Dekhte hi dekhte pehloo badal jaati hai kyun

देखते ही देखते पहलू बदल जाती है क्यूँ

नींद मेरी आँखों में आते ही जल जाती है क्यूँ।

हाथ में ‘शाकुंतलम’ है और मन में प्रश्न है
याद की मछली अंगूठी को निगल जाती है क्यूँ।

ऐ मुहब्बत, तू तो मेरे मन में खिलता फूल है
तुझसे भी उम्मीद की तितली फिसल जाती है क्यूँ ।

इक सुहानी शाम मुझको भी मिेले, चाहा अगर
आने से पहले ही फिर वो शाम ढल जाती है क्यूँ ।

ये सुना था मौत पीछा कर रही है हर घड़ी
ज़िन्दगी से मौत फिर आगे निकल जाती है क्यूँ ।

मेरे होठों पर हँसी आते ही गालों पर मेरे
आंसुओं की एक सन्टी सी उछल जाती है क्यूँ।

आंसुओं से जब भी चेहरे को निखारा ऐ ‘कुँअर’
ज़िन्दगी चुपके से आकर धूल मल जाती है क्यूँ।

Kunwar bechain

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Sara Jag tujhko kahe hai motbar kafi nahi

सारा जग तुझको कहे, है मो’तबर काफ़ी नहीं

अपनी क़ीमत भी बता केवल हुनर काफ़ी नहीं।

गिनतियों में नाम तेरा आये गर ये चाह है
साथ इक-दो अंक रख केवल सिफ़र काफ़ी नहीं।

तेरे दिल में है अगर आकाश छूने की ललक
हौसला भी रख, तेरे ये बालो-पर काफ़ी नहीं।

लोक और परलोक दोनों मन के मंदिर में सजा
ये इधर काफ़ी नहीं और वो उधर काफ़ी नहीं।

और कितने हादिसों का तू करेगा इंतज़ार
क्या मिरे ग़म की यही पहली ख़बर काफ़ी नहीं।

सात कमरों का है घर और उसमें रहने वाले दो
क्या तेरे रहने को इक छोटा-सा घर काफ़ी नहीं।

ज़िन्दगी जितनी मिली है उसमें कुछ करके दिखा
माना इक ही ज़िन्दगी का यह सफ़र काफ़ी नहीं।

काम कोई भी बुरा करने से पहले खुद भी डर
इसमें ये ईश्वर का या दुनिया का डर काफ़ी नहीं।

घर के सारे लोगों से रिश्ता बने, तो घर बने
घर को घर कहने में ये दीवारो-दर काफ़ी नहीं।

अच्छी बातें हों तो उनको शक्ल दे सहगान की
युग बदलने को ये तेरा एक स्वर काफ़ी नहीं।

तू दशानन बनने की ही होड़ में उलझा रहा
आदमी बनने को क्या ये एक सर काफ़ी नहीं।

तेरे अंदर कौन-क्या है जानने के वास्ते
मन की आँखें खोल, बाहर की नज़र काफ़ी नहीं।

वो भी क्या रचना कि जिसमें कोई बेचैनी न हो
यूँ ‘ कुँअर बेचैन’ तुममे ये ‘कुँअर’ काफ़ी नही।

Kunwar bechain

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Teri har baat chalkar yoon bhi mere jee se aati hai

तेरी हर बात चलकर यूँ भी मेरे जी से आती है

कि जैसे याद की खुश्बू किसी हिचकी से आती है।

कहाँ से और आएगी अक़ीदत की वो सच्चाई
जो जूठे बेर वाली सरफिरी शबरी से आती है।

बदन से तेरे आती है मुझे ऐ माँ वही खुश्बू
जो इक पूजा के दीपक में पिघलते घी से आती है।

उसी खुश्बू के जैसी है महक। पहली मुहब्बत की
जो दुलहिन की हथेली पर रची मेंहदी से आती है।

हजारों खुशबुएँ दुनिया में हैं पर उससे छोटी हैं
किसी भूखे को जो सिकती हुई रोटी से आती है।

मेरे घर में मेरी पुरवाइयाँ घायल पड़ी हैं अब
कोई पछवा न जाने कौन सी खिड़की से आती है।

ये माना आदमी में फूल जैसे रंग हैं लेकिन
‘कुँअर’ तहज़ीब की खुश्बू मुहब्बत से ही आती है।

Kunwar bechain

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Jo dar jaate hai dar Jane se pehle

जो डर जाते हैं डर जाने से पहले

वो मर जाते हैं मर जाने से पहले।

बहुत सम्मान था इन आंसुओं का
नज़र से यूँ उतर जाने से पहले।

पता भी है कि पिंजरे में परिंदा
बहुत तड़पा था पर जाने से पहले।

फिर उसके बाद चाहे कुछ हो लेकिन
झुके सर क्यूँ ये सर जाने से पहले।

मैं बिखरा हूँ मगर किसको पता है
मैं टूटा था बिखर जाने से पहले।

खुदा, मेरी दुआओं में असर रख
दुआओं का असर जाने से पहले।

इधर के काम भी निपटा चलूँ मैं
ये सोचा है उधर जाने से पहले।

नतीज़ा भी तो उसका सोच लीजे
कोई भी काम कर जाने से पहले।

मैं खाली हाथ हूँ डर लग रहा है
मुझे अपने ही घर जाने से पहले।

जो तुमने हाथ थामा चल पड़ा हूँ
मैं डरता था जिधर जाने से पहले।

तुम्हारे साथ क्या जाना है बोलो
ये सब सोचो मगर जाने से पहले।

ये सोना भी तो पीतल लग रहा था
सुहागे में निखर जाने से पहले।

तुम्हारी दूसरी हद क्या है सोचो
मगर हद से गुज़र जाने से पहले।

तुम उसके दर पे भी जाते ‘कुँअर’ जी
यूँ ऐसे दर-ब-दर जाने से पहले।

Kunwar bechain

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Kabhi chalta hua chanda kabhi taara batata hai

कभी चलता हुआ चंदा कभी तारा बताता है

ज़माना ठीक है जो मुझको बंजारा बताता है।

तुम्हारा क्या, तुम अपनी नींद की ये गोलियां खाओ
है गहरी नींद क्या, यह तो थका-हारा बताता है।

सँवारा वक़्त ने उसको, कि जिसने वक़्त को समझा
नहीं तो वक़्त क्या है, वक़्त का मारा बताता है।

ये आंसू हैं नमी दिल की, यही कहती रही दुनिया
मगर आंसू तो खुद को जल में अंगारा बताता है।

तज़ुर्बा मार्गदर्शक है, इसी से राह पूछेंगे
ये वो है, भूलने पर राह दोबारा बताता है।

सुनो साधो, कि इक साधे से सध जाती है सब दुनिया
किसी भी एक के हो लो, ये इकतारा बताता है।

नदी को मिलना था सो मिल गई जाकर समुन्दर से
भले ही ये जहाँ सारा, उसे खारा बताता है।

घरों में रहनेे वालों के , ये रिश्ते किस तरह के हैं
‘कुँअर’ इस बात को, कब ईंट या गारा बताता है।

Kunwar bechain

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Aankein hoon agar main to mera tu hi khwab hai

आँखें हूँ अगर मैं, तो मेरा तू ही ख़्वाब है

मैं प्रश्न अगर हूँ, तो मेरा तू ज़वाब है।

मैं क्यूँ न पढूं रोज़ नई चाह से तुझे
तू घर में मेरे एक भजन की किताब है।

खुश्बू भी, तेरा रंग भी मुझमें भरा हुआ
तू दिल की नई शाख़ पे पहला गुलाब है।

देखा जो तुझे, तुझपे ही नज़रें टिकी रहीं
तू हुस्न की दुनिया में नया इंक़लाब है।

चेहरे से ज़रा पर्दा हटा, तो लगा कि तू
मावस की घनी रात में भी माहताब है।

अमृत ही तिरीआँखों से छलके है हर घड़ी
नश्शा है मगर ऐसा, कि जैसे शराब है।

Kunwar bechain

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Aankhon mein bhar ke pyar ka pani ghazal kahi

आँखों में भर के प्यार का पानी ग़ज़ल कही

हमने नये सिरे से पुरानी ग़ज़ल कही।

लिक्खा जो देखा उसकी हथेली पे अपना नाम
हमने हथेली चूम ली, यानी ग़ज़ल कही।

कितना कहा खुलेंगे ग़ज़ल कह के सारे राज़
पर दिल ने मेरी एक न मानी, ग़ज़ल कही।

होठों ने पहनकर नये लफ़्ज़ों के नव बसन
आँखों ने आंसुओं की जुबानी ग़ज़ल कही।

लफ़्ज़ों में है कहीं पे धुआँ और कहीं पे आग
क्या तुमने सुन के मेरी कहानी, ग़ज़ल कही।

याद आ रही है धान के खेतों की वो ग़ज़ल
जिसने पहन के चूनरी धानी, ग़ज़ल कही।

ग़ज़लों में रख के लफ़्ज़ों की प्यारी अंगूठियां
फिर कहके ये हैं मेरी निशानी, ग़ज़ल कही।

जब अपनी चांदनी पे ग़ज़ल कह रहा था चाँद
मैंने भी तुझ पे रूप की रानी ग़ज़ल कही।

Kunwar bechain

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Auron ke bhee gham mein zara ro loon to subha ho

औरों के भी ग़म में ज़रा रो लूँ तो सुबह हो

दामन पे लगे दाग़ों को धो लूँ तो सुबह हो।

कुछ दिन से मेरे दिल में नई चाह जगी है
सर रख के तेरी गोद में सो लूँ तो सुबह हो।

पर बाँध के बैठा हूँ नशेमन में अभी तक
आँखों के साथ पंख भी खोलूँ तो सुबह हो।

लफ़्ज़ों में छुपा रहता है इक नूर का आलम
यह सोच के हर लफ़्ज़ को बोलूँ तो सुबह हो।

जो दिल के समुन्दर में है अंधियार की कश्ती
अंधियार की कश्ती को डुबो लूँ तो सुबह हो।

खुश्बू की तरह रहती है जो जिस्म के भीतर
उस गन्ध को साँसों में समो लूँ तो सुबह हो।

दुनिया में मुहब्बत-सा ‘कुँअर’ कुछ भी नहीं है
हर दिल में इसी रंग को घोलूँ तो सुबह हो।

Kunwar bechain

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Sachha fakeer aaj tak boodha nahi hua

सच्चा फ़क़ीर आज तक बूढ़ा नहीं हुआ

देखो कबीर आज तक बूढ़ा नहीं हुआ।

‘रांझे’ की वो जो सच्ची मुहब्बत के साथ है
वह नाम ‘हीर’ आज तक बूढ़ा नहीं हुआ।

इस दिल पे मेरे तुमने जो छोड़ा था पहली बार
नज़रों का तीर आज तक बूढ़ा नहीं हुआ।

होली के दिन जो तुमने मला मेरे गाल पर
बस वह अबीर आज तक बूढ़ा नहीं हुआ।

है गोद में यशोदा की, या राधिका के साथ
बस इक अहीर आज तक बूढ़ा नहीं हुआ।

सबके दिलों पे जिसने शराफत की, प्यार की
खींची लकीर आज तक बूढ़ा नहीं हुआ।

धरती के काम आया जो हरदम जवाँ रहा
झरनों का नीर आज तक बूढ़ा नहीं हुआ।

सूरज की तरह जिसने दी दुनिया को रौशनी
वो राहगीर आज तक बूढ़ा नहीं हुआ।

बूढ़ी न हुई जो ‘ कुँअर’ वह तो है आत्मा
किसका शरीर आज तक बूढ़ा नहीं हुआ।

Kunwar bechain

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Jis raat purnima mein Naha legi chandni

जिस रात पूर्णिमा में नहा लेगी चांदनी

पानी को सागरों से उछालेगी चांदनी।

उन्मुक्त कुन्तलों की नशीली सी छाँव में
सो भी गया तो मुझको जगा लेगी चांदनी।

सोचा न था कि मैक़दे से खींचकर मुझे
मंदिर की सीढ़ियों पे बिठा लेगी चांदनी।

किसको पता था देह की दीवार फांदकर
मुझसे ही कभी मुझको चुरा लेगी चांदनी।

दामन पे मेरे लाख अंधेरों के दाग़ हों
मुझको यक़ीन है कि निभा लेगी चांदनी।

ये भी यक़ीन है कि अंधेरों की भंवर से
सूरज न बचाये तो बचा लेगी चांदनी।

Kunwar bechain

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