Mai roya pardes me bhiga maa ka pyar

मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार 
दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार 
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार 
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार

लेके तन के नाप को घूमे बस्ती गाँव 
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव 
सबकी पूजा एक सी अलग-अलग हर रीत 
मस्जिद जाये मौलवी कोयल गाये गीत 
पूजा घर में मूर्ती मीर के संग श्याम 
जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दाम

सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर 
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फ़कीर 
अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप 
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप

सपना झरना नींद का जागी आँखें प्यास 
पाना खोना खोजना साँसों का इतिहास 
चाहे गीता बाचिये या पढ़िये क़ुरान 
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान

Nida Fazli

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Kahin chhat thi deewar-o-dar the kahin

कहीं छत थी दीवार-ओ-दर थे कहीं 
मिला मुझको घर का पता देर से 
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे 
मगर जो दिया वो दिया देर से

हुआ न कोई काम मामूल से 
गुज़ारे शब-ओ-रोज़ कुछ इस तरह 
कभी चाँद चमका ग़लत वक़्त पर 
कभी घर में सूरज उगा देर से

कभी रुक गये राह में बेसबब 
कभी वक़्त से पहले घिर आई शब 
हुये बंद दरवाज़े खुल खुल के सब 
जहाँ भी गया मैं गया देर से

ये सब इत्तिफ़ाक़ात का खेल है 
यही है जुदाई यही मेल है 
मैं मुड़ मुड़ के देखा किया दूर तक 
बनी वो ख़ामोशी सदा देर से

सजा दिन भी रौशन हुई रात भी 
भरे जाम लहराई बरसात भी 
रहे साथ कुछ ऐसे हालात भी 
जो होना था जल्दी हुआ देर से

भटकती रही यूँ ही हर बंदगी 
मिली न कहीं से कोई रौशनी 
छुपा था कहीं भीड़ में आदमी 
हुआ मुझ में रौशन ख़ुदा देर से

Nida Fazli

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Kabhi kabhi yu bhi humne apne jee ko behlaya hai

कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है 
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है

हमसे पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी
हमने भी इस शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है

उससे बिछड़े बरसों बीते लेकिन आज न जाने क्यों 
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारण धमकाया है

कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें की 
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है

Nida Fazli

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Jeewan kya hai chalta firta ek khilona hai

जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है 
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है

जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है 
हर जीवन जीवन जीने का समझौता है 
अब तक जो होता आया है वो ही होना है

रात अँधेरी भोर सुहानी यही ज़माना है 
हर चादर में दुख का ताना सुख का बाना है 
आती साँस को पाना जाती साँस को खोना है

Nida Fazli

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Jeewan kya hai chalta firta ek khilona hai

जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है 
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है

जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है 
हर जीवन जीवन जीने का समझौता है 
अब तक जो होता आया है वो ही होना है

रात अँधेरी भोर सुहानी यही ज़माना है 
हर चादर में दुख का ताना सुख का बाना है 
आती साँस को पाना जाती साँस को खोना है

Nida Fazli

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Jahan na teri mehak ho udhar na jau mai

जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैं 
मेरी सरिश्त सफ़र है गुज़र न जाऊँ मैं 

मेरे बदन में खुले जंगलों की मिट्टी है 
मुझे सम्भाल के रखना बिखर न जाऊँ मैं 

मेरे मिज़ाज में बे-मानी उलझनें हैं बहुत 
मुझे उधर से बुलाना जिधर न जाऊँ मैं 

कहीं पुकार न ले गहरी वादियों का सबूत 
किसी मक़ाम पे आकर ठहर न जाऊँ मैं 

न जाने कौन से लम्हे की बद-दुआ है ये 
क़रीब घर के रहूँ और घर न जाऊँ मैं

Nida Fazli

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Jahan na teri mehak ho udhar na jau mai

जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैं 
मेरी सरिश्त सफ़र है गुज़र न जाऊँ मैं 

मेरे बदन में खुले जंगलों की मिट्टी है 
मुझे सम्भाल के रखना बिखर न जाऊँ मैं 

मेरे मिज़ाज में बे-मानी उलझनें हैं बहुत 
मुझे उधर से बुलाना जिधर न जाऊँ मैं 

कहीं पुकार न ले गहरी वादियों का सबूत 
किसी मक़ाम पे आकर ठहर न जाऊँ मैं 

न जाने कौन से लम्हे की बद-दुआ है ये 
क़रीब घर के रहूँ और घर न जाऊँ मैं

Nida Fazli

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Jab kisi se koi gila rakhna

जब किसी से कोई गिला रखना 
सामने अपने आईना रखना 

यूँ उजालों से वास्ता रखना 
शम्मा के पास ही हवा रखना 

घर की तामीर चाहे जैसी हो 
इस में रोने की जगह रखना 

मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिये 
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना 

मिलना जुलना जहाँ ज़रूरी हो 
मिलने-जुलने का हौसला रखना

Nida Fazli

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Har ghadi khud se ulajhna hai mukaddar mera

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा 
मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समंदर मेरा 

किससे पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ बरसों से 
हर जगह ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा 

एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे 
मेरी आँखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा 

मुद्दतें बीत गईं ख़्वाब सुहाना देखे 
जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा 

आईना देखके निकला था मैं घर से बाहर 
आज तक हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा

Nida Fazli

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Duniya jise kehte hai jadu ka khilona hai

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है 
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है

अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम 
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने 
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं 
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है

ये वक्त जो तेरा है, ये वक्त जो मेरा 
हर गाम पर पहरा है, फिर भी इसे खोना है

आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आंगन को 
आकाश की चादर है धरती का बिछौना है
Nida Fazli

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