Baad muddat unhe dekh kar yoon laga

बाद मुद्दत उन्हें देख कर यूँ लगा

जैसे बेताब दिल को क़रार आ गया

आरज़ू के गुल मुस्कुराने लगे
जैसे गुलशन में बहार आ गया

तिश्न नज़रें मिली शोख नज़रों से जब
मैं बरसने लगी जाम भरने लगे

साक़िया आज तेरी ज़रूरत नहीं
बिन पिये बिन पिलाये खुमार आ गया

रात सोने लगी सुबह होने लगी
शम्म बुझने लगी दिल मचलने लगे

वक़्त की रोश्नी में नहायी हुई
ज़िन्दगी पे अजब स निखार आ गया

Ali sardar zafri

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Ham bhi sharaabi tum bhi sharaabi

हम भी शराबी, तुम भी शराबी

छलके गुलाबी, छलके गुलाबी
तक़्दीर दिल कि ख़ाना ख़राबी
जब तक है जीना खुश हो के जी लें
जब तक है पीना जी भर के पी लें
हरत न कोइ रह जाये बाक़ी
कल सुबह के दामन में, तुम होगे न हुम होंगे
बस रेत के सीने पर कुछ नक्श क़दम होंगे
बस रात भर के मेहमान हम हैं
ज़ुल्फ़ों में शब के थोडे से कम हैं
बाक़ी रहेगा सागर न साक़ी

Ali sardar zafri

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Aao ki jashn-e-muhabbat manayen ham

आवो कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत मनायेँ हम

आती नहीं कहीं से दिल-ए-ज़िन्दा की सदा
सूने पड़े हैं कूचा-ओ-बाज़ार इश्क़ के
है शम-ए-अन्जुमन का नया हुस्न-ए-जाँ गुदाज़
शायद नहीं रहे वो पतंगों के वलवले
ताज़ा न रख सकेगी रिवायात-ए-दश्त-ओ-दर
वो फ़ित्नासर गये जिन्हें काँटें अज़ीज़ थे
अब कुछ नहीं तो नींद से आँखें जलायेँ हम
आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत मनायेँ हम
सोचा न था कि आयेगा ये दिन भी फिर कभी
इक बार हम मिले हैं ज़रा मुस्कुरा तो लें
क्या जाने अब न उल्फ़त-ए-देरीना याद आये
इस हुस्न-ए-इख़्तियार पे आँखें झुका तो लें
बरसा लबों से फूल तेरी उम्र हो दराज़
सँभले हुए तो हैं पर ज़रा डगमगा तो लें

Ali sardar zafri

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Shaam hoti hai saher hoti hai

शाम होती है सहर होती है ये वक़्त-ए-रवाँ

जो कभी मेरे सर पे संग-गराँ बन के गिरा

राह में आया कभी मेरी हिमाला बन कर
जो कभी उक्दा बना ऐसा कि हल ही न हुआ

अश्क बन कर मेरी आँखों से कभी टपका है
जो कभी ख़ून-ए-जिगर बन के मिज़्श्ग़ाँ पर आया

आज बेवास्ता यूँ गुज़रा चला जाता है
जैसे मैं कशमकश-ए-ज़ीस्त में शामिल ही नहीं

Ali sardar zafri

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Tumhare kehte mein jo gharmi-o-halawat hai

तुम्हारे लहजे में जो गर्मी-ओ-हलावत है

इसे भला सा कोई नाम दो वफ़ा की जगह

गनीम-ए-नूर का हमला कहो अँधेरों पर
दयार-ए-दर्द में आमद कहो मसीहा की

रवाँ-दवाँ हुए ख़ुश्बू के क़ाफ़िले हर सू
ख़ला-ए-सुबह में गूँजी सहर की शहनाई

ये एक कोहरा सा ये धुँध सी जो छाई है
इस इल्तहाब में सुरमगीं उजाले में

सिवा तुम्हारे मुझे कुछ नज़र नहीं आता
हयात नाम है यादों का तल्ख़ और शीरीं

भला किसी ने कभी रग-ओ-बू को पकड़ा है
शफ़क़ को क़ैद में रखा सबा को बन्द किया

हर एक लमहा गुरेज़ाँ है जैसे दुश्मन है
तुम मिलोगी न मैं, हम भी दोनों लम्हे हैं

Ali sardar zafri

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Dayaar-e-gair mein koi jahan na apna ho

दयार-ए-ग़ैर में कोई जहाँ न अपना हो

शदीद कर्ब की घड़ियाँ गुज़ार चुकने पर

कुछ इत्तेफ़ाक़ हो ऐसा कि एक शाम कहीं
किसी एक ऐसी जगह से हो यूँ ही मेरा गुज़र

जहाँ हुजूम-ए-गुरेज़ाँ में तुम नज़र आ जाओ
और एक एक को हैरत से देखता रहे

Ali sardar zafri

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Dabi hui hai mere labon mein kahin

दबी हुई है मेरे लबों में कहीं पे वो आह भी जो अब तक

न शोला बन के भड़क सकी है न अश्क-ए-बेसूद बन के निकली

घुटी हुई है नफ़स की हद में जला दिया जो जला सकी है
न शमा बन कर पिघल सकी है न आज तक दूध बन के निकली

दिया है बेशक मेरी नज़र को वो परतौ जो दर्द बख़्शे
न मुझ पर ग़ालिब ही आ सकी है न मेरा मस्जूद बन के निकली

Ali sardar zafri

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Tum se berangi-e-hasti ka gila karna tha

तुम से बेरंगी-ए-हस्ती का गिला करना था

दिल पे अंबार है ख़ूँगश्ता तमन्नाओं का
आज टूटे हुए तारों का ख़याल आया है
एक मेला है परेशान सी उम्मीदों का
चन्द पज़मुर्दा बहारों का ख़याल आया है
पाँव थक थक के रह जाते हैं मायूसी में
पुरमहन राहगुज़ारों का ख़याल आया है
साक़ी-ओ-बादा नहीं जाम-ओ-लब-ए-जू भी नहीं
तुम से कहना था कि अब आँख में आँसू भी नहीं

Ali sardar zafri

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Lamhon ke chiraag

वो नी‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍द की तरह नर्म सब्ज़ा

खवाबों की तरह रामिन्दा शबनम‌
फूलों की तरह शगुफ्ता चेहरे
खुशबू की तरह लतीफ़ बातें
किरनों की तरह जवाँ तबस्सुम‌
शोले की तरह दहकती काविशें‍‍‍‍‍
तारों की तरह चमकती आगोश
सागर की तरह छलकते सीने
सब काफिला‍ ऐ अदम के राही‌
वादी ऐ अदम में चल रहे हैं
तारीकियों कॆ खिले हैं परचम‌
लम्हों के चराग जल रहे हैं
हर लम्हा हसीन और जवाँ है
हर लम्हा फरोग ऐ जिस्मों जाँ है
हर लम्हा अज़ीमो जावीदान् है

Ali sardar zafri

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Fir wahi maange huye lamhe

फिर वही माँगे हुए लम्हे, फिर वही जाम-ए-शराब

फिर वही तारीक रातों में ख़याल-ए-माहताब
फिर वही तारों की पेशानी पे रंग-ए-लाज़वाल
फिर वही भूली हुई बातों का धुंधला सा ख़याल
फिर वो आँखें भीगी भीगी दामन-ए-शब में उदास
फिर वो उम्मीदों के मदफ़न ज़िन्दगी के आस-पास
फिर वही फ़र्दा की बातें फिर वही मीठे सराब
फिर वही बेदार आँखें फिर वही बेदार ख़्वाब
फिर वही वारफ़्तगी तनहाई अफ़सानों का खेल
फिर वही रुख़्सार वो आग़ोश वो ज़ुल्फ़-ए-सियाह
फिर वही शहर-ए-तमन्ना फिर वही तारीक राह
ज़िन्दगी की बेबसी उफ़्फ़ वक़्त के तारीक जाल
दर्द भी छिनने लगा उम्मीद भी छिनने लगी
मुझ से मेरी आरज़ू-ए-दीद भी छिनने लगी
फिर वही तारीक माज़ी फिर वही बेकैफ़ हाल
फिर वही बेसोज़ लम्हें फिर वही जाम-ए-शराब
फिर वही तारीक रातों में ख़याल-ए-माहताब

Ali sardar zafri

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