Sunane wale fasana tera hai

सुनने वाले फ़साना तेरा है

सिर्फ़ तर्ज़-ए-बयाँ ही मेरा है

यास की तीरगी ने घेरा है
हर तरफ़ हौल-नाक अँधेरा है

इस में कोई मेरा शरीक नहीं
मेरा दुख आह सिर्फ़ मेरा है

चाँदनी चाँदनी नहीं ‘अख़्तर’
रात की गोद में सवेरा है


Akhtar Ansari

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Sharshaar hoon chalakte huye jaam ki kasam

सरशार हूँ छलकते हुए जाम की क़सम

मस्त-ए-शराब-ए-शौक़ हूँ ख़य्याम की क़सम

इशरत-फ़रोश था मेरा गुज़रा हुआ शबाब
कहता हूँ खा के इशरत-ए-अय्याम की क़सम

होती थी सुब्ह-ए-ईद मेरी सुब्ह पर निसार
खाती थी शाम-ए-ऐश मेरी शाम की क़सम

‘अख़्तर’ मज़ाक़-ए-दर्द का मारा हुआ हूँ मैं
खाते हैं अहल-ए-दर्द मेरे नाम की क़सम


Akhtar Ansari

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Samajhta hoon main sab kuchh

समझता हूँ मैं सब कुछ सिर्फ़ समझाना नहीं आता

तड़पता हूँ मगर औरों को तड़पाना नहीं आता

ये जमुना की हसीं अमवाज क्यूँ अर्गन बजाती हैं
मुझे गाना नहीं आता मुझे गाना नहीं आता

ये मेरी ज़ीस्त ख़ुद इक मुस्तक़िल तूफ़ान है ‘अख़्तर’
मुझे इन ग़म के तूफ़ानों से घबराना नहीं आता

Akhtar Ansari

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Kasam in aankhon ki jin se lahoo tapakta hai

क़सम इन आँखों की जिन से लहू टपकता है

मेरे जिगर में इक आतिश-कदा दहकता है

गुज़िश्ता काहिश ओ अंदोह के ख़याल ठहर
मेरे दिमाग़ में शोला सा इक भड़कता है

किसी के ऐश-ए-तमन्ना की दास्ताँ न कहो
कलेजा मेरी तमन्नाओं का धड़कता है

इलाज-ए-‘अख़्तर’-ए-ना-काम क्यूँ नहीं मुमकिन
अगर वो जी नहीं सकता तो मर तो सकता है.


Akhtar Ansari

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Phool soonghe jaane kya yaad aa gaya

फूल सूँघे जाने क्या याद आ गया

दिल अजब अंदाज़ से लहरा गया

उस से पूछे कोई चाहत के मज़े
जिस ने चाहा और जो चाहा गया

एक लम्हा बन के ऐश-ए-जावेदाँ
मेरी सारी ज़िंदगी पर छा गया

ग़ुँचा-ए-दिल है कैसा ग़ुँचा था
जो खिला और खिलते ही मुरझा गया

रो रहा हूँ मौसम-ए-गुल देख कर
मैं समझता था मुझे सब्र आ गया

ये हवा ये बर्ग-ए-गुल का एहतिज़ाज़
आज मैं राज़-ए-मुसर्रत पा गया

‘अख़्तर’ अब बरसात रुख़्सत हो गई
अब हमारा रात का रोना गया


Akhtar Ansari


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Muhabbat karne walon ke bahar afroz seeno mein

मोहब्बत करने वालों के बहार-अफ़रोज़ सीनों में

रहा करती है शादाबी ख़ज़ाँ के भी महीनों में

ज़िया-ए-महर आँखों में है तौबा मह-जबीनों में
के फ़ितरत ने भरा है हुस्न ख़ुद अपना हसीनों में

हवा-ए-तुंद है गर्दाब है पुर-शोर धारा है
लिए जाते हैं ज़ौक-ए-आफ़ियत सी शय सफीनों में

मैं हँसता हूँ मगर ऐ दोस्त अक्सर हँसते हुए भी
छुपाए होते हैं दाग़ और नासूर अपने सीनों में

मैं उन में हूँ जो हो कर आस्ताँ-ए-दोस्त से महरूम
लिए फिरते हैं सजदों की तड़प अपनी जबीनों में

मेरी ग़ज़लें पढ़ें सब अहल-ए-दिल और मस्त हो जाएँ
मय-ए-जज़्बात लाया हूँ मैं लफ़्ज़ी आब-गीनों में

Akhtar Ansari

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Muhabbat hai asliyat hai

मोहब्बत है अज़ीयत है हुजूम-ए-यास-ओ-हसरत है

जवानी और इतनी दुख भरी कैसी क़यामत है

वो माज़ी जो है इक मजमुआ अश्कों और आहों का
न जाने मुझ को इस माज़ी से क्यूँ इतनी मोहब्बत है

लब-ए-दरिया मुझे लहरों से यूँही चहल करने दो
के अब दिल को इसी इक शुग़्ल-ए-बे-मानी में राहत है

तेरा अफ़साना ऐ अफ़साना-ख़्वाँ रंगीं सही मुमकिन
मुझे रूदाद-ए-इशरत सुन के रो देने की आदत है

कोई रोए तो मैं बे-वजह ख़ुद भी रोने लगता हूँ
अब ‘अख़्तर’ चाहे तुम कुछ भी कहो ये मेरी फ़ितरत है


Akhtar Ansari

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Mere rukh se sukoon tapakta hai

मेरे रुख़ से सुकूँ टपकता है

गुफ़्तुगू से जुनूँ टपकता है

मस्त हूँ मैं मेरी नज़र से भी
बाद-ए-लाला-गूँ टपकता है

हाँ कब ख़्वाब-ए-इश्क़ देखा था
अब तक आँखों से ख़ूँ टपकता है

आह ‘अख़्तर’ मेरी हँसी से भी
मेरा हाल-ए-ज़ुबूँ टपकता है

Akhtar Ansari

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Main dil ko cheer ke rakh doon 

मैं दिल को चीर के रख दूँ ये एक सूरत है

बयाँ तो हो नहीं सकती जो अपनी हालत है

मेरे सफ़ीने को धारे पे डाल दे कोई
मैं डूब जाऊँ के तैर जाऊँ मेरी क़िस्मत है

रगों में दौड़ती हैं बिजलियाँ लहू के एवज़
शबाब कहते हैं जिस चीज़ को क़यामत है

लताफ़तें सिमट आती हैं ख़ुल्द की दिल में
तसव्वुरात में अल्लाह कितनी क़ुदरत है

Akhtar Ansari

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Kya khabar thi ek bala-e-na-gahani aayegi

क्या ख़बर थी इक बला-ए-ना-गहानी आएगी

ना-मुरादी की निशानी ये जवानी आएगी.

सब कहेंगे कौन करता है हमारे राज़ फ़ाश
जब मेरे लब पर मोहब्बत की कहानी आएगी.

ना-मुरादी से कहो मुँह फेर ले अपना ज़रा
मेरी दुनिया में उरूस-ए-कामरानी आएगी.

जब ख़िज़ाँ की नज़्र हो जाएगी दुनिया से शबाब
याद ‘अख़्तर’ ये सितम-आरा जवानी आएगी.

Akhtar Ansari

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