra dikhayi de

आँखों को मेरी चाँद सुनहरा दिखाई दे
सोकर उठूँ तो माँ का ही चेहरा दिखाई दे

कहती है मुसीबत कि तेरे पास क्या आऊँ
चारों तरफ दुआओं का पहरा दिखाई दे

कब तक करुँ मुज़ाहिरा सड़कों पे बैठकर
शासन मुझे यहाँ का तो बहरा दिखाई दे

बरसे नहीं बादल तो बरसने लगीं आँखें
फसलों पे अब किसानों को ख़तरा दिखाई दे

सींचा था जिस चमन को शहीदों ने लहू से
अपनों की ही वजह वो उजड़ा दिखाई दे

– सिराज फ़ैसल ख़ान

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