Lai fir ek lagzishe mastana tere shaher main

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में ।
फिर बनेंगी मस्जिदें मयख़ाना तेरे शहर में ।

आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ
आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में ।

जुर्म है तेरी गली से सर झुकाकर लौटना
कुफ़्र  है पथराव से घबराना तेरे शहर में ।

शाहनामे  लिक्खे हैं खंडरात की हर ईंट पर
हर जगह है दफ़्न इक अफ़साना तेरे शहर में ।

कुछ कनीज़ें  जो हरीमे-नाज़ में हैं बारयाब
माँगती हैं जानो-दिल नज़्राना तेरे शहर में ।

नंगी सड़कों पर भटककर देख, जब मरती है रात
रेंगता है हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में ।

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Dastoor kya ye shahre sitamgar ke ho gaye

दस्तूर क्या ये शहरे-सितमगर के हो गए
जो सर उठा के निकले थे बे-सर के हो गए

ये शहर तो है आप का, आवाज़ किस की थी
देखा जो मुड़ के हमने तो पत्थर के हो गए

जब सर ढका तो पाँव खुले फिर ये सर खुला
टुकड़े इसी में पुरखों की चादर के हो गए

दिल में कोई सनम ही बचा, न ख़ुदा रहा
इस शहर पे ज़ुल्म भी लश्कर के हो गए

हम पे बहुत हँसे थे फ़रिश्ते सो देख लें
हम भी क़रीब गुम्बदे-बेदर  के हो गए

Kaifi azmi

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Haath aa kar gaya, gaya koi

 
हाथ आ कर गया, गया कोई ।
मेरा छप्पर उठा गया कोई ।

लग गया इक मशीन में मैं भी
शहर में ले के आ गया कोई ।

मैं खड़ा था कि पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई ।

ऐसी मंहगाई है कि चेहरा भी
बेच के अपना खा गया कोई ।

अब कुछ अरमाँ हैं न कुछ सपने
सब कबूतर उड़ा गया कोई । 

यह सदी धूप को तरसती है
जैसे सूरज को खा गया कोई ।

वो गए जब से ऐसा लगता है
छोटा-मोटा ख़ुदा गया कोई ।

मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई ।

Kaifi azmi

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Shor yu hi na parindo ne machaya hoga

शोर यूँ ही न परिंदों ने मचाया होगा,
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा।

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था,
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा।

बानी-ए-जश्ने-बहाराँ ने ये सोचा भी नहीं
किस ने काटों को लहू अपना पिलाया होगा।

अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे,
ये सराब  उन को समंदर नज़र आया होगा।

बिजली के तार पर बैठा हुआ तनहा पंछी,
सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा।

Kaifi azmi

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Suna karo meri jaan

सुना करो मेरी जाँ इन से उन से अफ़साने 
सब अजनबी हैं यहाँ कौन किस को पहचाने

यहाँ से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालों 
हैं मेरी प्यास के फूँके हुए ये वीराने 

मेरी जुनून-ए-परस्तिश से तंग आ गये लोग 
सुना है बंद किये जा रहे हैं बुत-ख़ाने 

जहाँ से पिछले पहर कोई तश्ना-काम उठा 
वहीं पे तोड़े हैं यारों ने आज पैमाने 

बहार आये तो मेरा सलाम कह देना 
मुझे तो आज तलब कर लिया है सेहरा ने 

सिवा है हुक़्म कि “कैफ़ी” को संगसार करो 
मसीहा बैठे हैं छुप के कहाँ ख़ुदा जाने 

Kaifi azmi

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Sadiya guzar gai

क्या जाने किसी की प्यास बुझाने किधर गयीं

उस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गयीं

दीवाना पूछता है यह लहरों से बार बार

कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गयीँ

अब जिस तरफ से चाहे गुजर जाए कारवां

वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गयीं

पैमाना टूटने का कोई गम नहीं मुझे

गम है तो यह के चाँदनी रातें बिखर गयीं

पाया भी उन को खो भी दिया चुप भी यह हो रहे

इक मुख्तसर सी रात में सदियाँ गुजर गयीं

Kaifi azmi

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Wo bhi sarhane lage arbabe fan ke baad

वो भी सरहाने लगे अरबाबे-फ़न के बाद ।
दादे-सुख़न  मिली मुझे तर्के-सुखन के बाद ।

दीवानावार चाँद से आगे निकल गए
ठहरा न दिल कहीं भी तेरी अंजुमन के बाद ।

एलाने-हक़ में ख़तरा-ए-दारो-रसन  तो है
लेकिन सवाल ये है कि दारो-रसन के बाद ।

होंटों को सी के देखिए पछताइयेगा आप
हंगामे जाग उठते हैं अकसर घुटन के बाद ।

गुरबत की ठंडी छाँव में याद आई है उसकी धूप
क़द्रे-वतन  हुई हमें तर्के-वतन के बाद

इंसाँ की ख़ाहिशों की कोई इंतेहा नहीं
दो गज़ ज़मीन चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद ।

Kaifi azmi

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Wo kabhi dhoop kabhi chhanv lage

वो कभी धूप कभी छाँव लगे ।
मुझे क्या-क्या न मेरा गाँव लगे ।

किसी पीपल के तले जा बैठे 
अब भी अपना जो कोई दाँव लगे ।

एक रोटी के त’अक्कुब में चला हूँ इतना 
की मेरा पाँव किसी और ही का पाँव लगे । 

रोटि-रोज़ी की तलब जिसको कुचल देती है
उसकी ललकार भी एक सहमी हुई म्याँव लगे ।

जैसे देहात में लू लगती है चरवाहों को
बम्बई में यूँ ही तारों की हँसी छाँव लगे ।

Kaifi azmi

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Yahi tohfa hai yahi nazrana

यही तोहफ़ा है यही नज़राना 
मैं जो आवारा नज़र लाया हूँ
रंग में तेरे मिलाने के लिये
क़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर लाया हूँ
ऐ गुलाबों के वतन

पहले कब आया हूँ कुछ याद नहीं
लेकिन आया था क़सम खाता हूँ
फूल तो फूल हैं काँटों पे तेरे
अपने होंटों के निशाँ पाता हूँ
मेरे ख़्वाबों के वतन

चूम लेने दे मुझे हाथ अपने
जिन से तोड़ी हैं कई ज़ंजीरे
तूने बदला है मशियत का मिज़ाज
तूने लिखी हैं नई तक़दीरें
इंक़लाबों के वतन

फूल के बाद नये फूल खिलें
कभी ख़ाली न हो दामन तेरा
रोशनी रोशनी तेरी राहें
चाँदनी चाँदनी आंगन तेरा
माहताबों के वतन

Kaifi azmi

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Yahi tohfa hai yahi nazrana

यही तोहफ़ा है यही नज़राना 
मैं जो आवारा नज़र लाया हूँ
रंग में तेरे मिलाने के लिये
क़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर लाया हूँ
ऐ गुलाबों के वतन

पहले कब आया हूँ कुछ याद नहीं
लेकिन आया था क़सम खाता हूँ
फूल तो फूल हैं काँटों पे तेरे
अपने होंटों के निशाँ पाता हूँ
मेरे ख़्वाबों के वतन

चूम लेने दे मुझे हाथ अपने
जिन से तोड़ी हैं कई ज़ंजीरे
तूने बदला है मशियत का मिज़ाज
तूने लिखी हैं नई तक़दीरें
इंक़लाबों के वतन

फूल के बाद नये फूल खिलें
कभी ख़ाली न हो दामन तेरा
रोशनी रोशनी तेरी राहें
चाँदनी चाँदनी आंगन तेरा
माहताबों के वतन

Kaifi azmi

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