Tera chehra subha ka Tara lagta hai

तेरा चेहरा सुब्ह का तारा लगता है
सुब्ह का तारा कितना प्यारा लगता है

तुम से मिल कर इमली मीठी लगती है
तुम से बिछड़ कर शहद भी खारा लगता है

रात हमारे साथ तू जागा करता है
चाँद बता तू कौन हमारा लगता है

किस को खबर ये कितनी कयामत ढाता है
ये लड़का जो इतना बेचारा लगता है

तितली चमन में फूल से लिपटी रहती है
फिर भी चमन में फूल कँवारा लगता है

‘कैफ’ वो कल का ‘कैफ’ कहाँ है आज मियाँ
ये तो कोई वक्त का मारा लगता है

Kaifi bhopali

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Tera chehra kitna suhana lagta hai

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है
तेरे आगे चाँद पुराना लगता है

तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है

आग का क्या है पल दो पल में लगती है
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है

पाँव ना बाँधा पंछी का पर बाँधा
आज का बच्चा कितना सयाना लगता है

सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है
हँसता चेहरा एक बहाना लगता है

सुनने वाले घंटों सुनते रहते हैं
मेरा फसाना सब का फसाना लगता है

‘कैफ’ बता क्या तेरी गज़ल में जादू है
बच्चा बच्चा तेरा दिवाना लगता है

Kaifi bhopali

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Tan e tanha muqabil ho raha hoon main hazaron se

तन-ए-तनहा मुकाबिल हो रहा हूँ मैं हजारों से
हसीनों से रकीबों से गमों से गम-गुसारों से

उन्हें मैं छीन कर लाया हूँ कितने दावे-दारों से
शफक से चाँदनी रातों से फूलों से सितारों से

सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है
पहाड़ों से गुफाओं से बयाबानों से गारों से

हमारे दाग-ए-दिल-जख़्म-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं
गुलों से गुल-रूखों से मह-वशों से मह-परों से

कभी होता नहीं महसूस वो यूँ कत्ल करते है
निगाहों से कनखियों से अदाओं से इशारों से

हमेशा एक प्यासी रूह की आवाज आती है
कुओं से पनघटों से नद्दियों से आबशारों से

न आए पर न आए वो उन्हें क्या क्या खबर भेजी
लिफाफों से ख़तों से दुख भरे पर्चो से तारों से

ज़माने में कभी भी किस्मतें बदला नहीं करती
उम्मीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से

वो दिन भी हाए क्या दिन थे जब अपना भी तअल्लुक था
दशहरे से दीवाली से बंसतों से बहारों से

कभी पत्थर के दिल ऐ ‘कैफ’ पिघले हैं न पिघलेंगे
मुनाजातों से फरियादों से चीखों से पुकारों से

Kaifi bhopali

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Sirf itne jurm par hangama hota jaye hai

सिर्फ इतने जुर्म पर हँगामा होता जाए है
तेरा दीवाना तेरी गलियों में देखा जाए है

आप किस किस को भला सूली चढ़ाते जाएँगे
अब तो सारा शहर ही मंसूर बनता जाए है

दिल-बरों के भेस में फिरते हैं चोरो के गरोह
जागते रहियों के इन रातों में लूटा जाए है

तेरा मै-खाना है या ख़ैरात-खाना साकिया
इस तरह मिलता है बादा जैसे बख्शा जाए है

मै-कशो आगे बढ़ो तिश्ना-लबो आगे बढ़ो
अपना हक माँगा नहीं जाता है छीना जाए है

मौत आई और तसव्वुर आप का रूख़सत हुआ
जैसे मंज़िल तक कोई रह-रौ को पहुँचा जाए है

Kaifi bhopali

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Salam us par agar aisa koi fankaar ho jaye

सलाम उस पर अगर ऐसा कोई फनकार हो जाए
सियाही ख़ून बन जाए कलम तलवार हो जाए

ज़माने से कहो कुछ साएका-रफ्तार हो जाए
हमारे साथ चलने के लिए तैयार हो जाए

ज़माने को तमन्ना है तेरा दीदार करने की
मुझे ये फ्रिक है मुझ को मेरा दीदार हो जाए

वो जुल्फें साँप हैं बे-शक अगर ज़ंजीर बन जाएँ
मोहब्बत ज़हर है बे-शक अगर आज़ार हो जाए

मोहब्बत से तुम्हें सरकार कहते हैं वगरना हम
निगाहें डाल दें जिस पर वही सरकार हो जाए

Kaif bhopali

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Na aaya maza shab ki tanhaiyon mein

न आया मज़ा शब की तनहाईयों में
सहर हो गई चंद अँगड़ाइयों में

न रंगीनियों में न रानाइयों में
नज़र घिर गई अपनी पराछाइयों में

मुझे मुस्कुरा मुस्कुरा कर ने देखो
मेरे साथ तुम भी हो रूसवाईयों में

गज़ब हो गया उन की महफिल से आना 
घिरा जा रहा हूँ तमाशाइयों में

मोहब्बत है या आज तर्क-ए-मोहब्बत
ज़रा मिल तो जाएँ वो तनहाइयों में

इधर आओ तुम को नज़र लग न जाए
छुपा लूँ तुम्हें दिल की गहराइयों में

अरे सुनने वालो ये नगमें नहीं है
मेरे दिल की चीखें है शहनाइयों में

वो ऐ ‘कैफ’ जिस दिन से मेरे हुए हैं
तो सारा जमाना है शैदाइयों में

Kaif bhopali

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Kutiya me kon aayega is teergi ke saath

कुटिया में कौन आएगा इस तीरगी के साथ
अब ये किवाड़ बंद करो खामुशी के साथ

साया है कम खजूर के ऊँचे दरख़्त का
उम्मीद बाँधिए न बड़े आदमी के साथ

चलते हैं बच के शैख ओ बरहमन के साए से
अपना यही अमल है बुरे आदमी के साथ

शाइस्तगान-ए-शहर मुझे ख़्वाह कुछ कहें
सड़कों का हुस्न है मेरी आवारगी के साथ

शाएर हिकायतें न सुना वस्ल ओ इश्क की
इतना बड़ा मजाक न कर शाएरी के साथ

लिखता है गम की बात मर्सरत के मूड में
मख़्सूस है ये तर्ज़ फकत ‘कैफ’ ही के साथ

Kaif bhopali

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Khankah me sufi muh mein chhupaye baitha hai

खानकाह में सूफी मुँह में छुपाए बैठा है
गालिबन ज़माने से मात खाए बैठा है

कत्ल तो नहीं बदला कत्ल की अदा बदली
तीर की जगह कातिल साज़ उठाए बैठा है

उन के चाहने वाले धूप धूप फिरते हैं
गैर उन के कूचे में साए साए बैठा है

वाह आशिक-ए-नादाँ काएनात ये तेरी
इक शिकस्ता शीशे को दिल बनाए बैठा है

दूर बारिश ऐ गुल-चीं वा है दीदा-ए-नर्गिस
आज हर गुल-ए-रंगीं खार खाए बैठा है

Kaif bhopali

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Jhoom ke jab rindon ne pila di

झूम के जब रिंदों ने पिला दी
शैख़ ने चुपके चुपके दुआ दी

एक कमी थी ताज महल में
मैं ने तेरी तस्वीर लगा दी

आप ने झूठा वादा कर के
आज हमारी उम्र बढ़ा दी

हाए ये उन का तर्ज-ए-मोहब्बत
आँख से बस इक बूँद गिरा दी

Kaif bhopali

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Koun aayega yahan koi na aaya hoga

कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा
मेरा दरवाजा हवाओं ने हिलाया होगा

दिल-ए-नादाँ न धड़क ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क
कोई ख़त ले के पड़ौसी के घर आया होगा

इस गुलिस्ताँ की यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल
तू ने जिस फूल को पाला वो पराया होगा

दिल की किस्मत ही में लिक्खा था अँधेरा शायद
वरना मस्जिद का दिया किस ने बुझाया होगा

गुल से लिपटी हुई तितली हो गिरा कर देखो
आँधियों तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा

खेलने के लिए बच्चे निकल आए होंगे
चाँद अब उस की गली में उतर आया होगा

‘कैफ’ परदेस में मत याद करो अपना मकाँ
अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा

Kaif bhopali

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