Maqrooz ke bigade huye khayalaat ki maanind

मक़रूज़ के बिगड़े हुए ख़यालात की मानिंद 

मज़बूर के होठों के सवालात की मानिंद 

दिल का तेरी चाहत में अजब हाल हुआ है
सैलाब से बर्बाद मकानात की मानिंद 

मैं उस में भटकते हुए जुगनू की तरह हूँ
उस शख्स की आँख हैं किसी रात की मानिंद 

दिल रोज़ सजाता हूँ मैं दुल्हन की तरह से
ग़म रोज़ चले आते हैं बारात की मानिंद 

अब ये भी नहीं याद के क्या नाम था उसका 
जिस शख्स को माँगा था मुनाजात की मानिंद 

किस दर्जा मुकद्दस है तेरे क़ुर्ब की ख्वाहिश 
मासूम से बच्चे के ख़यालात की मानिंद 

उस शख्स से मेरा मिलना मुमकिन ही नहीं था 
मैं प्यास का सेहरा हूँ वो बरसात की मानिंद 

समझाओ ‘मोहसिन’ उसको के अब तो रहम करे
ग़म बाँटता फिरता है वो सौगात की मानिंद

Mohsin naqvi

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Main khud zameen hoon magar zarf aasmaan ka hai

मैं खुद ज़मीन हूँ मगर ज़र्फ़ आसमान का है 

कि टूट कर भी मेरा हौसला चट्टान का है 

बुरा ना मान मेरे हर्फ़ ज़हर जहर सही
मैं क्या करूँ यही जायका मेरी जुबान का है 

बिछड़ते वक्त से मैं अब तलक नहीं रोयी 
वो कह गया था यही वक्त इम्तिहान का है

हर एक घर पे मुसल्लत है दिल की वीरानी 
तमाम शहर पे साया मेरे मकान का है 

ये और बात अदालत है बे-खबर वरना 
तमाम शहर में चर्चा मेरे बयान का है 

असर दिखा ना सका उसके दिल में अश्क मेरा 
ये तीर भी किसी टूटी हुयी कमान का है 

कफस तो खैर मुकद्दर में था मगर ‘मोहसिन’
हवा में शोर अभी तक मेरी उड़ान का है

Mohsin naqvi

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Jab se usne shahar chhoda har raasta sunsaan hua

जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रस्ता सुनसान हुआ 

अपना क्या है सारे शहर का इक जैसा नुकसान हुआ 

मेरे हाल पे हैरत कैसी दर्द के तनहा मौसम में 
पत्थर भी रो पड़ते हैं इनसान तो फिर इंसान हुआ 

उस के ज़ख्म छुपा कर रखिये खुद उस शख्स की नज़रों से
उस से कैसा शिकवा कीजे वो तो अभी नादान हुआ 

यूं भी कम-आमेज़ था “मोहसिन” वो इस शहर के लोगों में 
लेकिन मेरे सामने आकर और ही कुछ अन्जाम हुआ

Mohsin naqvi

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Ek diya dil mein jalana bhi bujha bhi dena

इक दिया दिल में जलाना भी बुझा भी देना

याद करना भी उसे रोज़ भूला भी देना

क्या कहूँ ये मेरी चाहत है के नफरत उसकी
नाम लिखना भी मेरा लिख के मिटा भी देना 

फिर न मिलने को बिछड़ता हूँ मैं तुझसे लेकिन
मुड़ के देखूँ तो पलटने की दुआ भी देना 

ख़त भी लिखना उसे मायूस भी रहना उससे
जुर्म करना भी मग़र खुद को सज़ा भी देना 

मुझको रस्मों का तकल्लुफ भी गवारा लेकिन
जी में आये तो ये दीवार गिरा भी देना 

उससे मंसूब भी कर लेना पुराने किस्से
उसके बालों में नया फूल सज़ा भी देना

सूरते नक़्शे-कदम दश्त में रहना मोहसिन
अपने होने से न होने का पता भी देना

Mohsin naqvi

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Us ne door rehne ka mashwara bhi likha hai

उस ने दूर रहने का मशवरा भी लिखा है

साथ ही मुहब्बत का वास्ता भी लिखा है

उस ने ये भी लिखा है मेरे घर नहीं आना
साफ़ साफ़ लफ़्ज़ों में रास्ता भी लिखा है

कुछ हरूफ लिखे हैं ज़ब्त की नसीहत में
कुछ हरूफ में उस ने हौसला भी लिखा है

शुक्रिया भी लिखा है दिल से याद करने का
दिल से दिल का है कितना फ़ासला भी लिखा है

क्या उसे लिखें ‘मोहसिन’ क्या उसे कहें ‘मोहसिन’
जिस ने कर के बे-जान, फिर जान-ए-जाँ भी लिखा है

Mohsin naqvi

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Ye rounaken ye log ye ghar chhod jaoonga

ये रौनकें ये लोग ये घर छोड़ जाऊंगा 

इक दिन में रौशनी का नगर छोड़ जाऊंगा 

मरने से पेश्तर मेरी आवाज़ मत चुरा
मैं अपनी जायदाद इधर छोड़ जाऊंगा

कातिल मेरा निशान मिटाने पे है बा-जिद….
मैं भी सीना’न की नोक पे सर छोड़ जाऊँगा

तू ने मुझे चिराग समझ कर बुझा दिया
लेकिन तेरी लिये में सहर छोड़ जाऊँगा

आ’इन्दा नसल मुझ को पढ़ेगी ग़ज़ल ग़ज़ल
मैं हर्फ़ हर्फ़ अपना हुनर छोड़ जाऊँगा..

तुम अपने आबलों को बचाते हो किस लिये ?
मैं तो सफ़र में रखत-ए-सफ़र छोड़ जाऊँगा

मैं अपने डूबने की अलामत के तौर पर!
दरिया में एक आध भंवर छोड़ जाऊँगा

लश्कर करेंगे मेरी दलेरी पे तबसरे
मर कर भी ज़िन्दगी की खबर छोड़ जाऊँगा

“मोहसिन” मैं उस के ज़ख्म खरीदूंगा एक दिन
और उस के पास लाल-ओ-गौहर छोड़ जाऊँगा

Mohsin naqvi

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Kis ne sang e khamoshi fenka sare bazar par

किस ने संग-ए-ख़ामोशी फेंका सरे बाज़ार पर 

इक सुकूत-ए-मर्ग जारी है दर-ओ-दीवार पर 

तू ने अपनी ज़ुल्फ़ के साये में अफ़साने कहे 
मुझको जंजीरें मिली हैं जुर्रत-ए-इज़हार पर 

शाख-ए-उरयाँ पर खिला, फूल इस अंदाज़ से 
जिस तरह ताज़ा लहू चमके नयी तलवार पर 

संगदिल अहबाब के दामन में रुसवाई के फूल 
मैंने देखा है नया मंज़र फ़राज़-ए-दार पर 

अब कोई तोहमत भी वजा-ए-कर्ब-ए-रुसवाई नहीं 
ज़िन्दगी इक उम्र से चुप हैं तेरे इसरार पर 

मैं सर-ए-मक़तल हदीस-ए-ज़िन्दगी कहता रहा 
उँगलियाँ उठती रहीं ‘मोहसिन’ मेरे किरदार पर.

Mohsin naqvi

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Shikasta aaino ki kirchiyan achhi nahi lagti

शिकस्ता आइनों की किरचियाँ अच्छी नहीं लगतीं 

मुझे वादों की खाली सीपियाँ अच्छी नहीं लगतीं 

गुजिश्ता रुत के रंगों का असर देखो कि अब मुझको 
खुले आँगन में उड़ती तितलियाँ अच्छी नहीं लगतीं 

वो क्या उजाड़ नगर था जिसकी चाहत के सबब अब तक 
हरी बेलों से उलझी टहनियां अच्छी नहीं लगतीं 

दबे पाओं हवा जिनके चिरागों से बहलती हो 
मुझे ऐसे घरों की खिड़कियाँ अच्छी नहीं लगतीं 

भले लगते हैं तूफानों से लड़ते बादबाँ मुझको 
हवा के रुख पे चलती किश्तियाँ अच्छी नहीं लगतीं 

ये कह कर आज उस से भी तआल्लुक तोड़ आया हूँ 
मेरी जाँ मुझको जिद्दी लड़कियां अच्छी नहीं लगतीं

Mohsin naqvi

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Aankhon mein koi khwab utarne nahi deta

आँखों में कोई ख़्वाब उतरने नहीं देता

ये दिल कि मुझे चैन से मरने नहीं देता

बिछड़े तो अजब प्यार जताता है ख़तों में
मिल जाये तो फिर हद से गुजरने नहीं देता

वो शख्स खिजाँ रुत में भी मोहतात रहे कितना
सूखे हुए फूलों को बिखरने नहीं देता

इक रोज़ तेरी प्यास खरीदेगा वो गबरू!
पानी तुझे पनघट से जो भरने नहीं देता

वो दिल में तबस्सुम की किरण घोलने वाला
रूठे तो रूतों को भी सँवरने नहीं देता

मैं उस को मनाऊं कि गम-ए-दहर से उलझूं?
“मोहसिन” वो कोई काम भी करने नहीं देता.

Mohsin naqvi

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Wo bazahir jo zamane se khafa lagta hai

वो बज़ाहिर जो ज़माने से खफा लगता है 

हँस के बोले भी तो दुनिया से जुदा लगता है

और कुछ देर न बुझने दे इसे रब-ए -सहर 
डूबता चाँद मेरा दस्त-ए-दुआ लगता है 

जिस से मुंह फेर के रस्ते की हवा गुजरी है 
किसी उजड़े हुए आँगन का दिया लगता है 

अब के सावन में भी ज़र्दी न गयी चेहरों की 
ऐसे मौसम में तो जंगल भी हरा लगता है 

शहर की भीड़ में खुलते हैं कहाँ उसके नकूश 
आओ तन्हाई में सोचें कि वो क्या लगता है 

मुंह छुपाये हुए गुजरा है जो अहबाब से आज 
उसकी आँखों में कोई ज़ख्म नया लगता है 

अब तो ‘मोहसिन’ के तसव्वुर में उतर रब-ए-जलील 
इस उदासी में तो पत्थर भी खुदा लगता है

Mohsin naqvi

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