Wafa e vaad nahi vaad e digar bhi nahi

वफ़ा-ए-वा’दः नहीं, वा’दः-ए-दिगर भी नहीं

वो मुझसे रूठे तो थे, लेकिन इस क़दर भी नहीं 

बरस रही है हरीमे-हवस मे दौलते-हुस्न
गदा-ए-इ’श्क़ के कासे मे इक नज़र भी नहीं 

न जाने किसलिए उम्मीदवार बैठा हूँ
इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं 

निगाहे-शौक़ सरे-बज़्म बे-हिजाब  न हो
वो बे-ख़बर ही सही, इतने बे-ख़बर भी नहीं 

ये अ’हदे-तर्क़े-मोहब्बत है किसलिये आख़िर
सुकूने-क़ल्ब  इधर भी नहीं, उधर भी नहीं

faiz ahmed faiz

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Teri surat jo dilnashi ki hai

तेरी सूरत जो दिलनशीं की है

आशना शक्ल हर हसीं की है 

हुस्न से दिल लगा के हस्ती की
हर घड़ी हमने आतशीं की है 

सुबहे-गुल हो की शामे-मैख़ाना
मदह उस रू-ए-नाज़नीं की है 

शैख़ से बे-हिरास मिलते हैं
हमने तौबा अभी नहीं की है 

ज़िक्रे-दोज़ख़, बयाने-हूरो-कुसूर
बात गोया यहीं कहीं की है 

अश्क़ तो कुछ भी रंग ला न सके
ख़ूं से तर आज आस्तीं की है 

कैसे मानें हरम के सहल-पसन्द
रस्म जो आशिक़ों के दीं की है 

फ़ैज़ औजे-ख़याल से हमने
आसमां सिन्ध की ज़मीं की है

faiz ahmed faiz

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Sitam sikhlayega rasme wafa aise nahi hota

सितम सिखलायेगा रस्मे-वफा, ऐसे नहीं होता

सनम दिखलायेंगे राहे-खुदा, ऐसे नहीं होता 

गिनो सब हसरतें, जो खूं हुई हैं तन के मक़तल में
मेरे क़ातिल हिसाबे-खूबहां, ऐसे नहीं होता 

जहाने-दिल मे काम आती हैं, तद्बीरें न ताजीरें
यहां पैमाने-तस्लीमो-रज़ा, ऐसे नहीं होता 

हर इक शब हर घडी गुज़रे क़यामत यूं तो होता है
मगर हर सुबह हो रोज़े-जज़ा, ऐसे नहीं होता 

रवां है नब्ज़े-दौरां, गर्दिशों मे आसमां सारे
जो तम कहते हो सब कुछ हो चुका, ऐसे नहीं होता

faiz ahmad faiz

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Shakh par khoone gul rawan hai wahi

शाख़ पर ख़ूने-गुल रवाँ है वही

शोख़ी-ए-रंगे-गुलसिताँ है वही 

सर वही है तो आस्ताँ  है वही
जाँ वही है तो जाने-जाँ है वही 

अब जहाँ मेहरबाँ नहीं कोई
कूचः-ए-यारे-मेहरबाँ है वही 

बर्क़ सौ बार गिरके ख़ाक हुई
रौनक़े-ख़ाके-आशियाँ है वही 

आज की शब विसाल की शब है
दिल से हर रोज़ दासताँ है वही 

चाँद-तारे इधर नहीं आते
वरना ज़िंदाँ में आसमाँ है वही

faiz ahmed faiz

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Sab qatl hoke tere muqabil se aaye hai

सब क़त्ल होके तेरे मुक़ाबिल से आये हैं
हम लोग सुर्ख-रू हैं कि मंजिल से आये हैं 

शम्मए नज़र, खयाल के अंजुम, जिगर के दाग़
जितने चिराग़ हैं तेरी महफ़िल से आये हैं 

उठकर तो आ गये हैं तेरी बज़्म से मगर
कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आये हैं 

हर इक क़दम अज़ल था, हर इक ग़ाम ज़िन्दगी
हम घूम-फिर के कूचा-ए-क़ातिल से आये हैं 

बादे-ख़िज़ां का शुक्र करो फ़ैज़ जिसके हाथ
नामे किसी बहार-शमाइल से आये हैं

Faiz ahmad faiz

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Aaapki yaad aati rahi raat bhar

“आपकी याद आती रही रात-भर”
चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर

गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात-भर

फिर सबा सायः-ए-शाख़े-गुल के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात-भर

जो न आया उसे कोई ज़ंजीरे-दर
हर सदा पर बुलाती रही रात-भर

एक उमीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात-भर

Faiz Ahmad Faiz

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Phir harife bahar ho baithe

फिर हरीफ़े-बहार हो बैठे 
जाने किस-किस को आज रो बैठे 

थी मगर इतनी रायगाँ  भी न थी 
आज कुछ ज़िन्दगी से खो बैठे 

तेरे दर तक पहुँच के लौट आए 
इ’श्क़ की आबरू डुबो बैठे 

सारी दुनिया से दूर हो जाए 
जो ज़रा तेरे पास हो बैठे 

न गई तेरी बे-रुख़ी न गई 
हम तिरी आरज़ू भी खो बैठे 

फ़ैज़ होता रहे जो होना है 
शे’र लिखते रहा करो बैठे

Faiz Ahmad Faiz

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Raz e ulfat chhupa ke dekh liya

राज़े-उल्फ़त छुपा के देख लिया
दिल बहुत कुछ जला के देख लिया

और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया

वो मिरे हो के भी मेरे न हुए
उनको अपना बना के देख लिया

आज उनकी नज़र में कुछ हमने
सबकी नज़रें बचा के देख लिया

‘फ़ैज़’ तक़्मील-ए-ग़म भी हो न सकी
इश्क़ को आज़मा के देख लिया

आस उस दर से टूटती ही नहीं
जा के देखा, न जा के देख लिया

Faiz Ahmad Faiz

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Himmate iltiza nahi baqi

हिम्मते-इल्तिजा नहीं बाक़ी
ज़ब्त का हौसला नहीं बाक़ी

इक तिरी दीद छिन गई मुझसे
वरनः दुनिया में क्या नहीं बाक़ी

अपनी मश्क़े-सितम  से हाथ न खैंच
मैं नहीं या वफ़ा नहीं बाक़ी

तेरी चश्मे-अलमनवाज़  की ख़ैर
दिल में कोई गिला नहीं बाक़ी

हो चुका ख़त्म अ’हदे-हिज्रो-विसाल
ज़िंदगी में मज़ा नहीं बाक़ी

Faiz ahmad faiz

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दोनो जहाँ तेरी मोहब्बत में हार के

दोनो जहाँ तेरी मोहब्बत में हार के 
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के 

वीराँ है मैकदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास है 
तुम क्या गये के रूठ गये दिन बहार के 

इक फ़ुरसत-ए-गुनाह मिली, वो भी चार दिन 
देखे हैं हम ने हौसले परवरदिगार के 

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया 
तुझ से भी दिल फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के 

भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ‘फ़ैज़’ 
मत पूछ वल-वले दिल-ए-ना-कर्दाकार के 

-फैज़ अहमद फैज़

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