Ru-e-anwar nahi dekha jata

रू-ए- अनवर नहीं देखा जाता
देखें क्योंकर नहीं देखा जाता

रश्के-दुश्मन भी गवारा लेकिन
तुझको मुज़्तर नहीं देखा जाता

दिल में क्या ख़ाक उसे देख सके
जिसको बाहर नहीं देखा जाता

तौबा के बाद भी ख़ाली-ख़ाली
कोई साग़र नहीं देखा जाता

क्या शबे-वादा हुआ हूँ बेख़ुद
जानिबे-दर नही देखा जाता

मुख़्तसर ये है अब कि ‘दाग़’ का हाल
बन्दापरवर नहीं देखा जाता

Daag Dehalvi

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Aafat ki shokhiya hai tumhari nigaah me

आफत की शोख़ियां है तुम्हारी निगाह में
मेहशर के फितने खेलते हैं जल्वा-गाह में..

वो दुश्मनी से देखते हैं देखते तो हैं
मैं शाद हूँ कि हूँ तो किसी कि निगाह में..

आती है बात बात मुझे याद बार बार
कहता हूं दोड़ दोड़ के कासिद से राह में..

इस तौबा पर है नाज़ मुझे ज़ाहिद इस कदर
जो टूट कर शरीक हूँ हाल-ए-तबाह में

मुश्ताक इस अदा के बहुत दर्दमंद थे
ऐ दाग़ तुम तो बैठ गये एक आह में….

Daag Dehalvi

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Aafat ki shokhiya hai tumhari nigaah me

आफत की शोख़ियां है तुम्हारी निगाह में
मेहशर के फितने खेलते हैं जल्वा-गाह में..

वो दुश्मनी से देखते हैं देखते तो हैं
मैं शाद हूँ कि हूँ तो किसी कि निगाह में..

आती है बात बात मुझे याद बार बार
कहता हूं दोड़ दोड़ के कासिद से राह में..

इस तौबा पर है नाज़ मुझे ज़ाहिद इस कदर
जो टूट कर शरीक हूँ हाल-ए-तबाह में

मुश्ताक इस अदा के बहुत दर्दमंद थे
ऐ दाग़ तुम तो बैठ गये एक आह में….

Daag Dehalvi

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Na badle aadmi jannat se bhi baitul-hajan apna

न बदले आदमी जन्नत से भी बैतुल-हज़न अपना
कि अपना घर है अपना और है अपना वतन अपना

जो यूँ हो वस्ल तो मिट जाए सब रंजो-महन अपना
ज़बाँ अपनी दहन उनका ज़बाँ उनकी दहन अपना

न सीधी चाल चलते हैं न सीधी बात करते हैं
दिखाते हैं वो कमज़ोरों को तन कर बाँकपन अपना

अजब तासीर पैदा की है वस्फ़े-नोके-मिज़गाँ ने
कि जो सुनता है उसके दिल में चुभता है सुख़न अपना

पयामे-वस्ल, क़ासिद की ज़बानी और फिर उनसे
ये नादानी वो नाफ़हमी ये था दीवानापन अपना

Daag Dehalvi

बचा रखना जुनूँ के हाथ से ऐ बेकसो, उसको
जो है अब पैरहन अपना वही होगा क़फ़न अपना

निगाहे-ग़म्ज़ा कोई छोड़ते हैं गुलशने दिल को
कहीं इन लूटने वालों से बचता है चमन अपना

यह मौका मिल गया अच्छा उसे तेशा लगाने का
मुहब्बत में कहीं सर फोड़ता फिर कोहकन अपना

जो तख़्ते-लाला-ओ-गुल के खिले वो देख लेते हैं
तो फ़रमाते हैं वो कि ‘दाग़’ का ये है ये चमन अपना

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Tumhare khat me ek naya salaam kis ka tha

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

वफ़ा करेंगे ,निबाहेंगे, बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मुक़ाम किस का था

न पूछ-ताछ थी किसी की वहाँ न आवभगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम किस का था

हमारे ख़त के तो पुर्जे किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था

इन्हीं सिफ़ात से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किस का था

तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़
कहो, वो तज़्किरा-ए-नातमाम किसका था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था

अगर्चे देखने वाले तेरे हज़ारों थे
तबाह हाल बहुत ज़ेरे-बाम किसका था

हर इक से कहते हैं क्या ‘दाग़’ बेवफ़ा निकला
ये पूछे इन से कोई वो ग़ुलाम किस का था

Daag Dehalvi

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Tumhare khat me ek naya salaam kis ka tha

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

वफ़ा करेंगे ,निबाहेंगे, बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मुक़ाम किस का था

न पूछ-ताछ थी किसी की वहाँ न आवभगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम किस का था

हमारे ख़त के तो पुर्जे किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था

इन्हीं सिफ़ात से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किस का था

तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़
कहो, वो तज़्किरा-ए-नातमाम किसका था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था

अगर्चे देखने वाले तेरे हज़ारों थे
तबाह हाल बहुत ज़ेरे-बाम किसका था

हर इक से कहते हैं क्या ‘दाग़’ बेवफ़ा निकला
ये पूछे इन से कोई वो ग़ुलाम किस का था

Daag Dehalvi

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Ranj ki jab guftgu hone lagi

रंज की जब गुफ्तगू होने लगी
आप से तुम तुम से तू होने लगी

चाहिए पैग़ामबर दोने तरफ़
लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी

मेरी रुस्वाई की नौबत आ गई
उनकी शोहरत की क़ू-ब-कू़ होने लगी

नाजि़र बढ़ गई है इस क़दर
आरजू की आरजू होने लगी

अब तो मिल कर देखिए क्या रंग हो
फिर हमारी जुस्तजू होने लगी

‘दाग़’ इतराए हुए फिरते हैं आप
शायद उनकी आबरू होने लगी

Daag Dehalvi

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Dil ko kya ho gaya khuda jaane

दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने
क्यों है ऐसा उदास क्या जाने

कह दिया मैं ने हाल-ए-दिल अपना
इस को तुम जानो या ख़ुदा जाने

जानते जानते ही जानेगा
मुझ में क्या है वो अभी क्या जाने

तुम न पाओगे सादा दिल मुझसा
जो तग़ाफ़ुल को भी हया जाने

Daag Dehalvi

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Ajab apna haal hota jo visaal-e-yaar hota

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता

न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में
कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता

ये मज़ा था दिल्लगी का कि बराबर आग लगती
न तुम्हें क़रार होता न हमें क़रार होता

तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
अगर अपनी जिन्दगी का हमें ऐतबार होता

Daag Dehalvi

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Ujr aane me bhi hai aur bulate bhi nahi

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं 
बाइस-ए-तर्क-ए मुलाक़ात बताते भी नहीं

मुंतज़िर हैं दमे रुख़सत के ये मर जाए तो जाएँ 
फिर ये एहसान के हम छोड़ के जाते भी नहीं

सर उठाओ तो सही, आँख मिलाओ तो सही 
नश्शाए मैं भी नहीं, नींद के माते भी नहीं

क्या कहा फिर तो कहो; हम नहीं सुनते तेरी 
नहीं सुनते तो हम ऐसों को सुनाते भी नहीं

ख़ूब परदा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं 
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

मुझसे लाग़िर तेरी आँखों में खटकते तो रहे 
तुझसे नाज़ुक मेरी आँखों में समाते भी नहीं 

देखते ही मुझे महफ़िल में ये इरशाद हुआ 
कौन बैठा है इसे लोग उठाते भी नहीं

हो चुका तर्के तअल्लुक़ तो जफ़ाएँ क्यूँ हों
जिनको मतलब नहीं रहता वो सताते भी नहीं

ज़ीस्त से तंग हो ऐ दाग़ तो जीते क्यूँ हो
जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं

Daag Dehalvi

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