Jaan ke sath gaya sab sar o saman apna

जान के साथ गया सब सर-ओ-सामान अपना

दिल से निकला न मगर एक भी अरमान अपना
कुछ इस अंदाज से नाव अपनी डुबो ली हमने

देखते रह गए मुँह सारे ही तूफ़ान अपना
थी बड़ी फ़िक्र कि मौत आएगी हमको कैसी

कर दिया आपने ये काम भी आसान अपना
देखकर जिसको बदल लेती हैं रस्ता ख़ुशियां

दिल ने उस ग़म को बना रक्खा है दरबान अपना
आईने को यूँही है़रत से तकेगा कब तक

अजनबी चेहरों में इक चेहरा तो पहचान अपना
बुतपरस्ती के तरफ़दार न थे हम लेकिन

आपको देखके जाता रहा ईमान अपना
घर रहा घर न बयाबां ही बयाबान रहा

है बयाबान ही घर,घर ही बयाबान अपना
दर्द आसानी से शेरों में कहाँ ढलते हैं

उम्र गुज़री, न मुकम्मल हुआ दीवान अपना

#राजेश_रेड्डी

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Ham dhuen mein zara utre dhuan khulne laga

हम धुएँ में जब ज़रा उतरे, धुआँ खुलने लगा ।
राख में मलबा कुरेदा तो मकाँ खुलने लगा ।

जैसे-जैसे उस तआल्लुक़ का गुमाँ खुलने लगा,
क्या नहीं था और क्या था दरमियाँ खुलने लगा ।

हमने तो उसके इक आँसू को ज़रा खोला था बस,
फिर तो अपने आप ही वो बेज़ुबाँ खुलने लगा ।

नाउमीदी, अश्क़, तनहाई, उदासी, हसरतें,
रफ़्ता-रफ़्ता ज़िन्दगी का हर निशाँ खुलने लगा ।

हमने जब छोड़ा उसे दैरो-हरम में ढूँढ़ना,
बन्द पलकों में हमारी लामकाँ खुलने लगा ।

हमने अपनी ज़ात से बाहर रखा पहला क़दम,
और हमारे सामने सारा जहाँ खुलने लगा ।

जैसे-जैसे दोस्तों से दोस्ती गहरी हुई,
पीठ के हर ज़ख्म का इक-इक निशाँ खुलने लगा ।

उम्र ढलने पर समझ में ज़िन्दगी आने लगी,
जब सिमटने लग गए पर, आसमाँ खुलने लगा ।

Rajesh Reddy

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Udhar parinde ko jab aasmaan kheenchta hai

उधर परिन्दे को जब आसमान खींचता है ।
इधर ज़मीन पे कोई कमान खींचता है ।

वो खींच लेता है मेरी जुबाँ से अपनी ही बात,
कुछ और बोलूँ तो ज़ालिम जुबान खींचता है ।

चले ही जाते हैं इक और ख़्वाब के पीछे,
सराब बनके यक़ीं को गुमान खींचता है ।

बड़े मकान के बेटे के सब तो है फिर भी,
हमें वो गाँव का कच्चा मकान खींचता है ।

ये वक़्त है वो ज़मींदार जिसका कारिन्दा,
हर एक साँस का हमसे लगान खींचता है ।

कोई तो है जो बुरे वक़्त का बिछाता है जाल,
जो देके दाने परों से उड़ान खींचता है ।

नज़र उठाता नहीं बज़्म में किसी की तरफ़,
कुछ इस तरह से भी वो सबका ध्यान खींचता है ।

है ज़िन्दगी कि कोई टी० वी० सीरियल यारब,
बिना कहानी के क्यूँ दास्तान खींचता है ।

Rajesh Reddy

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Zindgi tune lahu leke diya kuchh bhi nahi

ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं| 
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं|
 
मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशि ले लो, 
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं|
 
हमने देखा है कई ऐसे ख़ुदाओं को यहाँ,
सामने जिन के वो सच मुच का ख़ुदा कुछ भी नहीं|
 
या ख़ुदा अब के ये किस रंग से आई है बहार, 
ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं|
 
दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह, 
या तो सब कुछ ही इसे चाहिये या कुछ भी नहीं| 

Rajesh Reddy

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Ye jo zindgi ki kitab hai

ये जो ज़िन्दगी की किताब है ये किताब भी क्या किताब है|
कहीं इक हसीन सा ख़्वाब है कहीं जान-लेवा अज़ाब है| 

कहीं छाँव है कहीं धूप है कहीं और ही कोई रूप है,
कई चेहरे इस में छुपे हुए इक अजीब सी ये नक़ाब है|
 
कहीं खो दिया कहीं पा लिया कहीं रो लिया कहीं गा लिया,
कहीं छीन लेती है हर ख़ुशी कहीं मेहरबान बेहिसाब है|
 
कहीं आँसुओं की है दास्ताँ कहीं मुस्कुराहटों का बयाँ, 
कहीं बर्क़तों की है बारिशें कहीं तिश्नगी बेहिसाब है| 

Rajesh Reddy

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Kafas mein rehke khula aasman bhool gaye

क़फ़स में रहके खुला आसमान भूल गए
फिर उसके बाद परिन्दे उड़ान भूल गए

हर एक शख़्स इशारों में बात करता है
ये क्या हुआ कि सब अपनी ज़ुबान भूल गए

ज़मीं का होश रहा और न आसमाँ की ख़बर
किसी की याद में दोनों जहान भूल गए

फरिश्ते खुशियों के आए थे बाँटने ख़ुशियाँ
वो सबके घर गए मेरा मकान भूल गए

सबक़ वो हमको पढ़ाए हैं ज़िन्दगी ने कि हम
मिला था जो भी किताबों से ज्ञान भूल गए

वो खुशनसीब हैं, सुनकर कहानी परियों की
जो अपनी दर्द भरी दास्तान भूल गए

Rajesh Reddy

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Mitti ka zism le ke main pani ke ghar mein hoon

मिट्टी का जिस्म लेके मैं पानी के घर में हूँ
मंज़िल है मेरी मौत, मैं हर पल सफ़र में हूँ

होना है मेरा क़त्ल ये मालूम है मुझे
लेकिन ख़बर नहीं कि मैं किसकी नज़र में हूँ

पीकर भी ज़हरे-ज़िन्दगी ज़िन्दा हूँ किस तरह
जादू ये कौन-सा है, मैं किसके असर में हूँ

अब मेरा अपने दोस्त से रिश्ता अजीब है
हर पल वो मेरे डर में है, मैं उसके डर में हूँ

मुझसे न पूछिए मेरे साहिल की दूरियाँ
मैं तो न जाने कब से भँवर-दर-भँवर में हूँ

Rajesh Reddy

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Mere khuda main apne khayaalo ka kya karoon

मेरे ख़ुदा मैं अपने ख़यालों को क्या करूँ
अंधों के इस नगर में उजालों को क्या करूँ

चलना ही है मुझे मेरी मंज़िल है मीलों दूर
मुश्किल ये है कि पाँवों के छालों को क्या करूँ

दिल ही बहुत है मेरा इबादत के वास्ते
मस्जिद को क्या करूँ मैं शिवालों को क्या करूँ

मैं जानता हूँ सोचना अब एक जुर्म है
लेकिन मैं दिल में उठते सवालों को क्या करूँ

जब दोस्तों की दोस्ती है सामने मेरे
दुनिया में दुश्मनी की मिसालों को क्या करूँ 

Rajesh reddy

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Jane kitni udaan baaki hai

जाने कितनी उड़ान बाक़ी है
इस परिन्दे में जान बाक़ी है

जितनी बँटनी थी बँट चुकी ये ज़मीं
अब तो बस आसमान बाक़ी है

अब वो दुनिया अजीब लगती है
जिसमें अम्नो-अमान बाक़ी है

इम्तिहाँ से गुज़र के क्या देखा
इक नया इम्तिहान बाक़ी है

सर कलम होंगे कल यहाँ उनके
जिनके मुँह में ज़ुबान बाकी है

Rajesh Reddy

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Hoon dekhiye to aandhi mein bas ek shazar gaya

यूँ देखिये तो आंधी में बस इक शजर गया
लेकिन न जाने कितने परिन्दों का घर गया

जैसे ग़लत पते पे चला आए कोई शख़्स
सुख ऐसे मेरे दर पे रुका और गुज़र गया

मैं ही सबब था अबके भी अपनी शिकस्त का
इल्ज़ाम अबकी बार भी क़िस्मत के सर गया

अर्से से दिल ने की नहीं सच बोलने की ज़िद
हैरान हूँ मैं कैसे ये बच्चा सुधर गया

उनसे सुहानी शाम का चर्चा न कीजिए
जिनके सरों पे धूप का मौसम ठहर गया

जीने की कोशिशों के नतीज़े में बारहा
महसूस ये हुआ कि मैं कुछ और मर गया

Rajesh Reddy

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