Gul b bulbul bahar mein dekha

गुल ब बुलबुल बहार में देखा
एक तुझको हज़ार में देखा

जल गया दिल सफ़ेद हैं आखें
यह तो कुछ इंतज़ार में देखा

आबले का भी होना दामनगीर
तेरे कूचे के खार में देखा

जिन बालाओं को ‘मीर’ सुनते थे
उनको इस रोज़गार में देखा

Mir taqi mir

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No dimag hai ki kisu se ham

न‍ि दिमाग है कि किसू से हम,करें गुफ्तगू गम-ए-यार में
न फिराग है कि फकीरों से,मिलें जा के दिल्‍ली दयार में

कहे कौन सैद-ए-रमीद: से,कि उधर भी फिरके नजर करे
कि निकाब उलटे सवार है, तिरे पीछे कोई गुबार में

कोई शोल: है कि शरार: है,कि हवा है यह कि सितार: है
यही दिल जो लेके गड़ेंगे हम,तो लगेगी आग मजार में

Mir taqi mir

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Zakhm jhele daagh bhi khaye bohat

ज़ख्म झेले दाग़ भी खाए बोहत
दिल लगा कर हम तो पछताए बोहत

दैर से सू-ए-हरम आया न टुक
हम मिजाज अपना इधर लाये बोहत

फूल, गुल, शम्स-ओ-क़मर सारे ही थे
पर हमें उनमें तुम ही भाये बोहत

रोवेंगे सोने को हमसाये बोहत

मीर से पूछा जो मैं आशिक हो तुम
हो के कुछ चुपके से शरमाये बोहत

Mir taqi mir

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Dikhai diye yoon ki bekhud kiya

दिखाई दिये यूं कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले

जबीं सजदा करते ही करते गई
हक़-ए-बन्दगी हम अदा कर चले

परस्तिश की यां तक कि अय बुत तुझे
नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले

बहुत आरज़ू थी गली की तेरी
सो यां से लहू में नहा कर चले

Mir taqi mir

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Hamare aage tera jab kisi ne naam liya

हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया 
दिल-ए-सितम-ज़दा को हमने थाम-थाम लिया

ख़राब रहते थे मस्जिद के आगे मयख़ाने
निगाह-ए-मस्त ने साक़ी की इंतक़ाम लिया

वो कज-रविश न मिला मुझसे रास्ते में कभू
न सीधी तरहा से उसने मेरा सलाम लिया

मेरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में 
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया

अगरचे गोशा-गुज़ीं हूँ मैं शाइरों में ‘मीर’
प’ मेरे शोर ने रू-ए-ज़मीं तमाम किया

Mir taqi mir

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Kuchh karo fikr mujh diwane ki

कुछ करो फ़िक्र मुझ दीवाने की
धूम है फिर बहार आने की

वो जो फिरता है मुझ से दूर ही दूर 
है ये तरकीब जी के जाने की

तेज़ यूँ ही न थी शब-ए-आतिश-ए-शौक़
थी खबर गर्म उस के आने की 

जो है सो पाइमाल-ए-ग़म है मीर 
चाल बेडोल है ज़माने की

Mir taqi mir

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Rahe doore ishq se rota hai kya

राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या
 
सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख़्मेख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या

क़ाफ़ले में सुबहा के इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या

ग़ैरत-ए-युसुफ़ है ये वक़्त-ए-अज़ीज़ 
“मीर” इस को रायगाँ खोता है क्या

Mir taqi mir

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Bekali bekhudi kuchh aaj nahi

बेकली बेख़ुदी कुछ आज नहीं 

एक मुद्दत से वो मिज़ाज नहीं 

दर्द अगर ये है तो मुझे बस है 
अब दवा की कुछ एहतेयाज नहीं 

हम ने अपनी सी की बहुत लेकिन
मरज़-ए-इश्क़ का इलाज नहीं 

शहर-ए-ख़ूबाँ को ख़ूब देखा मीर
जिंस-ए-दिल का कहीं रिवाज नहीं

Mir taqi mir

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Umr bhar ham rahe sharabi se

उम्र भर हम रहे शराबी से 

दिल-ए-पुर्खूं की इक गुलाबी से

खिलना कम-कम कली ने सीखा है
उसकी आँखों की नीम ख़्वाबी से 

काम थे इश्क़ में बहुत ऐ मीर 
हम ही फ़ारिग़ हुए शताबी से

Mir taqi mir

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Ham jante to ishq na karte kisi ke saath

हम जानते तो इश्क न करते किसू के साथ,
ले जाते दिल को खाक में इस आरजू के साथ।

नाजां हो उसके सामने क्या गुल खिला हुआ,
रखता है लुत्फे-नाज भी रू-ए-निकू के साथ।

हंगामे जैसे रहते हैं उस कूचे में सदा,
जाहिर है हश्र होगी ऐसी गलू के साथ।

मजरूह अपनी छाती को बखिया किया बहुत,
सीना गठा है ‘मीर’ हमारा रफू के साथ.

Mir taqi mir

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