Garani e shabe hizran duchand kya karte

गरानी-ए-शबे-हिज़्रां दुचंद क्या करते

इलाजे-दर्द तेरे दर्दमन्द क्या करते 

वहीं लगी है जो नाज़ुक मुक़ाम थे दिल के
ये फ़र्क़ दस्ते-अदू के गज़ंद क्या करते 

जगह-जगह पे थे नासेह तो कू-ब-कू दिलबर
इन्हें पसंद, उन्हें नापसंद क्या करते 

हमीं ने रोक लिया पंजा-ए-जुनूं को वरना
हमें असीर ये कोताहकमन्द क्या करते 

जिन्हें ख़बर थी कि शर्ते-नवागरी क्या है
वो ख़ुशनवा गिला-ए-क़ैदो-बंद क्या करते 

गुलू-ए-इश्क़ को दारो-रसन पहुंच न सके
तो लौट आये तेरे सरबलंद, क्या करते

Faiz ahmed faiz

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Nazre galib

किसी गुमां पे तवक़्क़ो ज़ियादा रखते हैं

फिर आज कू-ए-बुतां का इरादा रखते हैं 

बहार आयेगी जब आयेगी, यह शर्त नहीं
कि तश्नाकाम रहें गर्चा बादा रखते हैं 

तेरी नज़र का गिला क्या जो है गिला दिल को
तो हमसे है तमन्ना ज़ियादा रखते हैं 

नहीं शराब से रंगी तो ग़र्क़े-ख़ूं हैं के हम
ख़याले-वज़ाए-क़सीमो-लबादा रखते हैं 

ग़मे-जहां हो, ग़मे-यार हो कि तीरे-सितम
जो आये, आये कि हम दिल कुशादा रखते हैं 

जवाबे-वाइज़े-चाबुक-ज़बां में फ़ैज़ हमें
यही बहुत है जो दो हर्फ़े-सादा रखते हैं

Faiz ahmed faiz

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Izze ahle sitam ki baat karo

इज्ज़े अहले-सितम की बात करो

इश्क़ के दम-क़दम की बात करो

बज़्मे-अहले-तरब से शरमाओ
बज़्मे-असहाबे-ग़म की बात करो

बज़्मे-सरवत के खुशनसीबों से
अज़्मते-चश्मे-नम की बात करो

है वही बात यूं भी और यूं भी
तुम सितम या करम की बात करो

ख़ैर, हैं अहले-दैर जैसे हैं
आप अहले-हरम की बात करो

हिज़्र की शब तो कट ही जायेगी
रोज़े-वस्ले-सनम की बात करो

जान जायेंगे जानने वाले
फ़ैज़ फ़रहादो-जम की बात करो

Faiz ahmed faiz

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Husn marhoon e josh e bada e naaz

हुस्न मरहून-ए-जोश-ए-बादा-ए-नाज़

इश्क़ मिन्नतकश-ए-फुसून-ए-नियाज़ 

दिल का हर तार लरज़िश-ए-पैहम
जां का हर रिश्त वक़्फ़-ए-सोज़-ओ-गुदाज़ 

सोज़िश-ए-दर्द-ए-दिल किसे मालूम
कौन जाने किसी के इश्क़ का राज़ 

मेरी ख़ामोशियों मे लरज़ां हैं
मेरे नालों के गुमशुदा आवाज़ 

हो चुका इश्क़ अब हवस ही सही
क्या करें फर्ज़ है अदा-ए-नमाज़ 

तू है और एक तग़ाफ़ुल-ए-पैहम
मैं हूं और इन्तज़ार-ए-बेअंदाज़ 

ख़ौफ़-ए-नाकामी-ए-उम्मीद है फ़ैज़
वर्ना दिल तोड़ दे तिलिस्म-ए-मजाज़

Faiz ahmed faiz

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Rang hai dil ka mere

तुम न आये थे तो हर चीज़ वहीं थी कि जो है

आसमां हद्दे-नज़र, राहगुज़र राहगुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय 

और अब शीशा-ए-मय, राहगुज़र, रंग-ए-फलक
रंग है दिल का मेरे खूने-जिगर होने तक
चम्पई रंग कभी, राहते-दीदार का रंग
सुर्मई रंग की है साअते-बेज़ार का रंग
ज़र्द पत्तों का, खसो-खार का रंग
सुर्ख फूलों का, दहकते हुए गुलज़ार का रंग
ज़हर का रंग, लहू रंग, शबे-तार का रंग
आसमां, राहगुज़र, शीशा-ए-मय
कोई भीग हुआ दामन, कोई दुखती हुई रग
कोई हर लहज़ा बदलता हुआ आईना है 

अब जो आये हो तो ठहरो कि कोई रंग, कोई रुत, कोई शै
एक जगह पर ठहरे
फिर से इक बार हर एक चीज़ वहीं हो कि जो है
आसमां हद्दे-नज़र, राहगुज़र राहगुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मयFaiz ahmed faiz

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Rahe khizan mein talash e bahaar karte rahe

रहे ख़िज़ां मे तलाशे-बहार करते रहे

शबे-सियह से तलब हुस्ने-यार करते रहे 

ख़याले-यार, कभी ज़िक्रे-यार करते रहे
इसी मता पे हम रोज़गार करते रहे 

नहीं शिकायते-हिज़्रां कि इस वसीले से
हम उनसे रिश्ता-ए-दिल उस्तवार करते रहे 

वो दिन कि कोई भी जब वजहे-इन्तज़ार न थी
हम उनमे तेरा सिवा इन्तज़ार करते रहे 

हम अपने राज़ पे नाज़ां थे शर्मसार न थे
हर एक से सुख़ने-राज़दार करते रहे 

ज़िया-ए-बज़्मे-जहां बार-बार मांद हुई
हदीसे-शोलारुख़ां बार-बार करते रहे 

उन्ही के फ़ैज़ से बाज़ारे-अक़्ल रौशन है
जो गाह-गाह जुनूं इख्तियार करते रहे

Faiz ahmed faiz

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Yoon bahar aai hai es baar ki jaise qasid

यूँ बहार आई है इस बार कि जैसे क़ासिद

कूचा-ए-यार से बे-नैलो-मराम आता है 

हर कोई शहर में फिरता है सलामत-दामन
रिंद मयख़ाने से शाइस्ता-ख़राम आता है 

हवसे-मुतरिबो-साक़ी मे परीशां अकसर
अब्र आता है कभी माहे-तमाम आता है 

शौक़वालों की हज़ीं महफिले-शब में अब भी
आमदे सुबह की सूरत तेरा नाम आता है 

अब भी एलाने-सहर करता हुआ मस्त कोई
दाग़े-दिल कर के फ़रोज़ाँ सरे-शाम आता है

Faiz ahmed faiz

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Ye zafa e gham ka chara wo nazate dil ka aalam

ये जफ़ा-ए-ग़म का चारा, वो नजाते-दिल का आलम

तेर हुस्न दस्त-ए-ईसा, तेरी याद रू-ए-मरीयम 

दिल-ओ-जां फ़िदा-ए-राहें, कभी आ के देख हमदम
सरे-कू-ए-दिलफ़िगारां, शबे आरज़ू का आलम 

तेरी दीद के सिवा है, तेरे शौक में बहारां
वो ज़मीं जहां गिरी है, तेरी गेसूओं की शबनम 

ये अजब क़यामतें हैं, तेरी रहगुज़र से गुज़रा
न हुआ कि मर मिटे हम, न हुआ कि जी उठे हम 

लो सुनी गयी हमारी, युं फिरे हैं दिन कि फिर से
वही गोशा-ए-क़फ़स है, वही फ़स्ले-गुल का आलम

Faiz ahmed faiz

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Yaade gazalchashma zikre samanizaran

यादे-ग़ज़ालचश्मां, ज़िक्रे-समनइज़ारां

जब चाहा कर लिया है कुंजे-क़फ़स बहारां 

आंखों में दर्दमंदी, होंठों पे उज़्रख़्वाही
जानाना-वार आई शामे-फ़िराक़े-यारां 

नामूसे-जानो-दिल की बाज़ी लगी थी वरना
आसां न थी कुछ ऐसी राहे-वफाशआरां 

मुज़रिम हो ख़्वाह कोई, रहता है नासेहों में
रू-ए-सुख़न हमेशा सू-ए-जिगरफ़िगारां 

है अब भी वक़्त ज़ाहिद, तरमीमे-ज़ुहद कर ले
सू-ए-हरम चला है अंबोहे-बादाख़्वारां 

शायद क़रीब पहुंची सुबहे-विसाल हमदम
मौजे-सबा लिये है ख़ुशबू-ए-खुशकनारां 

है अपनी किश्ते-वीरां सरसब्ज़ इस यक़ीं से
आयेंगे इस तरफ़ भी इक रोज़ अब्रो-बारां 

आयेगी फ़ैज़ इक दिन बादे-बहार लेकर
तस्लीमे-मयफ़रोशां, पैग़ामे-मयगुसारां

Faiz ahmed faiz

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Wo ahdey gham ki kahishaha

वो अहदे-ग़म की काहिशहा-ए-बेहासिल को क्या समझे

जो उनकी मुख़्त्सर रूदाद भी सब्र-आज़मा समझे 

यहां वाबस्तगी, वां बरहमी, क्या जानिये क्यों है
न हम अपनी नज़र समझे, न हम उनकी अदा समझे 

फ़रेबे-आरज़ू की सहल-अंगारी नहीं जाती
हम अपने दिल की धड़कन को तेरी आवाज़े-पा समझे 

तुम्हारी हर नज़र से मुनसलिक है रिस्ता-ए-हस्ती
मगर ये दूर की बातें, कोई नदान क्या समझे 

न पूछो अहदे-उल्फत की, बस एक ख़्वाबे-परीशां था
न दिल को राह पर लाये, न दिल का मुद्दआ समझे

Faiz ahmed faiz

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