Fursat e kar faqat chaar ghadi hai yaaro

फ़ुरसत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारों 
ये न सोचो के अभी उम्र पड़ी है यारों

अपने तारीक मकानों से तो बाहर झाँको 
ज़िन्दगी शम्मा लिये दर पे खड़ी है यारों 

उनके बिन जी के दिखा देंगे चलो यूँ ही सही 
बात इतनी सी है के ज़िद आन पड़ी है यारों

फ़ासला चंद क़दम का है मना लें चल कर 
सुबह आई है मगर दूर खड़ी है यारों 

किस की दहलीज़ पे ले जाके सजाऊँ इस को 
बीच रस्ते में कोई लाश पड़ी है यारों 

जब भी चाहेंगे ज़माने को बदल डालेंगे 
सिर्फ़ कहने के लिये बात बड़ी है यारों
Jaan nisaar akhtar

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Achha hai un se koi takaza kiya na jaye

अच्छा है उन से कोई तक़ाज़ा किया न जाए
अपनी नज़र में आप को रुसवा किया न जाए 

हम हैं तेरा ख़याल है तेरा जमाल है 
इक पल भी अपने-आप को तन्हा किया न जाए 

उठने को उठ तो जाएँ तेरी अंजुमन से हम 
पर तेरी अंजुमन को भी सूना किया न जाए 

उनकी रविश जुदा है हमारी रविश जुदा
हमसे तो हर बात पे झगड़ा किया न जाए 

हर-चंद ए’तिबार में धोखे भी है मगर 
ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए 

लहजा बना के बात करें उनके सामने 
हमसे तो इस तरह का तमाशा किया न जाए 

इनाम हो ख़िताब हो वैसे मिले कहाँ 
जब तक सिफारिशों को इकट्ठा किया न जाए 

हर वक़्त हमसे पूछ न ग़म रोज़गार के 
हम से हर घूँट को कड़वा किया न जाए

Jaan nisaar akhtar

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Ashaar mere yu to jamane ke liye hai

अश्आर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शे’र फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं

आँखों में जो भर लोगे, तो काँटे-से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं

देखूँ तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ
मन्दिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहजीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए हैं

ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं

– जाँ निसार अख़्तर

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