Hai muskurata phool kaise titliyon se pooch lo

है मुस्कुराता फूल कैसे तितलियों से पूछ लो
जो बीतती काँटों पे है, वो टहनियों से पूछ लो 

लिखती हैं क्या किस्से कलाई की खनकती चूडि़याँ 
सीमाओं पे जाती हैं जो उन चिट्ठियों से पूछ लो 

होती है गहरी नींद क्या, क्या रस है अब के आम में
छुट्टी में घर आई हरी इन वर्दियों से पूछ लो 

होती हैं इनकी बेटियाँ कैसे बड़ी रह कर परे 
दिन-रात इन मुस्तैद सीमा-प्रहरियों से पूछ लो 

जो सुन सको किस्सा थके इस शह्‍र के हर दर्द का
सड़कों पे फैली रात की ख़ामोशियों से पूछ लो 

लौटा नहीं है काम से बेटा, तो माँ के हाल को
खिड़की से रह-रह झाँकती बेचैनियों से पूछ लो 

गहरी गईं कितनी जड़ें तब जाके क़द ऊँचा हुआ 
आकाश छूने की कहानी फुनगियों से पूछ लो 

लब सी लिए सबने यहाँ, सच जानना है गर तुम्हें 
ख़ामोश आँखों में दबी चिंगारियों से पूछ लो

Gautam rajrishi

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Hawa jab kisi ki kahani kahe hai

हवा जब किसी की कहानी कहे है
नये मौसमों की ज़ुबानी कहे है 

फ़साना लहर का जुड़ा है ज़मीं से
समन्दर मगर आसमानी कहे है 

कटी रात सारी तेरी करवटों में
कि ये सिलवटों की निशानी कहे है 

नई बात हो अब नये गीत छेड़ो
गज़रती घड़ी हर पुरानी कहे है 

मुहल्ले की सारी गली मुझको घूरे
हुई जब से बेटी सयानी कहे है 

यहाँ ना गुज़ारा सियासत बिना अब
मेरे मुल्क की राजधानी कहे है 

“रिवाजों से हट कर नहीं चल सकोगे”
कि जड़ ये मेरी ख़ानदानी कहे है

Gautam rajrishi

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Abhi jo komple futi hai chhote chhote beezo par

अभी जो कोंपलें फूटी हैं छोटे-छोटे बीजों पर
कहानी कल लिखेंगी ये समय की दहलीज़ों पर

किताबों में हैं उलझे ऐसे अब कपड़े नए कोई
ज़रा ना मांगते बच्चे ये त्योहारों व तीज़ों पर

हैं देते खु्शबू अब भी तेरी हाथों वाली मिहदी की
वो टाँके थे बटन जो तू ने मेरी कुछ कमीज़ों पर

न पूछो दास्ताँ महलों में चिनवाई मुहब्बत की
लुटे हैं कितने तख़्तो-ताज यहाँशाही कनीज़ों पर

वो नज़दीकी थी तेरी या थी मौसम में ही कुछ गर्मी
तू ने जो हाल पूछा तो चढ़ा तप और मरीज़ों पर

लेगा ये वक़्त करवट फिर नया इक दौर आयेगा
हँसेगी ये सदी तब चंद लम्हों की तमीज़ों पर

भला है ज़ोर कितना, देख, इन पतले-से धागों में
टिकी है मेरी दुनिया माँ की सब बाँधी तबीज़ों पर

– गौतम राजऋषि

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