Dil gaya tum ne liya hum kya kare

दिल गया तुम ने लिया हम क्या करें
जानेवाली चीज़ का ग़म क्या करें

पूरे होंगे अपने अरमां किस तरह
शौक़ बेहद वक्त है कम क्या करें

बक्श दें प्यार की गुस्ताख़ियां
दिल ही क़ाबू में नहीं हम क्या करें

तुंद ख़ू है कब सुने वो दिल की बात
ओर भी बरहम को बरहम क्या करें

एक सागर पर है अपनी जिन्दगी
रफ्ता- रफ्ता इस से भी कम क्या करें

कर चुको सब अपनी-अपनी हिकमतें
दम निकलता है ऐ मेरे हमदम क्या करें

दिल ने सीखा शेवा-ए-बेगानगी
ऐसे नामुहिरम को मुहिरम क्या करें

मामला है आज हुस्न-ओ-इश्क़ का
देखिए वो क्या करें हम क्या करें

कह रहे हैं अहल-ए-सिफ़ारिश मुझसे ‘दाग़’
तेरी किस्मत है बुरी हम क्या करें

Daag Dehalvi

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Darte ho chasm-o-zulf, nigaah-o-ada se hum

डरते हैं चश्म-ओ-ज़ुल्फ़, निगाह-ओ-अदा से हम
हर दम पनाह माँगते हैं हर बला से हम

माशूक़ जाए हूर मिले, मय बजाए आब
महशर में दो सवाल करेंगे ख़ुदा से हम

गो हाल-ए-दिल छुपाते हैं पर इस को क्या करें
आते हैं ख़ुद ख़ुद नज़र इक मुबतला से हम

देखें तो पहले कौन मिटे उसकी राह में
बैठे हैं शर्त बाँध के हर नक्श-ए-पा से हम

Daag Dehalvi

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Fire raah se wo yaha aate aate

फिरे राह से वो यहाँ आते आते
अजल मेरी रही तू कहाँ आते आते

मुझे याद करने से ये मुद्दा था
निकल जाए दम हिचकियां आते आते

कलेजा मेरे मुंह को आएगा इक दिन
यूं ही लब पे आह-ओ-फ़ुगां आते आते

नतीजा न निकला थके सब पयामी
वहाँ जाते जाते यहाँ आते आते

नहीं खेल ऐ ‘दाग़’ यारों से कह दो
कि आती है उर्दू ज़ुबां आते आते 

Daag Dehalvi

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Kaabe ki hai hawas kabhi ku-e-buta ki hai

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुतां की है
मुझ को ख़बर नहीं मेरी मिट्टी कहाँ की है

कुछ ताज़गी हो लज्जत-ए-आज़ार के लिए
हर दम मुझे तलाश नए आसमां की है

हसरत बरस रही है मेरे मज़ार से
कहते है सब ये कब्र किसी नौजवां की है

क़ासिद की गुफ्तगू से तस्ल्ली हो किस तरह
छिपती नहीं वो जो तेरी ज़बां की है

सुन कर मेरा फ़साना-ए-ग़म उस ने ये कहा
हो जाए झूठ सच, यही ख़ूबी बयां की है

क्यूं कर न आए ख़ुल्द से आदम ज़मीन पर
मौजूं वहीं वो ख़ूब है, जो शय जहाँ की है

उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं ‘दाग़’
हिन्दुस्तां में धूम हमारी ज़बां की है

Daag Dehalvi

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Lutf ishq me paye hai ki jee janta hai

लुत्फ़ इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है
रंज भी इतने उठाए हैं कि जी जानता है

जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने
तूने दिल इतने दुखाए हैं कि जी जानता है

तुम नहीं जानते अब तक ये तुम्हारे अंदाज़
वो मेरे दिल में समाए हैं कि जी जानता है

इन्हीं क़दमों ने तुम्हारे इन्हीं क़दमों की क़सम
ख़ाक में इतने मिलाए हैं कि जी जानता है

दोस्ती में तेरी दरपर्दा हमारे दुश्मन
इस क़दर अपने पराए हैं कि जी जानता है

Daag Dehalvi

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Pukarti hai khamoshi meri fuga ki tarah

पुकारती है ख़ामोशी मेरी फ़ुगां की तरह
निगाहें कहती हैं सब राज़-ए-दिल ज़ुबां की तरह

जला के दाग़-ए-मुहब्बत ने दिल को ख़ाक किया
बहार आई मेरे बाग में ख़िज़ां की तरह

तलाश-ए-यार में छोड़ी न सर-ज़मीं कोई
हमारे पांव में चक्कर हैं आसमां की तरह

अदा-ए-मत्लब-ए-दिल हमसे सीख जाए कोई
उन्हें सुना ही दिया हाल दास्तां की तरह 

Daag Dehalvi

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Khaatir se ya lihaz se mai maan to gaya

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
झूठी क़सम से आप का ईमान तो गया

दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं
उल्टी शिकायतें रही एहसान तो गया

अफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो जिल्लतें हुईं
लेकिन उसे जता तो दिया, जान तो गया

देखा है बुतकदे में जो ऐ शेख कुछ न पूछ
ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया

डरता हूँ देख कर दिल-ए-बेआरज़ू को मैं
सुनसान घर ये क्यूँ न हो मेहमान तो गया

क्या आई राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में
वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया

गो नामाबर से कुछ न हुआ पर हज़ार शुक्र
मुझको वो मेरे नाम से पहचान तो गया

बज़्म-ए-उदू में सूरत-ए-परवाना मेरा दिल
गो रश्क़ से जला तेरे क़ुर्बान तो गया

होश-ओ-हवास-ओ-ताब-ओ-तवाँ ‘दाग़’ जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

Daag Dehalvi

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Unke ek jaan-nisaar hum bhi hai

उनके एक जां-निसार हम भी हैं
हैं जहाँ सौ-हज़ार हम भी हैं

तुम भी बेचैन हम भी हैं बेचैन
तुम भी हो बेक़रार हम भी हैं

ऐ फ़लक कह तो क्या इरादा है
ऐश के ख्वास्तगार हम भी है

शहर खाली किए दुकां कैसी
एक ही वादा-ख्वार हम भी हैं

शर्म समझे तेरे तग़ाफ़ुल को
वाह! क्या होशियार हम भी हैं

तुम अगर अपनी ख़ू के हो माशूक़
अपने मतलब के यार हम भी हैं

जिस ने चाहा फंसा लिया हमको
दिल-बरों के शिकार हम भी हैं

कौन सा दिल है जिस में ‘दाग़’ नहीं
इश्क़ की यादगार हम भी हैं

Daag Dehalvi

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Gajab kiya, tere wade pe aitbaar kiya

ग़ज़ब किया, तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम रात क़यामत का इन्तज़ार किया

हंसा हंसा के शब-ए-वस्ल अश्क-बार किया
तसल्लिया मुझे दे-दे के बेकरार किया

हम ऐसे मह्व-ए-नज़ारा न थे जो होश आता
मगर तुम्हारे तग़ाफ़ुल ने होशियार किया

फ़साना-ए-शब-ए-ग़म उन को एक कहानी थी
कुछ ऐतबार किया और कुछ ना-ऐतबार किया

ये किसने जल्वा हमारे सर-ए-मज़ार किया
कि दिल से शोर उठा, हाए! बेक़रार किया

तड़प फिर ऐ दिल-ए-नादां, कि ग़ैर कहते हैं
आख़िर कुछ न बनी, सब्र इख्तियार किया

भुला भुला के जताया है उनको राज़-ए-निहां
छिपा छिपा के मोहब्बत के आशकार किया

तुम्हें तो वादा-ए-दीदार हम से करना था
ये क्या किया कि जहाँ के उम्मीदवार किया

ये दिल को ताब कहाँ है कि हो मालन्देश
उन्हों ने वादा किया हम ने ऐतबार किया

न पूछ दिल की हक़ीकत मगर ये कहते हैं
वो बेक़रार रहे जिसने बेक़रार किया

कुछ आगे दावर-ए-महशर से है उम्मीद मुझे
कुछ आप ने मेरे कहने का ऐतबार किया

Daag Dehalvi

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Rasm-e-ulfat sikha gaya koi

रस्म-ए-उल्फ़त सिखा गया कोई
दिल की दुनिया पे छा गया कोई

ता कयामत किसी तरह न बुझे
आग ऐसी लगा गया कोई

दिल की दुनिया उजाड़ सी क्यूं है
क्या यहां से चला गया कोई

वक्त-ए-रुखसत गले लगा कर ‘दाग़’
हंसते हंसते रुला गया कोई 

Daag Dehalvi

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