Jab se bulbul tune do tinke liye

जब से बुलबुल तूने दो तिनके लिये 

टूटती है बिजलियाँ इनके लिये 

है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार 
सादगी गहना है उस सिन के लिये 

कौन वीराने में देखेगा बहार 
फूल जंगल में खिले किनके लिये 

सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा 
मैंने दुनिया छोड़ दी जिन के लिये 

बाग़बाँ कलियाँ हों हल्के रंग की 
भेजनी हैं एक कमसिन के लिये 

सब हसीं हैं ज़ाहिदों को नापसन्द 
अब कोई हूर आयेगी इनके लिये 

वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिये

Amir minai

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Keh rahi hai hashr mein wo aankh sharmai

कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई 

हाय कैसे इस भरी महफ़िल में रुसवाई हुई 

आईने में हर अदा को देख कर कहते हैं वो 
आज देखा चाहिये किस किस की है आई हुई 

कह तो ऐ गुलचीं असीरान-ए-क़फ़स के वास्ते 
तोड़ लूँ दो चार कलियाँ मैं भी मुर्झाई हुई 

मैं तो राज़-ए-दिल छुपाऊँ पर छिपा रहने भी दे 
जान की दुश्मन ये ज़ालिम आँख ललचाई हुई 

ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा सब में हया का है लगाव
 
हाए रे बचपन की शोख़ी भी है शर्माई हुई 

वस्ल में ख़ाली रक़ीबों से हुई महफ़िल तो क्या 
शर्म भी जाये तो जानूँ के तन्हाई हुई 

गर्द उड़ी आशिक़ की तुर्बत से तो झुँझला के कहा 
वाह सर चढ़ने लगी पाँओं की ठुकराई हुई

Amir minai

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Tund mai our aise kamsin ke liye

तुन्द मय और ऐसे कमसिन के लिये 

साक़िया हल्की-सी ला इन के लिये 

मुझ से रुख़्सत हो मेरा अहद-ए-शबाब 
या ख़ुदा रखना न उस दिन के लिये 

है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार 
सादगी गहना है इस सिन के लिये 

सब हसीं हैं ज़ाहिदों को नापसन्द 
अब कोई हूर आयेगी इन के लिये 

वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर 
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिये 

सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा 
मैंने दुनिया छोड़ दी जिन के लिये 

लाश पर इबरत ये कहती है ‘अमीर’ 
आये थे दुनिया में इस दिन के लिये


Amir minai



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Wasl

वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिये

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Ishq

इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले 
मौत की राह नहीं देखते मरने वाले 

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Sarakti jaye hai rukh se nakab

सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता 
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता-आहिस्ता 

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा 
हया यकलख़त आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता 

शब-ए-फ़ुर्कत का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो 
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता 

सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना 
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता 

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतना 
इधर तो जल्दी जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता 

वो बेदर्दी से सर काटे ‘अमीर’ और मैं कहूँ उन से 
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता

Amir minai

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