Qatl kare jo masoomon ka baithe chand sitaron par

क़त्ल करें जो मासूमों का बैठें चाँद सितारों पर

किसका हक़ है हमें बता ऐ जन्नत तेरी बहारों पर

हमने जान बचाई है कुछ भोले-भाले बच्चों की
लिक्खा जाए नाम हमारा मस्जिद की मीनारों पर

धूल झोंकते हैं जनता की आँखों मेँ जो रोज़ो -शब
लानत ऐसे नेताओं पर लानत है गद्दारों पर

शौक़ से खेलो ख़ून की होली लेकिन ये भी याद रहे
हमने भी इतिहास लिखा है दिल्ली की दीवारों पर

हिन्द के दुश्मन होश में आएँ भूलें मत ये सच्चाई
हिन्दुस्तानी चल सकते हैं काँटों और अंगारों पर

ये अंधा कानून अगर इंसाफ़ हमें देना चाहे
ख़ून के धब्बे देख ले आकर बस्ती की दीवारों पर

लाशों का सौदा करते हैं ये नापाक हुकूमत से
आग लगा दो शहर के इन सब बिके हुए अख़बारों पर

क़लम छुपाए बैठे हैं जो आज हुकूमत के डर से
सदियाँ लानत भेजेंगी ऐसे घटिया फ़नकारों  पर

siraj faisal khan

Posted by | View Post | View Group
Advertisements

Aap jab aankhon mein aakar baith jaate hai

आप जब आँखों में आकर बैठ जाते हैं

नींद के मुझसे फरिश्ते रुठ जाते हैं

आपके हँसने से मेरी साँस चलती है
आपके रोने पे तारे टूट जाते हैं

आपका जब पल दो पल का साथ मिलता है
मेरे पीछे सौ ज़माने छूट जाते हैं

आप जब मुझको इशारे से बुलाते हैँ
हम ख़ुशी में सच है चलना भूल जाते हैं

आपके संग होटोँ पे मुस्कान रहती है
आपके बिन हँसते पौधे सूख जाते हैं

रुठने से आपके तो कुछ नहीँ होता
जान जाती है मेरी जब दूर जाते हैं

आपकी नज़दीकियाँ मदहोश करती हैं
आपकी आँखों में सागर डूब जाते हैं ।

siraj faisal khan

Posted by | View Post | View Group

Dard mein bhi apne chehre ko tum hansta rakhna

दर्द में भी अपने चेहरे को तुम हँसता रखना ।

मेरी ग़ज़लों से तुम ख़ुद को बावस्ता रखना ।

आपके अपनों में शामिल हूँ इतना काफी है,
लेकिन मुझको अपने दिल का भी हिस्सा रखना ।

दुआ है मेरी शोहरत आपके क़दमोँ को चूमे
लेकिन मुझ तक वापस आने का रस्ता रखना ।

ख़ुश रहने का राज़ बताया है नेहरु जी ने, 
नन्हे-मुन्ने बच्चों से तुम भी रिश्ता रखना ।

तितली का इल्ज़ाम है कि तुम गुल के क़ातिल हो,
फूल क़िताबों में ना कोई आइन्दा रखना ।

siraj faisal khan

Posted by | View Post | View Group

Main rota hoon mere rone ko sab nakli samajhte h

मैँ रोता हूँ मेरे रोने को सब नकली समझते हैं ।

मगर संसद के घड़ियालों को सब मछली समझते हैं ।

मची है लूट सारे मुल्क में हालात हैँ बदतर,
लुटेरों की वो जन्नत है जिसे दिल्ली समझते हैं ।

वो ख़ुश है उसके भाषण पर बजी हैं तालियाँ लेकिन,
सियासत में सभी वादों को हम ‘रस्मी’ समझते हैं ।

हमें मालूम ना था छुपके मिलते हो रक़ीबों से,
तुम्हारी ज़ात को हम आज तक असली समझते हैं ।

तरक्की आपको और आपके शहरों को मुबारक,
हम अपने गाँव को ही दोस्तो इटली समझते हैं ।

फरेब खाकर हज़ारों इश्क़ में ख़ामोश बैठी है,
मुहल्ले वाले नाहक ही उसे पगली समझते हैं ।

किसी के ग़म में रो रोकर धुले हैं रंग सब उसके,
वही तस्वीर कि जिसको सभी धुँधली समझते हैं ।

वो एक दिन धूप में आये थे तो पानी बहुत बरसा,
मेरे घरवाले उस दिन से उन्हें बदली समझते है ।

siraj faisal khan

Posted by | View Post | View Group

Mere bare mein apni soch ko thoda badalkar dekh

मेरे बारे में अपनी सोच को थोड़ा बदलकर देख ।

मुझसे भी बुरे हैं लोग तू घर से निकलकर देख ।

शराफ़त से मुझे नफ़रत है ये जीने नहीं देती,
कि तुझको तोड़ लेंगे लोग तू फूलों सा खिलकर देख ।

ज़रुरी तो नहीं जो दिख रहा है सच मेँ वैसा हो
ज़मीं को जानना है ग़र तो बारिश में फिसलकर देख ।

पता लग जाएगा अपने ही सब बदनाम करते हैं ।
कभी ऊँचाइयोँ पर तू भी अपना नाम लिखकर देख ।

अगर मैँ कह नहीं पाया तो क्या चाहा नहीं तुझको
मोहब्बत की सनद चाहे तो मेरे घर पे चलकर देख ।

तुझे ही सब ज़माने में बुरा कहते हैँ क्यों ‘फ़ैसल’
बिखर जाएगा यूँ ना सोच दीवाने संभलकर देख ।

siraj faisal khan

Posted by | View Post | View Group

Kafn par aansu girana chhod de

कफ़्न पर आँसू गिराना छोड़ दे ।

बेवफा अब तो बहाना छोड़ दे ।

नींद पर वर्ना सितम ढाऊँगा मैं,
मान जा ख़्वाबोँ मेँ आना छोड़ दे ।

शौक़ ये बर्बाद कर देगा तुझे,
तितलियों के पर जलाना छोड़ दे ।

अपना क़द दुनिया की नज़रों में बढ़ा,
मुझको नज़रों से गिराना छोड़ दे ।

दर्द पाएगा बहुत रोएगा तू,
ख़त किताबों में छुपाना छोड़ दे ।

कोशिशें कर जीतने की मुझसे तू
ख़्वाब में मुझको हराना छोड़ दे ।

हसरतों से आसमाँ मत देख तू
उड़ना है तो आशियाना छोड़ दे ।

इश्क से परहेज़ है जिसको भी, वो
मीर-ओ-ग़ालिब घराना छोड़ दे ।

अपनी फितरत किसने छोड़ी है ‘सिराज’
फूल कैसे मुस्कुराना छोड़ दे ।

siraj faisal khan

Posted by | View Post | View Group

Aag seene mein muhabbat ki laga dete hai

आग सीने में मोहब्बत की लगा देते हैं

“मीर” मिलते हैं मुझे जब भी रुला देते हैं

एक तुम हो कि गुनाह कह के टाल जाते हो
एक “ग़ालिब” हैं कि हर रोज़ पिला देते हैं

मैंने “राहत” से कहा फूँक दो दिल की दुनिया
वो मेरे ख़त को उठाते हैं जला देते हैं

जब भी “राना” से मोहब्बत का पता पूछता हूँ
हँस के माँ पर वो कोई शे’र सुना देते हैं ।

siraj faisal khan

Posted by | View Post | View Group

Hadse sab ki hi kismat mein likhon kis kis par

हादसे सबकी ही क़िस्मत में लिखूँ किस-किस पर

सारी दुनिया है मुसीबत मेँ लिखूँ किस-किस पर

तेरे बारे में लिखूँ गर मिले फुर्सत ख़ुद से
मैं परीशाँ हूँ हक़ीक़त में लिखूँ किस-किस पर

इश्क़ “ग़ालिब” की अमानत है वफ़ा “साहिर” की
दिल तो है “मीर” की सोहबत में लिखूँ किस-किस पर

उम्र भर मन्दिर-ओ-मस्जिद से ही फ़ुर्सत ना मिली
ज़िन्दगी कट गई नफ़रत में लिखूँ किस-किस पर

Siraj faisal khan

Posted by | View Post | View Group

Phoolon ki tum hayat ho taro ka noor ho

फूलों की तुम हयात हो तारों का नूर हो

रहती हो मेरे दिल में मगर दूर-दूर हो

ना तुम ख़ुदा हो, ना हो फरिश्ता, ना हूर हो
लेकिन मैँ खिंचा जाता हूँ कुछ तो ज़रूर हो

हूरें फलक़ से आती हैं दीदार को उसके
जब हुस्न ऐसा पास हो क्यों ना गुरूर हो

सारा शहर तबाह है उल्फ़त में तुम्हारी
तुम क़त्ल भी करती हो फिर बेक़ुसूर हो

लिख्खेगा ग़ज़ल ताजमहल-सी कोई ‘सिराज’
थोड़ी-सी इनायत जो आपकी हुज़ूर हो

siraj faisal khan

Posted by | View Post | View Group

Bhool sakte tumhe to kab ka bhula dete ham

भूल सकते तुम्हें तो कब का भुला देते हम

ख़ाक जो होती मोहब्बत तो उड़ा देते हम

ख़ुदकुशी जुर्म ना होती ख़ुदा की नज़रों में 
कब का इस जिस्म को मिट्टी में मिला देते हम

बना रख्खी हैं तुमने दूरियाँ हमसे वर्ना
कोई दीवार जो होती तो गिरा देते हम

तुमने कोशिश ही नहीं की हमें समझने की
फिर भला कैसे तुम्हें हाल सुना देते हम

आपने आने का पैग़ाम तो भेजा होता
तमाम शहर को फूलों से सजा देते हम

Siraj faisal khan

Posted by | View Post | View Group