Rahi nagufta mere dil mein dastan meri

रही नगुफ़्ता मेरे दिल में दास्ताँ मेरी
न इस दयार में समझा कोई ज़बाँ मेरी

बरंग-ए-सौत-ए-जरस तुझ से दूर हूँ तनहा
ख़बर नहीं है तुझे आह कारवाँ मेरी

उसी से दूर रहा अस्ल-ए-मुद्दा जो था
गई ये उम्र-ए-अज़ीज़ आह रायगाँ मेरी

तेरे फ़िराक़ में जैसे ख़याल मुफ़्लिस का
गई है फ़िक्र-ए-परेशाँ कहाँ कहाँ मेरी

दिया दिखाई मुझे तो उसी का जल्वा “मीर”
पड़ी जहाँ में जा कर नज़र जहाँ मेरी

Mir taqi mir

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Yaro mujhe muaaf rakho main nashe mein hoon

यारो मुझे मु’आफ़ रखो मैं नशे में हूँ
अब दो तो जाम खाली ही दो मैं नशे में हूँ

माज़ूर हूँ जो पाओं मेरा बेतरह पड़े
तुम सर-गराँ तो मुझ से न हो मैं नशे में हूँ

या हाथों हाथ लो मुझे मानिंद-ए-जाम-ए-मय
या थोड़ी दूर साथ चलो मैं नशे में हूँ

मस्ती से दरहमी है मेरी गुफ्तगू के बीच
जो चाहो तुम भी मुझको को कहो में नशे में हूँ

नाजुक मिजाज आप क़यामत है मीर जी 
ज्यों शीशा मेरे मुंह न लगो में नशे में हूँ

Mir taqi mir

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Sher ke parde main mein ne gham sunaya hai bahut

शेर के पर्दे में मैं ने ग़म सुनाया है बहुत
मर्सिये ने दिल को मेरे भी रुलाया है बहुत

वादी-ओ-कोहसर में रोता हूँ धाड़े मार-मार
दिलबरान-ए-शहर ने मुझ को सताया है बहुत

वा नहीं होता किसी से दिल गिरिफ़्ता इश्क़ का
ज़ाहिरा ग़म-गीं उसे रहना ख़ुश आया है बहुत

Mir taqi mir

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Mehar ki tujhse tavakko thi sitamgar nikla

मेहर की तुझसे तवक़्क़ो थी सितमगर निकला
मोम समझे थे तेरे दिल को सो पत्थर निकला

दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से के इतना बेताब
किस की तस्कीं के लिये घर से तू बाहर निकला

जीते जी आह तेरे कूचे से कोई न फिरा
जो सितमदीदा रहा जाके सो मर कर निकला

दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी के न पूछ
जाना जाता है कि इस राह से लश्कर निकला

अश्क-ए-तर, क़तरा-ए-ख़ूँ, लख़्त्-ए-जिगर, पारा-ए-दिल
एक से एक अदू आँख से बेहतर निकला

हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ अए ‘मीर’
पर तेरा नामा तो एक शौक़ का दफ़्तर निकला

Mir taqi mir

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Aankho main jee mera hai

आँखों में जी मेरा है इधर यार देखना
आशिक़ का अपने आख़री दीदार देखना

कैसा चमन के हम से असीरों को मना है
चाक-ए-क़फ़स से बाग़ की दीवार देखना

आँखें चुराईओ न टुक अब्र-ए-बहार से
मेरी तरफ़ भी दीदह-ए-ख़ँबार देखना

अए हम-सफ़र न आब्ले को पहुँचे चश्म-ए-तर
लगा है मेरे पाओं में आ ख़ार देखना

होना न चार चश्म दिक उस्स ज़ुल्म-पैशाह से
होशियार ज़ीन्हार ख़बरदार देखना

सय्यद दिल है दाग़-ए-जुदाई से रश्क-ए-बाग़
तुझ को भी हो नसीब ये गुलज़ार देखना

गर ज़मज़मा यही है कोई दिन तो हम-सफ़ीर
इस फ़स्ल ही में हम को गिरिफ़्तार देखना

बुल-बुल हमारे गुल पे न गुस्ताख़ कर नज़र
हो जायेगा गले का कहीं हार देखना

शायद हमारी ख़ाक से कुछ हो भी अए नसीम
ग़िर्बाल कर के कूचा-ए-दिलदार देखना

उस ख़ुश-निगाह के इश्क़ से परहेज़ कीजिओ ‘मीर’
जाता है लेके जी ही ये आज़ार देखना

Mir taqi mir

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Kya kahoon tum se mein ke kya hai ishq

क्या कहूँ तुम से मैं के क्या है इश्क़
जान का रोग है, बला है इश्क़

इश्क़ ही इश्क़ है जहाँ देखो
सारे आलम में भर रहा है इश्क़

इश्क़ माशूक़ इश्क़ आशिक़ है
यानि अपना ही मुब्तला है इश्क़

इश्क़ है तर्ज़-ओ-तौर इश्क़ के तईं
कहीं बंदा कहीं ख़ुदा है इश्क़

कौन मक़्सद को इश्क़ बिन पहुँचा
आरज़ू इश्क़ वा मुद्दा है इश्क़

कोई ख़्वाहाँ नहीं मोहब्बत का
तू कहे जिन्स-ए-नारवा है इश्क़

मीर जी ज़र्द होते जाते हैं
क्या कहीं तुम ने भी किया है इश्क़?

Mir taqi mir

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Shabd ko wo piye sharab nikla

शब् को वो पीए शराब निकला
जाना ये कि आफ़्ताब निकला

क़ुर्बाँ प्याला-ए-मै-नाब
जैसे कि तेरा हिजाब निकला

मस्ती में शराब की जो देखा
आलम ये तमाम ख़्वाब निकला

शैख़ आने को मै-क़दे में आया
पर हो के बहोत ख़राब निकला

था ग़ैरत-ए-बादा अक्स-ए-गुल से
जिस जू-ए-चमन से आब निकला

Mir taqi mir

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Milo in dino hamse ek raat jaan

मिलो इन दिनों हमसे इक रात जानी
कहाँ हम, कहाँ तुम, कहाँ फिर जवानी

शिकायत करूँ हूँ तो सोने लगे है
मेरी सर-गुज़िश्त अब हुई है कहानी

अदा खींच सकता है बहज़ाद उस की
खींचे सूरत ऐसी तो ये हमने मानl
मुलाक़ात होती है तो है कश-म-कश से
यही हम से है जब न तब खींचा तानी

Mir taqi mir

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Manind e shama majlis e shab ashqbaar paaya

मानिंद-ए-शमा मजलिस-ए-शब अश्कबार पाया
अल क़िस्सा ‘मीर’ को हमने बेइख़्तियार पाया

शहर-ए-दिल एक मुद्दत उजड़ा बसा ग़मों में
आख़िर उजाड़ देना उसका क़रार पाया

इतना न दिल से मिलते न दिल को खो के रहते
जैसा किया था हमने वैसा ही यार पाया

क्या ऐतबार याँ का फिर उस को ख़ार देखा
जिसने जहाँ में आकर कुछ ऐतबार पाया

आहों के शोले जिस् जाँ उठे हैं ‘मीर’ से शब
वाँ जा के सुबह देखा मुश्त-ए-ग़ुबार पाया

Mir taqi mir

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Jo tu hi sanam ham se bezar hoga

जो तू ही सनम हम से बेज़ार होगा
तो जीना हमें अपना दुशवार होगा

ग़म-ए-हिज्र रखेगा बेताब दिल को
हमें कुढ़ते-कुढ़ते कुछ आज़ार होगा

जो अफ़्रात-ए-उल्फ़त है ऐसा तो आशिक़
कोई दिन में बरसों का बिमार होगा

उचटती मुलाक़ात कब तक रहेगी
कभू तो तह-ए-दिल से भी यार होगा

तुझे देख कर लग गया दिल न जाना
के इस संगदिल से हमें प्यार होगा

Mir taqi mir

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