Oothengi chilmane fir

उठेंगी चिलमनें फिर हम यहाँ देखेंगे किस-किस की
चलें,खोलें किवाड़ अब दब न जाए कोई भी सिसकी 

जलूँ जब मैं, जलाऊँ संग अपने लौ मशालों की
जलाए दीप जैसे, जब जले इक तीली माचिस की 

ज़रा-सा मुस्कुरा कर जब मेरी बेटी मुझे देखे
भुला देता हूँ दिन भर की थकन सारी मैं आफ़िस की 

सितारे उसके भी, हाँ, गर्दिशों में रेंगते देखा
कभी थी सर्ख़ियों में हर अदा की बात ही जिसकी 

हवाओं के परों पर उड़ने की यूँ तो तमन्ना थी
पड़ा जब सामने तूफ़ाँ, ज़मीं पैरों तले खिसकी 

उसी के नाम का दावा यहाँ हाक़िम की गद्‍दी पर
करे बोया फसादें जो ज़रा देखो चहुँ दिस की 

अगर जाना ही है तुमको,चले जाओ मगर सुन लो
तुम्हीं से है दीये की रौशनी, रौनक भी मजलिस की

Gautam rajrishi

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Wo jo apni khabar de hai

वो जब अपनी ख़बर दे है
जहाँ भर का असर दे है

रगों में गश्त कुछ दिन से
कोई आठों पहर दे है

चुराकर कौन सूरज से
यूं चंदा को नज़र दे है

ये रातों की है नक्काशी
जो सुबहों में कलर दे है

कहाँ है ज़ख्म औ’ हाकिम
भला मरहम किधर दे है

ज़रा-सा मुस्कुरा कर वो
नयी मुझको उमर दे है

तुम्हारे हुस्न का रुतबा
मुहब्बत को हुनर दे है

Gautam rajrishi

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Ab ke aisa daur bana hai

अब के ऐसा दौर बना है
हर ग़म काबिले-गौर बना है 

उसके कल की पूछ मुझे, जो
आज तिरा सिरमौर बना है 

फिर से चाँद को रोटी कहकर
आँगन में दो कौर बना है 

बंद न कर दिल के दरवाज़े
ये हम सब का ठौर बना है 

इस्कूलों में आए जवानी
बचपन का ये तौर बना है 

तेरी-मेरी बात छिड़ी तो
फिर क़िस्सा कुछ और बना है 

झगड़ा है कैसा आख़िर, जब
दिल्ली-सा लाहौर बना है
Gautam rajrishi

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Ek muddat se hue hai wo hamare yun to

एक मुद्‍दत से हुए हैं वो हमारे यूँ तो
चांद के साथ ही रहते हैं सितारे, यूँ तो 

तू नहीं तो न शिकायत कोई, सच कहता हूँ
बिन तेरे वक़्त ये गुज़रे न गुज़ारे यूँ तो 

राह में संग चलूँ ये न गवारा उसको
दूर रहकर वो करे ख़ूब इशारे यूँ तो 

नाम तेरा कभी आने न दिया होंठों पर
हाँ, तेरे ज़िक्र से कुछ शेर सँवारे यूँ तो 

तुम हमें चाहो न चाहो, ये तुम्हारी मर्ज़ी
हमने साँसों को किया नाम तुम्हारे यूँ तो 

ये अलग बात है तू हो नहीं पाया मेरा
हूँ युगों से तुझे आँखों में उतारे यूँ तो 

साथ लहरों के गया छोड़ के तू साहिल को
अब भी जपते हैं तेरा नाम किनारे यूँ तो

Gautam rajrishi

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Ek muddat se hue hai wo hamare yun to

एक मुद्‍दत से हुए हैं वो हमारे यूँ तो
चांद के साथ ही रहते हैं सितारे, यूँ तो 

तू नहीं तो न शिकायत कोई, सच कहता हूँ
बिन तेरे वक़्त ये गुज़रे न गुज़ारे यूँ तो 

राह में संग चलूँ ये न गवारा उसको
दूर रहकर वो करे ख़ूब इशारे यूँ तो 

नाम तेरा कभी आने न दिया होंठों पर
हाँ, तेरे ज़िक्र से कुछ शेर सँवारे यूँ तो 

तुम हमें चाहो न चाहो, ये तुम्हारी मर्ज़ी
हमने साँसों को किया नाम तुम्हारे यूँ तो 

ये अलग बात है तू हो नहीं पाया मेरा
हूँ युगों से तुझे आँखों में उतारे यूँ तो 

साथ लहरों के गया छोड़ के तू साहिल को
अब भी जपते हैं तेरा नाम किनारे यूँ तो

Gautam rajrishi

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Hari hai ye zami hamse ki ham to ishq bote hai

हरी है ये ज़मीं हमसे कि हम तो इश्क बोते हैं 
हमीं से है हँसी सारी, हमीं पलकें भिगोते हैं 
 
धरा सजती मुहब्बत से, गगन सजता मुहब्बत से 
मुहब्बत से ही खुश्बू, फूल, सूरज, चाँद होते हैं
 
करें परवाह क्या वो मौसमों के रुख़ बदलने की 
परिन्दे जो यहाँ परवाज़ पर तूफ़ान ढ़ोते हैं 
 
अज़ब से कुछ भुलैंयों के बने हैं रास्ते उनके 
पलट के फिर कहाँ आए, जो इन गलियों में खोते हैं 
 
जगी हैं रात भर पलकें, ठहर ऐ सुब्‍ह थोड़ा तो 
मेरी इन जागी पलकों में अभी कुछ ख़्वाब सोते हैं 
 
मिली धरती को सूरज की तपिश से ये खरोंचे जो 
सितारे रात में आकर उन्हें शबनम से धोते हैं 
 
लकीरें अपने हाथों की बनाना हमको आता है 
वो कोई और होंगे अपनी क़िस्मत पे जो रोते हैं

Gautam rajrishi

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Hari hai ye zami hamse ki ham to ishq bote hai

हरी है ये ज़मीं हमसे कि हम तो इश्क बोते हैं 
हमीं से है हँसी सारी, हमीं पलकें भिगोते हैं 
 
धरा सजती मुहब्बत से, गगन सजता मुहब्बत से 
मुहब्बत से ही खुश्बू, फूल, सूरज, चाँद होते हैं
 
करें परवाह क्या वो मौसमों के रुख़ बदलने की 
परिन्दे जो यहाँ परवाज़ पर तूफ़ान ढ़ोते हैं 
 
अज़ब से कुछ भुलैंयों के बने हैं रास्ते उनके 
पलट के फिर कहाँ आए, जो इन गलियों में खोते हैं 
 
जगी हैं रात भर पलकें, ठहर ऐ सुब्‍ह थोड़ा तो 
मेरी इन जागी पलकों में अभी कुछ ख़्वाब सोते हैं 
 
मिली धरती को सूरज की तपिश से ये खरोंचे जो 
सितारे रात में आकर उन्हें शबनम से धोते हैं 
 
लकीरें अपने हाथों की बनाना हमको आता है 
वो कोई और होंगे अपनी क़िस्मत पे जो रोते हैं

Gautam rajrishi

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Dekh panchhi jaa rahe apne basero main

देख पंछी जा रहें अपने बसेरों में
चल, हुई अब शाम, लौटें हम भी डेरों में 

सुब्‍ह की इस दौड़ में ये थक के भूले हम
लुत्फ़ क्या होता है अलसाये सबेरों में 

अब न चौबारों पे वो गप्पें-ठहाके हैं
गुम पड़ोसी हो गए ऊँची मुंडेरों में 

बंदिशें हैं अब से बाजों की उड़ानों पर
सल्तनत आकाश ने बाँटी बटेरों में 

देख ली तस्वीर जो तेरी यहाँ इक दिन
खलबली-सी मच गई सारे चितेरों में 

जिसको लूटा था उजालों ने यहाँ पर कल
ढ़ूँढ़ता है आज जाने क्या अंधेरों में 

कब पिटारी से निकल दिल्ली गए विषधर
ये सियासत की बहस, अब है सँपेरों में 

गज़नियों का खौफ़ कोई हो भला क्यूँ कर
जब बँटा हो मुल्क ही सारा लुटेरों में 

भीड़ में गुम हो गए सब आपसी रिश्ते
हर बशर अब क़ैद है अपने ही घेरों में 

ग़म नहीं, शिकवा नहीं कोई ज़माने से
ज़िन्दगी सिमटी है जब से चंद शेरों में

Gautam rajrishi

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Dekh panchhi jaa rahe apne basero main

देख पंछी जा रहें अपने बसेरों में
चल, हुई अब शाम, लौटें हम भी डेरों में 

सुब्‍ह की इस दौड़ में ये थक के भूले हम
लुत्फ़ क्या होता है अलसाये सबेरों में 

अब न चौबारों पे वो गप्पें-ठहाके हैं
गुम पड़ोसी हो गए ऊँची मुंडेरों में 

बंदिशें हैं अब से बाजों की उड़ानों पर
सल्तनत आकाश ने बाँटी बटेरों में 

देख ली तस्वीर जो तेरी यहाँ इक दिन
खलबली-सी मच गई सारे चितेरों में 

जिसको लूटा था उजालों ने यहाँ पर कल
ढ़ूँढ़ता है आज जाने क्या अंधेरों में 

कब पिटारी से निकल दिल्ली गए विषधर
ये सियासत की बहस, अब है सँपेरों में 

गज़नियों का खौफ़ कोई हो भला क्यूँ कर
जब बँटा हो मुल्क ही सारा लुटेरों में 

भीड़ में गुम हो गए सब आपसी रिश्ते
हर बशर अब क़ैद है अपने ही घेरों में 

ग़म नहीं, शिकवा नहीं कोई ज़माने से
ज़िन्दगी सिमटी है जब से चंद शेरों में

Gautam rajrishi

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Tu jo mujhse juda nahi hota

तू जो मुझसे जुदा नहीं होता
मैं ख़ुदा से ख़फ़ा नहीं होता 

ये जो कंधे नहीं तुझे मिलते
तो इतना तू बड़ा नहीं होता 

सच की ख़ातिर न खोलता मुख गर
सर ये मेरा कटा नहीं होता 

चांद मिलता न राह में उस रोज़
इश्क का हादसा नहीं होता 

पूछते रहते हाल-चाल अगर
फ़ासला यूँ बढ़ा नहीं होता 

छेड़ते तुम न गर निगाहों से
मन मेरा मनचला नहीं होता 

होती हर शै पे मिल्कियत कैसे
तू मेरा गर हुआ नहीं होता 

कहती है माँ, कहूँ मैं सच हरदम
क्या करूँ, हौसला नहीं होता

Gautam rajrishi

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