Kis kis ada se toone jalwa dikha ke mara

किस-किस अदा से तूने जलवा दिखा के मारा

आज़ाद हो चुके थे, बन्दा बना के मारा

अव्वल  बना के पुतला, पुतले में जान डाली
फिर उसको ख़ुद क़ज़ा  की सूरत में आके मारा

आँखों में तेरी ज़ालिम छुरियाँ छुपी हुई हैं 
देखा जिधर को तूने पलकें उठाके मारा

ग़ुंचों में आके महका, बुलबुल में जाके चहका 
इसको हँसा के मारा, उसको रुला के मारा 

सोसन  की तरह ‘अकबर’, ख़ामोश हैं यहाँ पर 
नरगिस में इसने छिप कर आँखें लड़ा के मारा


Akbar Allahbadi


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Fir gayi aap ki do din mein tabeeyat kaisi

फिर गई आप की दो दिन में तबीयत कैसी 

ये वफ़ा कैसी थी साहब ! ये मुरव्वत कैसी 

दोस्त अहबाब से हंस बोल के कट जायेगी रात 
रिंद-ए-आज़ाद हैं, हमको शब-ए-फुरक़त कैसी 

जिस हसीं से हुई उल्फ़त वही माशूक़ अपना 
इश्क़ किस चीज़ को कहते हैं, तबीयत कैसी 


है जो किस्मत में वही होगा न कुछ कम, न सिवा 
आरज़ू कहते हैं किस चीज़ को, हसरत कैसी 

हाल खुलता नहीं कुछ दिल के धड़कने का मुझे 
आज रह रह के भर आती है तबीयत कैसी 

कूचा-ए-यार में जाता तो नज़ारा करता 
क़ैस आवारा है जंगल में, ये वहशत कैसी

Akbar Allahbadi

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Jo yoon hi lehza-lehza daagh-e-hasrat ki tarrakki hai

जो यूं ही लहज़ा-लहज़ा दाग़-ए-हसरत की तरक़्क़ी है 

अजब क्या, रफ्ता-रफ्ता मैं सरापा सूरत-ए-दिल हूँ 

मदद-ऐ-रहनुमा-ए-गुमरहां इस दश्त-ए-गु़र्बत में 
मुसाफ़िर हूँ, परीशाँ हाल हूँ, गु़मकर्दा मंज़िल हूँ 

ये मेरे सामने शेख-ओ-बरहमन क्या झगड़ते हैं 
अगर मुझ से कोई पूछे, कहूँ दोनों का क़ायल हूँ 

अगर दावा-ए-यक रंगीं करूं, नाख़ुश न हो जाना 
मैं इस आईनाखा़ने में तेरा अक्स-ए-मुक़ाबिल हूँ

Akbar Allahbadi

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Armaan mere dil ka nikalne nahi dete

ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते

सच है कि हम ही दिल को संभलने नहीं देते

आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते
अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते

किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते

परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले
क्यों हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते

हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़. है हर वक़्त
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते

गर्मी-ए-मोहब्बत में वो है आह से माअ़ने
पंखा नफ़स-ए-सर्द. का झलने नहीं देते

Akbar Allahbadi

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Ek boodha naheef-o-khasta daraaz

एक बूढ़ा नहीफ़-ओ-खस्ता दराज़ 

इक ज़रूरत से जाता था बाज़ार 
ज़ोफ-ए-पीरी से खम हुई थी कमर 
राह बेचारा चलता था रुक कर 
चन्द लड़कों को उस पे आई हँसी
क़द पे फबती कमान की सूझी
कहा इक लड़के ने ये उससे कि बोल
तूने कितने में ली कमान ये मोल
पीर मर्द-ए-लतीफ़-ओ-दानिश मन्द 
हँस के कहने लगा कि ए फ़रज़न्द 
पहुँचोगे मेरी उम्र को जिस आन 
मुफ़्त में मिल जाएगी तुम्हें ये कमान


Akbar Allahbadi

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Unhe shauk-e-ebadat bhi hai

उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है और गाने की आदत भी

निकलती हैं दुआऐं उनके मुंह से ठुमरियाँ होकर 

तअल्लुक़ आशिक़-ओ-माशूक़ का तो लुत्फ़ रखता था
मज़े अब वो कहाँ बाक़ी रहे बीबी मियाँ होकर 

न थी मुतलक़ तव्क़्क़ो बिल बनाकर पेश कर दोगे 
मेरी जाँ लुट गया मैं तो तुम्हारा मेहमाँ होकर 

हक़ीक़त में मैं एक बुलबुल हूँ मगर चारे की ख़्वाहिश में 
बना हूँ मिमबर-ए-कोंसिल यहाँ मिट्ठू मियाँ होकर

निकाला करती है घर से ये कहकर तू तो मजनूं है 
सता रक्खा है मुझको सास ने लैला की माँ होकर


Akbar Allahbadi

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Pinjre mein muniya

मुंशी कि क्लर्क या ज़मींदार

लाज़िम है कलेक्टरी का दीदार 

हंगामा ये वोट का फ़क़त है
मतलूब हरेक से दस्तख़त है

हर सिम्त मची हुई है हलचल
हर दर पे शोर है कि चल-चल

टमटम हों कि गाड़ियां कि मोटर
जिस पर देको, लदे हैं वोटर

शाही वो है या पयंबरी है
आखिर क्या शै ये मेंबरी है

नेटिव है नमूद ही का मुहताज
कौंसिल तो उनकी हि जिनका है राज

कहते जाते हैं, या इलाही
सोशल हालत की है तबाही

हम लोग जो इसमें फंस रहे हैं
अगियार भी दिल में हंस रहे हैं

दरअसल न दीन है न दुनिया
पिंजरे में फुदक रही है मुनिया

स्कीम का झूलना वो झूलें
लेकिन ये क्यों अपनी राह भूलें

क़ौम के दिल में खोट है पैदा
अच्छे अच्छे हैं वोट के शैदा

क्यो नहीं पड़ता अक्ल का साया
इसको समझें फ़र्जे-किफ़ाया

भाई-भाई में हाथापाई
सेल्फ़ गवर्नमेंट आगे आई

पाँव का होश अब फ़िक्र न सर की 
वोट की धुन में बन गए फिरकी


Akbar Allahbadi

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Aankhen mujhe talwon se wo malne nahi dete

आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते

अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते

ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते
सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते

किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते

परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले
क्यों हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते

हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते

गर्मी-ए-मोहब्बत में वो है आह से माने
पंखा नफ़स-ए-सर्द का झलने नहीं देते

Akbar Allahbadi

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Samjhe wahi esko jo ho deewana kisi ka

समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का 

‘अकबर’ ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का 

गर शैख़-ओ-बहरमन सुनें अफ़साना किसी का 
माबद. न रहे काबा-ओ-बुतख़ाना  किसी का 

अल्लाह ने दी है जो तुम्हे चाँद-सी सूरत
रौशन भी करो जाके सियहख़ाना  किसी का 

अश्क आँखों में आ जाएँ एवज़ नींद के साहब 
ऐसा भी किसी शब सुनो अफ़साना किसी का 

इशरत  जो नहीं आती मेरे दिल में, न आए 
हसरत ही से आबाद है वीराना किसी का

करने जो नहीं देते बयां हालत-ए-दिल को 
सुनिएगा लब-ए-ग़ौर  से अफ़साना किसी का 

कोई न हुआ रूह का साथी दम-ए-आख़िर
काम आया न इस वक़्त में याराना किसी का 

हम जान से बेज़ार  रहा करते हैं ‘अकबर’ 
जब से दिल-ए-बेताब है दीवाना किसी का


Akbar Allahbadi


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Duniya mein hoon duniya ka talabgaar nahi hoon

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ

बाज़ार से गुज़रा हूँ, ख़रीददार नहीं हूँ

ज़िन्दा हूँ मगर ज़ीस्त  की लज़्ज़त  नहीं बाक़ी
हर चंद कि हूँ होश में, होशियार नहीं हूँ

इस ख़ाना-ए-हस्त से गुज़र जाऊँगा बेलौस
साया हूँ फ़क़्त , नक़्श बेदीवार नहीं हूँ

अफ़सुर्दा  हूँ इबारत से, दवा की नहीं हाजित
गम़ का मुझे ये जो’फ़  है, बीमार नहीं हूँ

वो गुल  हूँ ख़िज़ां  ने जिसे बरबाद किया है
उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ

यारब मुझे महफ़ूज़  रख उस बुत के सितम से
मैं उस की इनायत  का तलबगार  नहीं हूँ

अफ़सुर्दगी-ओ-जौफ़  की कुछ हद नहीं “अकबर”
क़ाफ़िर के मुक़ाबिल में भी दींदार नहीं हूँ


Akbar Allahbadi

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