Dar to mujhe kiska hai ke main kuchh nahi kehta

डर तो मुझे किसका है के मैं कुछ नहीं कहता| 

पर हाल ये अफ़्शाँ है के मैं कुछ नहीं कहता| 

नासेह ये गिला है के मैं कुछ नहीं कहता, 
तू कब मेरी सुनता है के मैं कुछ नहीं कहता| 

कुछ ग़ैर से होंठों में कहे है जो पूछो, 
तो वहीं मुकरता है के मैं कुछ नहीं कहता| 

नासेह को जो चाहूँ तो अभी ठीक बना दूँ, 
पर ख़ौफ़ ख़ुदा का है के मैं कुछ नहीं कहता| 

चुपके से तेरे मिलने का घर वालों में तेरे, 
इस वास्ते चर्चा है के मैं कुछ नहीं कहता| 

ऐ चारागरो क़बिल-ए-दरमाँ नहीं ये दर्द, 
वर्ना मुझे सौदा है के मैं कुछ नहीं कहता| 

हर वक़्त है दुश्नाम हर एक बात पे ताना, 
फिर इस पे भी कहता है के मैं कुछ नहीं कहता| 

“मोमिन” बा-ख़ुदा सिहर बयानी का जभी तक, 
हर एक को दावा है के मैं कुछ नहीं कहता|

Momin khan momin

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Maar hi daal mujhe chasm e Ada se pehle

मार ही डाल मुझे चश्म-ए-अदा से पहले| 

अपनी मंज़िल को पहुँच जाऊं क़ज़ा से पहले| 
इक नज़र देख लूँ आ जाओ क़ज़ा से पहले, 
तुम से मिलने की तमन्ना है ख़ुदा से पहले| 

हश्र के रोज़ मैं पूछूँगा ख़ुदा से पहले, 
तू ने रोका नहीं क्यूँ मुझको ख़ता से पहले| 
ऐ मेरी मौत ठहर उनको ज़रा आने दे, 
ज़हर क जाम न दे मुझको दवा से पहले| 

हाथ पहुँचे भी न थे ज़ुल्फ़ तक “मोमिन”, 
हथकड़ी डाल दी ज़ालिम ने ख़ता से पहले| 

Momin khan momin

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Jalta hoon hizr e shahid o yad e sharaab mein

जलता हूँ हिज्र-ए-शाहिद-ओ-याद-ए-शराब में| 

शौक़-ए-सवाब ने मुझे डाला अज़ाब में|
 
कहते हैं तुम को होश नहीं इज़्तराब में, 
सारे गिले तमाम हुए एक जवाब में| 

फैली शमीम-ए-यार मेरे अश्क-ए-सुर्ख़ से, 
दिल को ग़ज़ब फ़िशार हुआ पेच-ओ-ताब में| 

रहते हैं जमा कूचा-ए-जानाँ में ख़ास-ओ-आम, 
आबाद एक घर है जहान-ए-ख़राब में| 

बदनाम मेरे गिरिया-ए-रुसवा से हो चुके, 
अब उज़्र क्या रहा निगाह-ए-बेहिजाब में| 

मतलब की जुस्तजू ने ये क्या हाल कर दिया, 
हसरत भी नहीं दिल-ए-नाकामयाब में| 

नाकामियों से काम रहा उम्र भर हमें, 
पिरी में यास है जो हवस थी शबाब में| 

क्या जलवे याद आये के अपनी ख़बर नहीं, 
बे-बादा मस्त हूँ मैं शब-ए-माहताब में| 

पैहम सजूद पा-ए-सनम पर दम-ए-विदा, 
“मोमिन” ख़ुदा को भूल गये इज़्तराब में| 

Momin khan momin

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Shab tum Jo bazm e ghair mein aankein Chura gaye

शब तुम जो बज़्म-ए-ग़ैर में आँखें चुरा गये| 

खोये गये हम ऐसे के अग़्यार पा गये| 

मजलिस में उस ने पान दिया अपने हाथ से, 
अग़्यार सब्ज़ बख़्त थे हम ज़हर खा गये| 

ग़ैरों से हो वो पर्दानशीं क्यों न बेहिजाब, 
दम हाय बे-असर मेरे पर्दा उठा गये| 

वाइज़ के ज़िक्र-ए-मेहर-ए-क़यामत को क्या कहूँ, 
आलम शब-ए-वस्ल के आँखों में छा गये| 

दुनिया ही से गया मैं जो नहीं नाज़ से कहा,
अब भी गुमान-ए-बद न गये तेरे या गये| 

ऐ “मोमिन” आप कब से हुए बंदा-ए-बुताँ, 
बारे हमारे ??? में हज़रत भी आ गये| 

Momin khan momin

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Shab e gham e furkat hamein Kya Kya maze dikhlaye tha

शब-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त हमें क्या क्या मज़े दिखलाए था| 

दम रुके था सीने में कम्बख़्त जी घबराए था| 

बल बे अय्यारी अदू के आगे वो पैमान शिकन, 
वादा-ए-वस्ल फिर करता था और शर्माए था| 

सुन के मेरी मर्ग बोले मर गया अच्छा हुआ, 
क्या बुरा लगता था जिस दम सामने आ जाए था| 

बात शब को उस के मना-ए-बेक़रारी से बड़ी, 
हम तो समझे और कुछ वो और कुछ समझाए था| 

कोई दिन तो उस पे क्या तस्वीर का आलम रहा, 
हर कोई हैरत का पुतला देख कर बन जाए था| 

सू-ए-सहरा ले चले उस कू से मेरी नाश हाए, 
था यही दर इन दिनों तलवा मेरा खुजलाए था| 

हो गई दो रोज़ की उल्फ़त में क्या हालत अभी, 
“मोमिन”-ए-वहशी को देखा इस तरफ़ से जाए था| 

Momin khan momin

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Dil qabil e muhabbat e Jana nahi raha

दिल क़ाबिल-ए-मोहब्बत-ए-जानाँ नहीं रहा 

वो वलवला, वो जोश, वो तुग़याँ नहीं रहा

करते हैं अपने ज़ख़्म-ए-जिगर को रफ़ू हम आप 
कुछ भी ख़्याल-ए-जुम्बिश-ए-मिज़गाँ नहीं रहा 

क्या अच्छे हो गए कि भलों से बुरे हुए 
यारों को फ़िक्र-ए-चारा-ओ-दरमाँ नही रहा 

किस काम के रहे जो किसी से रहा न काम 
सर है मगर ग़ुरूर का सामाँ नहीं रहा 

मोमिन ये लाफ़-ए-उलफ़त-ए-तक़वा है क्यों अबस 
दिल्ली में कोई दुश्मन-ए-ईमाँ नहीं रहा 

Momin khan momin

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Ye hasil hai to Kya hasil bayan se

ये हासिल है तो क्या हासिल बयाँ से

कहूँ कुछ और कुछ निकले ज़ुबाँ से

बुरा है इश्क़ का अंजाम यारब
बचना फ़ितना-ए-आखिर ज़माँ से

मेरा बचना बुरा है आप ने क्यों
अयादत की लब-ए-मोजज़ बयाँ से

वो आए हैं पशेमाँ लाश पर अब
तुझे ए ज़िन्दगी लाऊँ कहाँ से

न बोलूँगा न बोलूँगा कि मैं हूँ
ज़्यादा बद गुमाँ उस बदगुमाँ से

न बिजली जलवा फ़रमा है न सय्याद
निकल कर क्या करें हम आशयाँ से

बुरा अंजाम है आग़ाज़-ए-बद का
जफ़ा की हो गई खू इमतिहाँ से

खुदा की बेनियाज़ी हाय ‘मोमिन
हम ईमाँ लाए थे नाज़-ए-बुताँ से

Momin khan momin

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Dafn jab khaq mein ham sokhta saman hongein

दफ़्न जब ख़ाक में हम सोख़्ता सामाँ होंगे

फ़स्ल माही के गुल-ए-शम्अ-ए- शबिस्ताँ होंगे

नावक अंदाज़ जिधर दीदा-ए-जानाँ होंगे
नीम- बिस्मिल कई होंगे,कई बेजाँ होंगे

करके ज़ख़्मी मुझे नादिम हों यह मुमकिन नहीं
गर वो होंगे भी तो बे-वक़्त पशेमाँ होंगे

तू कहाँ जाएगी कुछ अपना ठिकाना कर ले
हम तो कल ख़्वाब-ए-अदम में शब-ए-हिजराँ होंगे

एक हम हैं कि हुए ऐसे पशेमान कि बस
एक वो हैं कि जिन्हें चाह के अरमाँ होंगे

हम निकालेंगे सुन ए मौज-ए-हवा बल तेरा
उसकी ज़ुल्फ़ों के अगर बाल परेशाँ होंगे

सब्र यारब मेरी वहशत का पड़ेगा कि नहीं
चारा-फ़रमा भी कभी क़ैदी-ए-ज़िन्दाँ होंगे

दाग़े-दिल निकलेंगे तुरबत से मेरी जूँ-लाला
यह वो अख़गर नहीं जो ख़ाक में पिनहाँ होंगे

चाक परदा से यह ग़मज़े हैं तो ऐ परदानशीं 
एक मैं क्या कि सभी चाक-गरेबाँ होंगे

फिर बहार आई वही दश्त नवर्दी होगी
फिर वही पाँव वही ख़ार-ए-मुग़ीलाँ होंगे

मिन्नत-ए-हज़रत-ए-ईसा न उठाएँगे कभी
ज़िन्दगी के लिए शर्मिन्दा-ए-एहसाँ होंगे?

संग और हाथ वही, वो ही सर-ओ-दाग़ए-जुनूँ
वह ही हम होंगे, वही दश्त-ओ-बयाबाँ होंगे

उम्र तो सारी कटी इश्क़-ए-बुताँ में ‘मोमिन’
आख़री उम्र में क्या ख़ाक़ मुसलमाँ होंगे

Momin khan momin

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Tujhpe toofan uthaye logon ne

मुझपे तूफ़ाँ उठाये लोगों ने

मुफ़्त बैठे बिठाये लोगों ने

कर दिए अपने आने-जाने के
तज़किरेजाये-जाये लोगों ने

वस्ल की बात कब बन आयी थी
दिल से दफ़्तर बनाये लोगों ने

बात अपनी वहाँ न जमने दी
अपने नक़्शे जमाये लोगों ने

सुनके उड़ती-सी अपनी चाहत की
दोनों के होश उड़ाये लोगों ने

बिन कहे राज़हा-ए-पिन्हानी
उसे क्योंकर सुनाये लोगों ने

क्या तमाशा है जो न देखे थे
वो तमाशे दिखाये लोगों ने

कर दिया ‘मोमिन’ उस सनम को ख़फ़ा
क्या किया हाये- हाये लोगों ने

Momin khan momin

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Momin su e sharq us bute qafir ka to hear hai

मोमिन’ सू-ए-शर्क़ उस बुते-क़ाफ़िर का तो घर है

हम सिजदा किधर करते हैं और का’बा किधर है

हसरत अगर मैं देखूँ तो फ़लक़ क्योंकर न हो राम
उस नरगिसे-जादू को निगह पेशे-नज़र है

ख़त की मुझे क़ासिद को है ईनाम की ख़ाहिश
मैं दस्तनिगर ख़ुद हूँ, वह क्या दस्तनिगर है

अरमान निकलने दे बस ऐ बीमे-नज़ाकत
हाँ हाथ तसव्वुर में मेरा ज़ेरे-कमर है

रिन्दों पे यह बेदाद ख़ुदा से नहीं डरता
ऐ मुहतसिब ऐसा तुझे क्या शाह का डर है

ऐसे दमे-आराम असर-ख़ुफ़्ता कब उठा
हमको अबस उम्मीद दुआहाए-सहर है

हम हाल कहे जायेंगे सुनिये कि न सुनिये
इतना ही तो याँ सुहबते-नासेह का असर है

वह ज़िबह करें और यहाँ जान फ़िदा हो
ऐसे से निभे यूँ यह हमारा ही जिगर है

अब नहीं जाती तेरे आ जाने की उम्मीद
गो फिर गयीं आँखें पर निगाह जानिबे-दर है

Momin khan momin

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