Tumhari anjuman se uth ke deewane kaha jate

तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़साने कहाँ जाते

निकल कर दैर-ओ-क़ाबा से अगर मिलता न मैख़ाना
तो ठुकराए हुए इन्साँ ख़ुदा जाने कहाँ जाते

तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादाख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते

चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी
वगरना हम ज़माने को ये समझाने कहाँ जाते

‘क़तील’ अपना मुक़द्दर ग़म से बेग़ाना अगर होता
तो फिर अपने-पराए हमसे पहचाने कहाँ जाते

Qateel shifai

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Toone ye phool jo zulfon mein laga rakkha hai

तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में लगा रखा है 
इक दिया है जो अँधेरों में जला रखा है 

जीत ले जाये कोई मुझको नसीबों वाला 
ज़िन्दगी ने मुझे दाँव पे लगा रखा है 

जाने कब आये कोई दिल में झाँकने वाला 
इस लिये मैंने ग़िरेबाँ को खुला रखा है 

इम्तेहाँ और मेरी ज़ब्त का तुम क्या लोगे 
मैं ने धड़कन को भी सीने में छुपा रखा है 

दिल था एक शोला मगर बीत गये दिन वो क़तील, 
अब क़ुरेदो ना इसे राख़ में क्या रखा है

Qateel shifai

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Tum poochho aur main na bataoon

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं 
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं 

किस को ख़बर थी साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं 
सावन आया लेकिन अपनी क़िस्मत में बरसात नहीं 

माना जीवन में औरत एक बार मोहब्बत करती है 
लेकिन मुझको ये तो बता दे क्या तू औरत ज़ात नहीं 

ख़त्म हुआ मेरा अफ़साना अब ये आँसू पोंछ भी लो 
जिस में कोई तारा चमके आज की रात वो रात नहीं 

मेरे ग़मगीं होने पर अहबाब हैं यों हैरान “क़तील” 
जैसे मैं पत्थर हूँ मेरे सीने में जज़्बात नहीं

Qateel shifai

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Shaam ka sanwale chehre ko nikhara jaye

शाम के साँवले चेहरे को निखारा जाये 
क्यों न सागर से कोई चाँद उभारा जाये

रास आया नहीं तस्कीं का साहिल कोई 
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाये 

मेहरबाँ तेरी नज़र, तेरी अदायें क़ातिल 
तुझको किस नाम से ऐ दोस्त पुकारा जाये 

मुझको डर है तेरे वादे पे भरोसा करके 
मुफ़्त में ये दिल-ए-ख़ुशफ़हम न मारा जाये 

जिसके दम से तेरे दिन-रात दरख़्शाँ थे “क़तील” 
कैसे अब उस के बिना वक़्त गुज़ारा जाये 

Qateel shifai

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Sadma to hai mujhe bhi ki tujhse juda hoon main

सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं 
लेकिन ये सोचता हूँ कि अब तेरा क्या हूँ मैं 

बिखरा पड़ा है तेरे ही घर में तेरा वजूद 
बेकार महफ़िलों में तुझे ढूँढता हूँ मैं 

मैं ख़ुदकशी के जुर्म का करता हूँ ऐतराफ़ 
अपने बदन की क़ब्र में कब से गड़ा हूँ मैं 

किस-किसका नाम लाऊँ ज़बाँ पर कि तेरे साथ 
हर रोज़ एक शख़्स नया देखता हूँ मैं 

ना जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम 
दुनिया समझ रही है के सब कुछ तेरा हूँ मैं 

ले मेरे तजुर्बों से सबक ऐ मेरे रक़ीब 
दो चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूँ मैं 

जागा हुआ ज़मीर वो आईना है “क़तील” 
सोने से पहले रोज़ जिसे देखता हूँ मैं 

Qateel shifai

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Raks karne ka mila hukm jo dariyaon mein

रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में
हमने ख़ुश होके भँवर बाँध लिये पावों में 

उन को भी है किसी भीगे हुए मंज़र की तलाश
बूँद तक बो न सके जो कभी सहराओं में

ऐ मेरे हम-सफ़रों तुम भी थाके-हारे हो
धूप की तुम तो मिलावट न करो चाओं में

जो भी आता है बताता है नया कोई इलाज
बट न जाये तेरा बीमार मसीहाओं में

हौसला किसमें है युसुफ़ की ख़रीदारी का 
अब तो महंगाई के चर्चे है ज़ुलैख़ाओं में 

जिस बरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है 
उस को दफ़्नाओ मेरे हाथ की रेखाओं में 

वो ख़ुदा है किसी टूटे हुए दिल में होगा
मस्जिदों में उसे ढूँढो न कलीसाओं में 

हम को आपस में मुहब्बत नहीं करने देते
इक यही ऐब है इस शहर के दानाओं में 

मुझसे करते हैं “क़तील” इस लिये कुछ लोग हसद
क्यों मेरे शेर हैं मक़बूल हसीनाओं में

Qateel shifai

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Rachi hai ratjago ki chandni jin ki zabeeno mein

रची है रतजगो की चाँदनी जिन की जबीनों में
“क़तील” एक उम्र गुज़री है हमारी उन हसीनों में

वो जिन के आँचलों से ज़िन्दगी तख़लीक होती है
धड़कता है हमारा दिल अभी तक उन हसीनों में

ज़माना पारसाई की हदों से हम को ले आया
मगर हम आज तक रुस्वा हैं अपने हमनशीनों में

तलाश उनको हमारी तो नहीं पूछ ज़रा उनसे
वो क़ातिल जो लिये फिरते हैं ख़ंज़र आस्तीनों में

Qateel shifai

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Pyas wo dil ki bujhane kabhi aaya bhi nahi

प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया भी नहीं 
कैसा बादल है जिसका कोई साया भी नहीं 

बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी 
एक मुद्दत से हमें उस ने सताया भी नहीं 

रोज़ आता है दर-ए-दिल पे वो दस्तक देने 
आज तक हमने जिसे पास बुलाया भी नहीं 

सुन लिया कैसे ख़ुदा जाने ज़माने भर ने 
वो फ़साना जो कभी हमने सुनाया भी नहीं 

तुम तो शायर हो “क़तील” और वो इक आम सा शख़्स 
उसने चाहा भी तुझे और जताया भी नहीं 

Qateel shifai

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Preshan raat saari hai sitaro tum bhi so jao

परेशाँ रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ
सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारों तुम तो सो जाओ

हँसो और हँसते-हँसते डूबते जाओ ख़लाओं में
हमें ये रात भारी है सितारों तुम तो सो जाओ

तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया
ये बाज़ी हमने हारी है सितारों तुम तो सो जाओ

कहे जाते हो रो-रो के हमारा हाल दुनिया से
ये कैसी राज़दारी है सितारों तुम तो सो जा

हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा
यही क़िस्मत हमारी है सितारों तुम तो सो जाओ

हमें भी नींद आ जायेगी हम भी सो ही जायेंगे
अभी कुछ बेक़रारी है सितारों तुम तो सो जाओ

Qateel shifai

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Pehle to apne dil ki raza jaan jaiye

पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइये
फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइये

पहले मिज़ाज-ए-राहगुज़र जान जाइये
फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइये

कुछ कह रही है आपके सीने की धड़कने
मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइये

इक धूप सी जमी है निगाहों के आस पास
ये आप हैं तो आप पे क़ुर्बान जाइये

शायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो
आँखों में झाँक कर हमें पहचान जाइये

Qateel shifai

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