Dosto ab tum na dekhoge ye din

दोस्तों अब तुम न देखोग ये दिन
ख़त्म हैं हम पर सितम-आराइयाँ

चुन लिया एक एक काँटा राह का
है मुबारक ये बरहना पाइयाँ

कू-ब-कू मेरे जुनूँ की अज़्मतें
उस की महफ़िल में मेरी रूस्वाइयाँ

अज़्मत-ए-सुक़रात-ओ-ईसा की क़सम
दार के साए में हैं दाराइयाँ

चारा-गर मरहम भरेगा तू कहाँ
रूह तक हैं ज़ख़्म की गहराइयाँ

‘कैफ़’ को दाग़-ए-ज़िगर बख़्शे गए
अल्लाह अल्लाह ये करम फ़रमाईयां

Kaifi bhopali

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Beemar e muhaabat ki dawa hai ki nahi hai

बीमार-ए-मोहब्बत की दवा है की नहीं है
मेरे किसी पहलू में क़ज़ा है की नहीं है

सुनता हूँ इक आहट सी बराबर शब-ए-वादा
जाने तेरे क़दमों की सदा है की नहीं है

सच है मोहब्बत में हमें मौत ने मारा
कुछ इस में तुम्हारी भी ख़ता है कि नहीं है

मत देख की फिरता हूँ तेरे हिज्र में ज़िंदा
ये पूछ की जीने में मज़ा है कि नहीं है

यूँ ढूँडते फिरते हैं मेरे बाद मुझे वो
वो ‘कैफ़’ कहीं तेरा पता है कि नहीं है

Kaifi bhopali

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Tujhe kon janta tha meri dosti se pehle

तुझे कौन जानता था मेरी दोस्ती से पहले
तेरा हुस्न कुछ नहीं था मेरी शाएरी से पहले

इधर आ रक़ीब मेरे मैं तुझे गले लगा लूँ
मेरा इश्क़ बे-मज़ा था तेरी दुश्मनी से पहले

कई इंक़िलाब आए कई ख़ुश-ख़िराब गुज़रे
न उठी मगर क़यामत तेरी कम-सिनी से पहले

मेरी सुब्ह के सितारे तुझे ढूँढती हैं आँखें
कहीं रात डस न जाए तेरी रौशनी से पहले

Kaif bhopali

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Jism par baqi ye sar hai kya karoon

जिस्म पर बाक़ी ये सर है क्या करूँ
दस्त-ए-क़ातिल बे-हुनर है क्या करूँ

चाहता हूँ फूँक दूँ इस शहर को 
शहर में इन का भी घर है क्या करूँ

वो तो सौ सौ मर्तबा चाहें मुझे
मेरी चाहत में कसर है क्या करूँ

पाँव में ज़ंजीर काँटे आबले
और फिर हुक्म-ए-सफ़र है क्या करूँ

‘कैफ़’ का दिल ‘कैफ़’ का दिल है मगर
वो नज़र फिर वो नज़र है क्या करूँ

‘कैफ़’ में हूँ एक नूरानी किताब 
पढ़ने वाला कम-नज़र है क्या करूँ

Kaifi bhopali

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Kis pe Teri shamsheer nahi hai

जिस पे तेरी शमशीर नहीं है
उस की कोई तौक़ीर नहीं है

उस ने ये कह कर फेर दिया ख़त
ख़ून से क्यूँ तहरीर नहीं है

ज़ख्म-ए-ज़िगर में झाँक के देखो
क्या ये तुम्हारा तीर नहीं है

ज़ख़्म लगे हैं खुलने गुल-चीं
ये तो तेरी जागीर नहीं है

शहर में यौम-ए-अमन है वाइज़
आज तेरी तक़रीर नहीं है

ऊदी घटा तो वापस हो जा
आज कोई तदबीर नहीं है

शहर-ए-मोहब्बत का यूँ उजड़ा
दूर तलक तामीर नहीं है

इतनी हया क्यूँ आईने से
ये तो मेरी तस्वीर नहीं है

Kaifi bhopali

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Kyon phir rahe ho kaif ye khatre ka ghar liye

क्यों फिर रहे हो कैफ़ ये ख़तरे का घर लिए
ये कांच का शरीर ये काग़ज़ का सर लिए

शोले निकल रहे हैं गुलाबों के जिस्म से
तितली न जा क़रीब ये रेशम के पर लिए

जाने बहार नाम है लेकिन ये काम है
कलियां तराश लीं तो कभी गुल क़तर लिए

रांझा बने हैं, कैस बने, कोहकन बने
हमने किसी के वास्ते सब रूप धर लिए

ना मेहरबाने शहर ने ठुकरा दिया मुझे
मैं फिर रहा हूं अपना मकां दर-ब-दर लिए

Kaifi bhopali

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Aaj hum apni duaon ka asar dekhenge

आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे

आप तो आँख मिलाते हुए शरमाते हैं,
आप तो दिल के धड़कने से भी डर जाते हैं

फिर भी ये जिद है के हम ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे,
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे

प्यार करना दिल-ए-बेताब बुरा होता है
सुनते आए हैं के ये ख्वाब बुरा होता है

आज इस ख्वाब की ताबीर मगर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे

जानलेवा है मुहब्बत का समा आज की रात
शम्मा हो जाएगी जल जल के धुआँ आज की रात

आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे 
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे

Kaifi bhopali

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Ye dadhiyan ye tilakdhariyan nahi chalti

ये दाढ़ियाँ ये तिलक धारियाँ नहीं चलती
हमारे अहद में मक्कारियाँ नहीं चलती

कबीले वालों के दिल जोड़िए मेरे सरदार
सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं

बुरा न मान अगर यार कुछ बुरा कह दे
दिलों के खेल में खुद्दारियाँ नहीं चलती

छलक छलक पड़ी आँखों की गागरें अक्सर
सँभल सँभल के ये पनहारियाँ नहीं चलती

जनाब-ए-‘कैफ’ ये दिल्ली है ‘मीर’ ओ ‘गालिब’ की
यहाँ किसी की तरफ-दारियाँ नहीं चलती

Kaifi bhopali

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Tum se mil ke khush hai wo dawa kidhar gaya

तुम से न मिल के खुश हैं वो दावा किधर गया
दो रोज़ में गुलाब सा चेहरा उतर गया

जान-ए-बहार तुम ने वो काँटे चुभोए हैं
मैं हर गुल-ए-शगुफ्ता को छूने से डर गया

इस दिल के टूटने का मुझे कोई गम नहीं
अच्छा हुआ के पाप कटा दर्द-ए-सर गया

मैं भी समझ रहा हूँ के तुम तुम नहीं रहे
तुम भी ये सोच लो के मेरा ‘कैफ’ मर गया

Kaifi bhopali

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Thoda sa aks chand ke paikar mein dal de

थोड़ा सा अक्स चाँद के पैकर में डाल दे
तू आ के जान रात के मंज़र में डाल दे

जिस दिन मेरी जबीं किसी दहलीज़ पर झुके
उस दिन खुदा शगाफ मेरे सर में डाल दे

अल्लाह तेरे साथ मल्लाह को न देख
ये टूटी फूटी नाव समंदर में डा ल दे

ओ तेरे माल ओ ज़र को मैं तक्दीस बख्श दूँ
ला अपना माल ओ ज़र मेरी ठोकर में डाल दे

भाग ऐसे रह-नुमा से जो लगता है ख़िज्र सा
जाने ये किस जगह तुझे चक्कर में डाल दे

इस से तेरे मकान का मंज़र है बद-नुमा
चिंगारी मेरे फूस के छप्पर में डाल दे

मैं ने पनाह दी तुझे बारिश की रात में
तू जाते जाते आग मेरे घर में डाल दे

ऐ ‘कैफ’ जागते तुझे पिछला पहर हुआ
अब लाश जैसे जिस्म को बिस्तर में डाल दे

Kaifi bhopali

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