Kaam yahi hai sham sawere

काम यही है शाम सवेरे
तेरी गली के सौ सौ फेरे

सामने वो हैं जुल्फ बिखेरे
कितने हसीं है आज अँधेरे

हम तो हैं तेरे पूजने वाले
पाँव न पड़वा तेरे मेरे

दिल को चुराया ख़ैर चुराया
आँख चुरा कर जा न लुटेरे

Kaif bhopali

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Jab hamen masjid mein jana pada hai

जब हमें मस्जिद में जाना पड़ा है
राह में इक मै-ख़ाना पड़ा है

जाइए अब क्यूँ जानिब-ए-सहरा
शहर तो ख़ुद वीराना पड़ा है

हम न पिएँगे भीक की साकी
ले ये तेरा पैमाना पड़ा है

हरज न हो तो देखते चलिए
राह में इक दीवाना पड़ा है

खत्म हुई सब रात की महफिल
एक पर-ए-परवाना पड़ा है

Kaif bhopali

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Is tarah muhabbat mein dil pe hukmrani hai

इस तरह मोहब्बत में दिल पे हुक्मरानी है
दिन नहीं मेरा गोया उन की राजधानी है

घास के घरौंदे से ज़ोर-आज़माई क्या
आँधियाँ भी पगली है बर्क भी दिवानी है

शायद उन के दामन ने पोंछ दीं मेरी आँखें
आज मेरे अश्कों का रंग ज़ाफरानी है

पूछते हो क्या बाबा क्या हुआ दिल-ए-ज़िदा
वो मेरा दिल-ए-ज़िंदा आज आँजहानी है

‘कैफ’ तुझ को दुनिया ने क्या से क्या बना डाला
यार अब मेरे मुँह पर रंग है न पानी है

Kaif bhopali

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Ham ko diwana jaan ke kya julm dhaya logo ne

हम को दीवाना जान के क्या क्या जुल्म न ढाया लोगों ने
दीन छुड़ाया धर्म छुड़ाया देस छुड़ाया लोगो नें

तेरी गली में आ निकले थे दोश हमारा इतना था
पत्थर मारे तोहमत बाँधी ऐब लगाया लोगों ने

तेरी लटों में सो लेते थे बे-घर आशिक बे-घर लोग
बूढ़े बरगद आज तुझे भी काट गिराया लोगों ने

नूर-ए-सहर ने निकहत-ए-गुल ने रंग-ए-शफक ने कह दी बात
कितना कितना मेरी ज़बाँ पर कुफ्ल लगाया लोगों ने

‘मीर’ तकी के रंग का गाज़ा रू-ए-ग़जल पर आ न सका
‘कैफ’ हमारे ‘मीर’ तकी का रंग उड़ाया लोगों ने

Kaif bhopali

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Haye logo ki karam farmaiyan

हाए लोगों की करम-फरमाइयाँ
तोहमतें बदनामियाँ रूसवाइयाँ

ज़िंदगी शायद इसी का नाम है
दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ

क्या ज़माने में यूँ ही कटती है रात
करवटें बेताबियाँ अँगड़ाइयाँ

क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार
आहटें घबराहटें परछाइयाँ

एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में है
शाहियाँ सुल्तानियाँ दराइयाँ

एक पैकर में सिमट कर रह गई
खूबियाँ जे़बाइयाँ रानाइयाँ

रह गई एक तिफ्ल-ए-मकतब के हुजूर
हिकमतें आगाहियाँ दानाइयाँ

ज़ख्म दिल के फिर हरे करने लगी
बदलियाँ बरखा रूतें पुरवाइयाँ

दीदा ओ दानिस्ता उन के सामने
लग्ज़िशें नाकामियाँ पसपाइयाँ

मेरे दिल की धड़कनों में ढल गई
चूड़ियाँ, मौसीकियाँ, शहनाइयाँ

उनसे मिलकर और भी कुछ बढ़ गई
उलझनें फिक्रें कयास-आराइयाँ

‘कैफ’ पैदा कर समंदर की तरह
वुसअतें खामोशियाँ गहराइयाँ

Kaif bhopali

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Gardish a arj o samawt ne jeene na diya

गर्दिश-ए-अर्ज-ओ-समावत ने जीने न दिया
कट गया दिन तो हमें रात ने जीने न दिया

कुछ मोहब्बत को न था चैन से रखना मंजूर
और कुछ उन की इनायत ने जीने न दिया

हादसा है के तेरे सर पर इल्ज़ाम आया
वाकया है के तेरी ज़ात ने जीने न दिया

‘कैफ’ के भूलने वाले खबर हो के उसे
सदमा-ए-तर्क-ए-मुलाकात ने जीने न दिया

Kaif bhopali

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Dar o deewar pe shakle se banane aai

दर ओ दीवार पे शकलें से बनाने आई
फिर ये बारिश मेरी तनहाई चुराने आई

ज़िंदगी बाप की मानिंद सजा देती है
रहम-दिल माँ की तरह मौत बचाने आई

आज कल फिर दिल-ए-बर्बाद की बातें है वही
हम तो समझे थे के कुछ अक्ल ठिकाने आई

दिल में आहट सी हुई रूह में दस्तक गूँजी
किस की खुशबू ये मुझे मेरे सिरहाने आई

मैं ने जब पहले-पहल अपना वतन छोड़ा था
दूर तक मुझ को इक आवाज़ बुलाने आई

तेरी मानिंद तेरी याद भी ज़ालिक निकली
जब भी आई है मेरा दिल ही दुखाने आई
Kaif bhopali

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Daag duniya ne diye

दाग़ दुनिया ने दिए जख़्म ज़माने से मिले
हम को तोहफे ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले

हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे
वो फलाने से फलाने से फलाने से मिले

ख़ुद से मिल जाते तो चाहत का भरम रह जाता
क्या मिले आप जो लोगों के मिलाने से मिले

माँ की आगोश में कल मौत की आगोश में आज
हम को दुनिया में ये दो वक़्त सुहाने से मिले

इक नया जख़्म मिला एक नई उम्र मिली
जब किसी शहर में कुछ यार पुराने से मिले

एक हम ही नहीं फिरते हैं लिए किस्सा-ए-ग़म
उन के ख़ामोश लबों पर भी फ़साने से मिले

कैसे माने के उन्हें भूल गया तू ऐ ‘कैफ’
उन के ख़त आज हमें तेरे सिरहाने से मिले

-कैफ़ भोपाली

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