Ulte seedhe sapne paale baithe hai

उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं
सब पानी में काँटा डाले बैठे हैं

इक बीमार वसीयत करने वाला है
रिश्ते नाते जीभ निकाल बैठे हैं

बस्ती का मामूल पे आना मुश्किल है
चौराहे पर वर्दी वाले बैठे हैं

धागे पर लटकी है इज़्ज़त लोगों की
सब अपनी दस्तार सँभाले बैठे हैं

साहब-ज़ादा पिछली रात से ग़ायब है
घर के अंदर रिश्ते वाले बैठे हैं

आज शिकारी की झोली भर जाएगी
आज परिंदे गर्दन डाले बैठे हैं

Shakeel zamaali

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Safar se lout jaana chahta hai

सफ़र से लौट जाना चाहता है
परिंदा आशियाना चाहता है

कोई स्कूल की घंटी बजा दे
ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है

उसे रिश्ते थमा देती है दुनिया
जो दो पैसे कमाना चाहता है

यहाँ साँसों के लाले पड़ रहे हैं
वो पागल ज़हर खाना चाहता है

जिसे भी डूबना हो डूब जाए
समंदर सूख जाना चाहता है

हमारा हक़ रक्खा है जिस ने
सुना है हज को जाना चाहता है

Shakeel zamaali

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Saare bhoole bisron ki yaad aati hai

सारे भूले बिसरों की याद आती है
एक ग़ज़ल सब ज़ख्म हरे कर जाती है

पा लेने की ख़्वाहिश से मोहतात रहो
महरूमी की बीमारी लग जाती है

ग़म के पीछे मारे मारे फिरना क्या
ये दौलत तो घर बैठे आ जाती है

दिन के सब हंगामे रखना ज़ेहनों में
रात बहुत सन्नाटे ले कर आती है

दामन तो भर जाते हैं अय्यारी से
दस्तर-ख़्वानों से बरकत उठ जाती है

रात गए तक चलती है टीवी पर फ़िल्म
रोज़ नमाज़-ए-फज्र क़ज़ा हो जाती है

Shakeel zamaali

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Rishton ke daldal se kaise niklenge

रिश्तों के दलदल से कैसे निकलेंगे
हर साज़िश के पीछे अपने निकलेंगे

चाँद सितारे गोद में आ कर बैठ गए
सोचा ये था पहली बस से निकलेंगे

सब उम्मीदों के पीछे मायूसी है
तोड़ो ये बदाम भी कड़वे निकलेंगे

मैं ने रिश्ते ताक़ पे रख कर पूछ लिया
इक छत पर कितने परनाले निकलेंगे

जाने कब ये दौड़ थमेगी साँसों की
जाने कब पैरों से जूते निकलेंगे

हर कोने से तेरी ख़ुशबू आएगी
हर संदूक में तेरे कपड़े निकलेंगे

अपने ख़ून से इतनी तो उम्मीदें है
अपने बच्चे भीड़ से आगे निकलेंगे

Shakeel zammali

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Koi bhi daar se zinda nahi utarta hai

कोई भी दार से ज़िंदा नहीं उतरता है
मगर जुनून हमारा नहीं उतरता है

तबाह कर दिया अहबाब को सियासत ने
मगर मकान से झण्डा नहीं उतरता है

मैं अपने दिल के उजड़ने की बात किस से कहूँ
कोई मिज़ाज पे पूरा नहीं उतरता है

कभी क़मीज के आधे बटन लगाते थे
और अब बदन से लबादा नहीं उतरता है

मुसालेहत के बहुत रास्ते हैं दुनिया में
मगर सलीब से ईसा नहीं उतरता है

जुआरियों का मुक़द्दर ख़राब है शायद
जो चाहिए वही पत्ता नहीं उतरता है

Shakeel zamaali

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Khane ko to zahar bhi khaya ja sakta hai

खाने को तो ज़हर भी खाया जा सकता है
लेकिन उस को फिर समझाया जा सकता है

इस दुनिया में हम जैसे भी रह सकते हैं
इस दलदल पर पाँव जमाया जा सकता है

सब से पहले दिल के ख़ाली-पन को भरना
पैसा सारी उम्र कमाया जा सकता है

मैं ने कैसे कैसे सदमे झेल लिए हैं
इस का मतलब ज़हर पचाया जा सकता है

इतना इत्मिनान है अब भी उन आँखों में
एक बहाना और बनाया जा सकता है

झूठ में शक की कम गुंजाइश हो सकती है
सच को जब चाहो झुठलाया जा सकता है

Shakeel zamaali

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Jhooth sachhai ka hissa ho gaya

झूठ सच्चाई का हिस्सा हो गया
इक तरह से ये भी अच्छा हो गया

उस ने इक जादू भरी तक़रीर की
क़ौम का नुक़सान पूरा हो गया

शहर में दो-चार कम्बल बाँट कर
वो समझता है मसीहा हो गया

ये तेरी आवाज़ नम क्यूँ हो गई
ग़म-ज़दा मैं था तुझे क्या हो गया

बे-वफाई आ गई चौपाल तक
गाँव लेकिन शहर जैसा हो गया

सच बहुत सजता था मेरी ज़ात पर
आज ये कपड़ा भी छोटा हो गया

Shakeel zamaali

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Alfaaz narm ho gaye lehje badal gaye

अल्फ़ाज नर्म हो गए लहजे बदल गए
लगता है ज़ालिमों के इरादे बदल गए

ये फ़ाएदा ज़रूर हुआ एहतिजाज से
जो ढो रहे थे हम को वो काँधे बदल गए

अब ख़ुशबुओं के नाम पते ढूँडते फिरो
महफ़िल में लड़कियों के दुपट्ट बदल गए

ये सरकशी कहाँ है हमारे ख़मीर में
लगता है अस्पताल में बच्चे बदल गए

कुछ लोग है जो झेल रहे हैं मुसीबतें
कुछ लोग हैं जो वक़्त से पहले बदल गए

मुझ को मिरी पसंद का सामे तो मिल गया
लेकिन ग़ज़ल के सारे हवाले बदल गए

Shakeel zamali

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Alfaaz narm ho gaye lehje badal gaye

अल्फ़ाज नर्म हो गए लहजे बदल गए
लगता है ज़ालिमों के इरादे बदल गए

ये फ़ाएदा ज़रूर हुआ एहतिजाज से
जो ढो रहे थे हम को वो काँधे बदल गए

अब ख़ुशबुओं के नाम पते ढूँडते फिरो
महफ़िल में लड़कियों के दुपट्ट बदल गए

ये सरकशी कहाँ है हमारे ख़मीर में
लगता है अस्पताल में बच्चे बदल गए

कुछ लोग है जो झेल रहे हैं मुसीबतें
कुछ लोग हैं जो वक़्त से पहले बदल गए

मुझ को मिरी पसंद का सामे तो मिल गया
लेकिन ग़ज़ल के सारे हवाले बदल गए

Shakeel zamali

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Agar hamare hi dil me thikana chahiye tha

अगर हमारे ही दिल मे ठिकाना चाहिए था
तो फिर तुझे ज़रा पहले बताना चाहिए था

चलो हमी सही सारी बुराईयों का सबब
मगर तुझे भी ज़रा सा निभाना चाहिए था

अगर नसीब में तारीकियाँ ही लिक्खीं थीं
तो फिर चराग़ हवा में जलाना चाहिए था

मोहब्बतों को छुपाते हो बुज़दिलों की तरह
ये इश्तिहार गली में लगाना चाहिए था

जहाँ उसूल ख़ता में शुमार होते हों
वहाँ वक़ार नहीं सर बचाना चाहिए था

लगा के बैठ गए दिल को रोग चाहत का
ये उम्र वो थी कि खाना कमाना चाहिए था

– शकील जमाली

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