Usko number de ke meri

उसको नम्बर देके मेरी और उलझन बढ़ गई
फोन की घंटी बजी और दिल की धड़कन बढ़ गई

इस तरफ़ भी शायरी में कुछ वज़न-सा आ गया
उस तरफ़ भी चूड़ियों की और खन-खन बढ़ गई

हम ग़रीबों के घरों की वुसअतें मत पूछिए
गिर गई दीवार जितनी उतनी आँगन बढ़ गई

मशवरा औरों से लेना इश्क़ में मंहगा पड़ा
चाहतें क्या ख़ाक बढ़तीं और अनबन बढ़ गई

आप तो नाज़ुक इशारे करके बस चलते बने
दिल के शोलों पर इधर तो और छन-छन बढ़ गई

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Bacha hi kya hai hayat me ab

बचा ही क्या है हयात में अब सुनहरे दिन तो निपट गए हैं
यही ठिकाने के चार दिन थे सो तेरी हां हूं में कट गए हैं

हयात ही थी सो बच गया हूँ वगरना सब खेल हो चुका था
तुम्हारे तीरों ने कब ख़ता की हमीं निशाने से हट गए हैं

हरेक जानिब से सोच कर ही चढ़ाई जाती हैं आस्तीनें
वो हाथ लम्बे थे इस क़दर के हमारे क़द ही सिमट गए हैं

हमारे पुरखों की ये हवेली अजीब क़ब्रों-सी हो गई है
थे मेरे हिस्से में तीन कमरे जो आठ बेटों में बट गए हैं

मुहब्बतों की वो मंज़िलें हों, के जाहो-हशमत की मसनदें हों
कभी वहाँ फिर न मुड़ के देखा क़दम जहाँ से पलट गए हैं

बड़े परीशा हैं ऐ मुहासिब तिरे हिसाबो-किताब से हम
किसे बताएँ ये अलमिया अब, कि ज़र्ब देने पे घट गए हैं 

मैं आज खुल कर जो रो लिया हूँ तो साफ़ दिखने लगे हैं मंज़र
ग़मों की बरसात हो चुकी है वो अब्र आँखों से छँट गए हैं

वही नहीं एक ताज़ा दुश्मन, सभी को मिर्ची लगी हुई है
हमें क्या अपना बनाया तुमने, कई नज़र में खटक गए हैं

Ana kasmi

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Us qadry mutlaq se bagawat bhi bahut ki

उस क़ादरे-मुतलक़ से बग़ावत भी बहुत की
इस ख़ाक के पुतले ने जसारत भी बहुत की

इस दिल ने अदा कर दिया हक़ होने का अपने
नफ़रत भी बहुत की है मुहब्बत भी बहुत की

काग़ज़ पे तो अपना ही क़लम बोल रहा है
मंचों पे लतीफ़ों ने सियासत भी बहुत की

नादान सा दिखता था वो हुशियार बहुत था
सीधा-सा बना रह के शरारत भी बहुत की

मस्जिद में इबादत के लिए रोक रहा था
आलिम था मगर उसने जहालत भी बहुत की

इंसाँ की न की क़द्र तो लानत में पड़ा है
करने को तो शैतां ने इबादत भी बहुत की

मैं ही न सुधरने पे बज़िद था मेरे मौला
तूने तो मिरे साथ रियायत भी बहुत की

Ana kasmi

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Phan talashey hai

फ़न तलाशे है दहकते हुए जज़्बात का रंग
देख फीका न पड़े आज मुलाक़ात का रंग

हाथ मिलते ही उतर आया मेरे हाथों में
कितना कच्चा है मिरे दोस्त तिरे हाथ का रंग

है ये बस्ती तिरे भीगे हुए कपड़ों की तरह
तेरे इस्नान-सा लगता है ये बरसात का रंग

शायरी बोलूँ इसे या के मैं संगीत कहूँ
एक झरने-सा उतरता है तिरी बात का रंग

ये शहर शहरे-मुहब्बत की अलामत था कभी
इसपे चढ़ने लगा किस-किस के ख़्यालात का रंग

है कोई रंग जो हो इश्क़े-ख़ुदा से बेहतर
अपने आपे में चढ़ा लो उसी इक ज़ात का रंग

Ana kasmi

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Kaisa rishta hai is makan ke sath

कैसा रिश्ता है इस मकान के साथ
बात करता हूँ बेज़बान के साथ

आप तन्हा जनाब कुछ भी नहीं
तीर जचता है बस कमान के साथ

हर बुरे वक़्त पर नज़र उट्ठी
क्या तअल्लुक है आसमान के साथ

दुश्मनी थी तो कुछ तो हासिल था
छिन गया सारा कुछ अमान के साथ

थे ज़मीं पर तो ठीक-ठाक था सब
पर बिखरने लगे उड़ान के साथ

एक इंसाँ ही सो रहा है फ़क़त
कुल जहाँ उठ गया अजान के साथ

ना सही मानी हर्फ़ ही से सही
एक निस्बत तो है कुरान के साथ

Ana kasmi

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Kuchh chalega janab

कुछ चलेगा जनाब, कुछ भी नहीं
चाय, कॉफी, शराब, कुछ भी नहीं

चुप रहें तो कली लगें वो होंट
हँस पड़ें तो गुलाब कुछ भी नहीं

जो ज़मीं पर है सब हमारा है
सब है अच्छा, ख़राब कुछ भी नहीं

इन अमीरों की सोच तो ये है
हम ग़रीबों के ख़्वाब कुछ भी नहीं

मन की दुनिया में सब ही उरियाँ  हैं
दिल के आगे हिजाब कुछ भी नहीं

मीरे-ख़स्ता के शेर के आगे
हम से ख़ानाख़राब कुछ भी नहीं

उम्र अब अपनी अस्ल शक्ल में आ
क्रीम, पोडर, खि़ज़ाब कुछ भी नहीं

ज़िन्दगी भर का लेन देन ‘अना’
और हिसाबो-किताब कुछ भी नहीं

Ana kasmi

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Ye shabe akhtro kamar chup hai

ये शबे-अख़्तरो-क़मर चुप है
एक हंगामा है मगर चुप है

चल दिए क़ाफ़िले कयामत के
और दिल है कि बेख़बर चुप है

उनके गेसू और इस क़दर बरहम
इक तमाशा और इस क़दर चुप है

पहले कितनी पुकारें आती थीं
चल पड़ा हूँ तो रहगुज़र चुप है

बस ज़बाँ हाँ कहे ये ठीक नहीं
क्या हुआ क्यों तिरी नज़र चुप है

साथ तेरे ज़माना बोलता था
तू नहीं है तो हर बशर चुप है

बर्क़ ख़ामोश, ज़मज़मे ख़ामोश
शायरी का हरिक हुनर चुप है

राज़ कुछ तो है इस ख़मोशी का
बात कुछ तो है, तू अगर चुप है

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Chhoo jaye dil ko aisa koi fan abhi kahan

छू जाए दिल को ऐसा कोई फ़न अभी कहाँ
कोशिश है शायरी की ये सब शायरी कहाँ

यूँ भी हुआ कि रेत को सागर बना दिया
ऐसा नहीं तो जाओ अभी तिशनगी कहाँ

ये और बात दर्द ने शक्लें तराश लीं
जो नक्श बोलते हैं वो सूरत बनी कहाँ

माना हमारे जैसे हज़ारों हैं शहर में
तुम जैसी कोई चीज़ मगर दूसरी कहाँ

ये जो बरहना संत है पहचानिए हुज़ूर
ये गुल खिला गई है तिरी दिल्लगी कहाँ

अब आपको तो उसके सिवा सूझता नहीं
किस शख़्स की ये बात है और आप भी कहाँ

ये क्या छुपा रहा है वो टोपी में देखिए
इस मयकदे के सामने ये मौलवी कहाँ

आँखें हैं या के तश्त में जलते हुए चराग़
करने चले हैं आप ये अब आरती कहाँ

Ana kasmi

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Jo zaban se lagti hai

जो ज़बाँ से लगती है वो कभी नहीं जाती
दर्द भी नहीं जाता, चोट भी नहीं जाती

गर तलब हो सादिक़ तो ख़र्च-वर्च कर डालो
मुफ़्त की शराबों से तिश्नगी  नहीं जाती

अब भी उसके रस्ते में दिल धड़कने लगता है
हौसला तो करता हूँ बुज़दिली नहीं जाती

कुछ नहीं है दुनिया में इक सिवा मुहब्बत के
और ये मुहब्बत ही तुमसे की नहीं जाती

तर्के-मय को ऐ वाइज़ तू न कुछ समझ लेना
इतनी पी चुका हूँ के और पी नहीं जाती

शाख़ पर लगा है गर उसका क्या बिगड़ना है
फूल सूँघ लेने से ताज़गी नहीं जाती

नाव को किनारा तो वो ख़ुदा ही बख़्शेगा
फिर भी नाख़ुदाओं की बंदगी नहीं जाती

शेरो शायरी क्या है सब उसी का चक्कर है
वो कसक जो सीने से आज भी नहीं जाती

उसको देखना है तो दिल की खिड़कियाँ खोलो
बंद हों दरीचे तो रौशनी नहीं जाती

तेरी जुस्तजू में अब उसके आगे जाना है
जिन हुदूद के आगे शायरी नहीं जाती

Ana kasmi

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Roz chick chick me sar khapayen kya

रोज़ चिकचिक में सर खपायें क्या 
फैसला ठीक है निभायें क्या 

चश्मेनम का अजीब मौसम है 
शाम,झीलें,शफ़क़ घटायें क्या

बाल बिखरे हुये, ग़रीबां चाक
आ गयीं शहर में बलायें क्या 

अश्क़ झूठे हैं,ग़म भी झूठा है 
बज़्मेमातम में मुस्कुरायें क्या

हो चुका हो मज़ाक तो बोलो
अपने अब मुद्दआ पे आयें क्या

ख़ाक कर दें जला के महफ़िल को 
तेरे बाजू में बैठ जायें क्या 

झूठ पर झूठ कब तलक वाइज़
झूठ बातों पे सर हिलायें क्या

Ana kasmi

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