Wo khat ke purze uda raha tha

वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था 
हवाओं का रुख़ दिखा रहा था 

कुछ और भी हो गया नुमायाँ 
मैं अपना लिखा मिटा रहा था 

उसी का इमान बदल गया है 
कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था 

वो एक दिन एक अजनबी को 
मेरी कहानी सुना रहा था 

वो उम्र कम कर रहा था मेरी 
मैं साल अपने बढ़ा रहा था 

Gulzar

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Shaam se aankh mein nami si hai

शाम से आँख में नमी सी है 
आज फिर आप की कमी सी है 

दफ़्न कर दो हमें कि साँस मिले 
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है 

वक़्त रहता नहीं कहीं थमकर 
इस की आदत भी आदमी सी है 

कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी 
एक तस्लीम लाज़मी सी है 

Gulzar

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Shaam se aankh mein nami si hai

शाम से आँख में नमी सी है 
आज फिर आप की कमी सी है 

दफ़्न कर दो हमें कि साँस मिले 
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है 

वक़्त रहता नहीं कहीं थमकर 
इस की आदत भी आदमी सी है 

कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी 
एक तस्लीम लाज़मी सी है 

Gulzar

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Bas ek chup si lagi hai

बस एक चुप सी लगी है, नहीं उदास नहीं!
कहीं पे सांस रुकी है!
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है!!

कोई अनोखी नहीं, ऐसी ज़िन्दगी लेकिन!
खूब न हो, मिली जो खूब मिली है!
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है!!

सहर भी ये रात भी, दोपहर भी मिली लेकिन!
हमीने शाम चुनी, हमीने शाम चुनी है!
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है!!

वो दासतां जो, हमने कही भी, हमने लिखी!
आज वो खुद से सुनी है!
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है!!

Gulzar

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Bas ek chup si lagi hai

बस एक चुप सी लगी है, नहीं उदास नहीं!
कहीं पे सांस रुकी है!
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है!!

कोई अनोखी नहीं, ऐसी ज़िन्दगी लेकिन!
खूब न हो, मिली जो खूब मिली है!
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है!!

सहर भी ये रात भी, दोपहर भी मिली लेकिन!
हमीने शाम चुनी, हमीने शाम चुनी है!
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है!!

वो दासतां जो, हमने कही भी, हमने लिखी!
आज वो खुद से सुनी है!
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है!!

Gulzar

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Nazm uljhi hui hai seene mein

नज़्म उलझी हुई है सीने में 
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर 
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह 
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं 
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम 
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है 
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी

Gulzar

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Haath chhoote bhi to rishte nahi chhoda karte

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते 
वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते 

जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन 
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते 

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा 
जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते 

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो 
ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते

Gulzar

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Haath chhoote bhi to rishte nahi chhoda karte

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते 
वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते 

जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन 
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते 

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा 
जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते 

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो 
ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते

Gulzar

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Ek purana mausam lota

एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी 
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हों तनहाई भी 

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं 
कितनी सौंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी 

दो दो शक़्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में 
मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी 

ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी है 
उन की बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी

Gulzar

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Ek parwaz dikhai di hai

एक परवाज़ दिखाई दी है 
तेरी आवाज़ सुनाई दी है

जिस की आँखों में कटी थी सदियाँ 
उस ने सदियों की जुदाई दी है 

सिर्फ़ एक सफ़ाह पलट कर उस ने 
बीती बातों की सफ़ाई दी है 

फिर वहीं लौट के जाना होगा 
यार ने कैसी रिहाई दी है 

आग ने क्या क्या जलाया है शब भर 
कितनी ख़ुश-रंग दिखाई दी है

Gulzar

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