Muhabbat

दिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती
ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती

Posted by | View Post | View Group

Zakhm

शायद कुछ दिन और लगेंगे, ज़ख़्मे-दिल के भरने में,
जो अक्सर याद आते थे वो कभी-कभी याद आते हैं।

Posted by | View Post | View Group

Garaj baras pyasi dharti par

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला 
चिड़ियों को दाना, बच्चों को गुड़धानी दे मौला 

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है 
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला 

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें 
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला 

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा 
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला 

तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो 
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला

Nida fazli

Posted by | View Post | View Group

Garaj baras pyasi dharti par

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला 
चिड़ियों को दाना, बच्चों को गुड़धानी दे मौला 

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है 
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला 

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें 
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला 

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा 
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला 

तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो 
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला

Nida fazli

Posted by | View Post | View Group

Besan ki sondhi roti par

बेसन की सोंधी रोटी पर 
खट्टी चटनी जैसी माँ 

याद आती है चौका-बासन 
चिमटा फुकनी जैसी माँ 

बाँस की खुर्री खाट के ऊपर 
हर आहट पर कान धरे 

आधी सोई आधी जागी 
थकी दोपहरी जैसी माँ 

चिड़ियों के चहकार में गूंजे
राधा-मोहन अली-अली 

मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती 
घर की कुंडी जैसी माँ 

बिवी, बेटी, बहन, पड़ोसन 
थोड़ी थोड़ी सी सब में 

दिन भर इक रस्सी के ऊपर 
चलती नटनी जैसी माँ 

बाँट के अपना चेहरा, माथा, 
आँखें जाने कहाँ गई 

फटे पुराने इक अलबम में 
चंचल लड़की जैसी माँ

Nida fazli

Posted by | View Post | View Group

Besan ki sondhi roti par

बेसन की सोंधी रोटी पर 
खट्टी चटनी जैसी माँ 

याद आती है चौका-बासन 
चिमटा फुकनी जैसी माँ 

बाँस की खुर्री खाट के ऊपर 
हर आहट पर कान धरे 

आधी सोई आधी जागी 
थकी दोपहरी जैसी माँ 

चिड़ियों के चहकार में गूंजे
राधा-मोहन अली-अली 

मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती 
घर की कुंडी जैसी माँ 

बिवी, बेटी, बहन, पड़ोसन 
थोड़ी थोड़ी सी सब में 

दिन भर इक रस्सी के ऊपर 
चलती नटनी जैसी माँ 

बाँट के अपना चेहरा, माथा, 
आँखें जाने कहाँ गई 

फटे पुराने इक अलबम में 
चंचल लड़की जैसी माँ

Nida fazli

Posted by | View Post | View Group

Kabhi kisi ko mukkamal jaha nahi milta

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबा नहीं मिलता

बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिस में धुआँ नहीं मिलता

तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो
जहाँ उम्मीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

Nida fazli

Posted by | View Post | View Group

Kabhi kisi ko mukkamal jaha nahi milta

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबा नहीं मिलता

बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिस में धुआँ नहीं मिलता

तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो
जहाँ उम्मीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

Nida fazli

Posted by | View Post | View Group