Tere shher se jaane ki har koshish nakaam hui

तेरे शहर से जाने की हर कोशिश नाकाम हुई

ख़्वाब भी पूरा हुआ नहीँ शब भी यूँ तमाम हुई

मौत से पहले भी शायद कई बार हम मरते हैँ
तब तब जान गई मेरी जब हसरत नीलाम हुई

सदियोँ से इस दुनियाँ ने प्यार को क्या ईनाम दिया
मजनूँ ने पत्थर खाए लैला भी बदनाम हुई

इश्क़, मोहब्बत, नफ़रत, मज़हब, यकजहती की इक कोशिश
इसी मेँ पैदा हुए थे सब इसी मेँ सबकी शाम हुई

siraj faisal khan

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Gir ke uthne mein sambhlne mein bahut waqt laga

गिर के उठने में सम्भलने में बहुत वक़्त लगा

ग़म-ए-उल्फत से निकलने में बहुत वक़्त लगा

नज़र से गिरने में इक पल नहीं लगा लेकिन
किसी के दिल में उतरने में बहुत वक़्त लगा

मैं इंतज़ार में छत पे खड़ा रहा पहरों
चाँद को आज निकलने में बहुत वक़्त लगा

कितनी दुशवार थीं राहें तेरे इंकार के बाद
अपने घर तक भी पहुँचने में बहुत वक़्त लगा

ख़ुदा ने दुनिया बना दी पलक झपकते ही
मेरा नसीब बदलने में बहुत वक़्त लगा

तेरा अफ़साना-ए-ग़म भी अजीब है ‘फ़ैसल’
देखने सुनने समझने में बहुत वक़्त लगा


Siraj faisal khan

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Roothe huye logo ko manana nahi aata

रूठे हुए लोगों को मनाना नहीं आता

सज्दे के सिवा सर को झुकाना नहीं आता

पत्थर तो चलाना मुझे आता है दोस्तो
शाख़ों से परिन्दों को उड़ाना नहीं आता

नफ़रत तो जताने में नहीं चूकते हो तुम
हैरत है तुम्हें प्यार जताना नहीं आता

मैं इसलिए नाकाम मोहब्बत में रह गया
झूठा मुझे वादा या बहाना नहीं आता

सारे शहर को राख मेँ तब्दील कर गया
कहते थे उसे आग लगाना नहीं आता

होटों पे सजी रहती है मुस्कान इसलिए
सीने मेँ मुझे दर्द छुपाना नहीं आता

Siraj faisal khan

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Gaon ki dhool bhari galiyon se shhar ki sadkon tak

गाँव की धूल भरी गलियों से शहर की सड़कों तक

ठोकर खाते-खाते आए हैं हम सपनों तक

बात शुरू की ज़िक्र से तेरे, मैख़ाने में पर
चलते-चलते आ पहुँचे हम दिल के ज़ख्मों तक

कितनी रातें जाग के काटीं पूछो तो हमसे
वक़्त लगा कितना आने में उनके होंठों तक

कितना ही मैं ख़ुद को छुपाऊँ कितना ही बहलाऊँ
आँसू आ ही जाते हैं पर मेरी पलकों तक

रोज़ ग़ज़ल का फूल लगा देते ज़ुल्फ़ों में हम
अगर हमारे हाथ पहुँचते उनकी ज़ुल्फ़ों तक

siraj faisal khan

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Ajeeb dard liye fir raha hoon pyar mein main

अजीब दर्द लिए फिर रहा हूँ प्यार में मैं

किसी को छोड़ के आया हूँ इंतज़ार में मैं

ग़रीबी ख़ुद ही परीशान होके कहने लगी
पड़ी रहूँगी भला कब तलक बिहार में मैं

मैं तो काँटा हूँ बहारोँ से मुझे क्या मतलब
कभी खिला ही नहीँ आज तक बहार में मैं

हर तरफ मज़हबी नफ़रत है, सियायत है यहाँ
जिऊँ तो कैसे जिऊँ अब तेरे संसार में मैं

siraj faisal khan

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Apne anzam ka kab kisko pata hota hai

अपने अन्जाम का कब किसको पता होता है

मैं जहाँ हाथ लगाता हूँ बुरा होता है

मेरी आवारगी भी कम नहीँ इबादत से
जब मैँ पी लेता हूँ होटों पे ख़ुदा होता है

उम्र भर साथ निभाएँगे सभी कहते हैँ
ऐसा दिखलाओ हक़ीकत मेँ कहाँ होता है

बिना मतलब किसी से अब कोई नहीं मिलता
हर मुलाक़ात में मक़सद भी छुपा होता है

आपके आने की आहट-सी मुझे मिलती है
देखता हूँ तो वहाँ सिर्फ़ धुआँ होता है

ख़्वाब मेँ रोज़ मैं बाहों में उसे भरता हूँ
आँख खुलती है तो वो मुझसे जुदा होता है

गर वो एहसान जताए ‘सिराज’ कह देना
लूट ले मुझको अगर तेरा भला होता है

siraj faisal khan

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Gandhi ji ko gaon mein dikhta tha hindustaan

गाँधी जी को गाँवों में दिखता था हिन्दुस्तान

जहाँ है आज भी टूटी सड़केँ अंधकार अज्ञान

हिन्दु मुस्लिम सिख ईसाई हैं भारत की संतान
‘अतिथि देवो भव:’ से भी है भारत की पहचान

मौलवी पंडित उन लोगोँ को भड़का पाते हैँ
जिन लोगोँ ने पढ़ी नहीं है गीता और कुरान

आज़ादी के साठ बरस मेँ क्या-क्या बदला है
चार क़दम चलकर तो देखेँ संसद के भगवान ।

Siraj faisal khan

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Jidhar bhi dekhiye bas khoon ka sailab dikhta hai

जिधर भी देखिए बस ख़ून का सैलाब दिखता है

अयोध्या श्रीनगर के साथ ही गुजरात दिखता है

है लाचारी ग़रीबी गर मेरी आँखोँ से देखोगे
तुम्हारी आँखोँ से तुमको जो नक्सलवाद दिखता है

ये सी.एम. और पी.एम. क्या दबा लेता है वो सबको
मुझे तो भारत में अपने ठाकरे-राज दिखता है

तवाइफ़ करती है बर्बाद कुछ लोगोँ को कोठे पर
सियासत तेरे हाथोँ तो जहाँ बर्बाद दिखता है

ये क़ौमी-एकता पाठ दरिया मेँ कहीँ फेको
परीक्षा के हवाले से ये सब बेकार दिखता है ।

Siraj faisal khan

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Jidhar bhi dekhiye bas khoon ka sailab dikhta hai

जिधर भी देखिए बस ख़ून का सैलाब दिखता है

अयोध्या श्रीनगर के साथ ही गुजरात दिखता है

है लाचारी ग़रीबी गर मेरी आँखोँ से देखोगे
तुम्हारी आँखोँ से तुमको जो नक्सलवाद दिखता है

ये सी.एम. और पी.एम. क्या दबा लेता है वो सबको
मुझे तो भारत में अपने ठाकरे-राज दिखता है

तवाइफ़ करती है बर्बाद कुछ लोगोँ को कोठे पर
सियासत तेरे हाथोँ तो जहाँ बर्बाद दिखता है

ये क़ौमी-एकता पाठ दरिया मेँ कहीँ फेको
परीक्षा के हवाले से ये सब बेकार दिखता है ।

Siraj faisal khan

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Doob gaya main yaar kinare par

डूब गया मैं यार किनारे पर वादों की कश्ती में 

और ज़माना कहता है कि डूबा हूँ मैं मस्ती में ।

ठीक से पढ़ भी नहीं सका और भीग गईं आँखें मेरी
मीर को रख कर भेज दिया है ग़ालिब ने इक चिठ्ठी में ।

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई हैं 
सरकारी ऐलान हुआ है आज हमारी बस्ती में ।

रोज़ कमीशन लग के वेतन बढ़ जाता है अफ़सर का
और ग़रीबी पिसती जाती मंहगाई की चक्की में ।Siraj faisal khan

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