Aap agar hamko mil Gaye hote

आप अगर हमको मिल गये होते

बाग़ में फूल खिल गये होते

आप ने यूँ ही घूर कर देखा
होंठ तो यूँ भी सिल गये होते

काश हम आप इस तरह मिलते
जैसे दो वक़्त मिल गये होते

हमको अहल-ए-ख़िरद मिले ही नहीं
वरना कुछ मुन्फ़ईल गये होते

उसकी आँखें ही कज-नज़र थीं ‘अदम’
दिल के पर्दे तो हिल गये होते

Abdul hameed Adam

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Baaten Teri wo fasane tere

बातें तेरी वो वो फ़साने तेरे

शगुफ़्ता शगुफ़्ता बहाने तेरे

बस एक ज़ख़्म नज़्ज़ारा हिस्सा मेरा
बहारें तेरी आशियाने तेरे

बस एक दाग़-ए-सज्दा मेरी क़ायनात
जबीनें तेरी आस्ताने तेरे

ज़मीर-ए-सदफ़ में किरन का मुक़ाम
अनोखे अनोखे ठिकाने तेरे

फ़क़ीरों का जमघट घड़ी दो घड़ी
शराबें तेरी बादाख़ाने तेरे

बहार-ओ-ख़िज़ाँ कम निगाहों के वहम
बुरे या भले सब ज़माने तेरे

‘अदम’ भी है तेरा हिकायतकदाह
कहाँ तक गये हैं फ़साने तेरे


Abdul hameed Adam

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Ab do aalam se sada-e-saaz aati hai

अब दो आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे

दिल की आहट से तेरी आवाज़ आती है मुझे

या समात का भरम है या किसी नग़्में की गूँज
एक पहचानी हुई आवाज़ आती है मुझे

किसने खोला है हवा में गेसूओं को नाज़ से
नर्मरौ बरसात की आवाज़ आती है मुझे

उस की नाज़ुक उँगलियों को देख कर अक्सर ‘अदम’
एक हल्की सी सदा-ए-साज़ आती है मुझे


Abdul hameed Adam






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Tere dar pe wo aa hi haste hai

तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं

जिनिको पीने की आस हो साक़ी

आज इतनी पिला दे आँखों से
ख़त्म रिंदों की प्यास हो साक़ी

हल्क़ा हल्क़ा सुरूर है साक़ी
बात कोई ज़रूर है साक़ी

तेरी आँखें किसी को क्या देंगी
अपना अपना सुरूर है साक़ी

तेरी आँखों को कर दिया सजदा
मेरा पहला क़ुसूर है साक़ी

तेरे रुख़ पे ये परेशाँ ज़ुल्फ़ें
इक अँधेरे में नूर है साक़ी

तेरी आँखें किसी को क्या देंगी 
अपना अपना सुरूर है साक़ी

पीने वालों को भी नहीं मालूम
मैकदा कितनी दूर है साक़ी

Abdul hameed Adam

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E maigusaron sawere sawere

ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे

बड़ी रोशनी बख़्शते हैं नज़र को

ख़राबात के गिर्द फेरे पे फेरे
तेरे गेसूओं के मुक़द्दस अँधेरे

किसी दिन इधर से गुज़र कर तो देखो
बड़ी रौनक़ें हैं फ़क़ीरों के डेरे

ग़म-ए-ज़िन्दगी को ‘अदम’ साथ लेकर
कहाँ जा रहे हो सवेरे सवेरे


Abdul hameed Adam


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Suraj ki har Kiran Teri soorat pe waar doon

सूरज की हर किरण तेरी सूरत पे वार दूँ

दोज़ख़ को चाहता हूँ कि जन्नत पे वार दूँ

इतनी सी है तसल्ली कि होगा मुक़ाबला
दिल क्या है जाँ भी अपनी क़यामत पे वार दूँ

इक ख़्वाब था जो देख लिया नीन्द में कभी
इक नीन्द है जो तेरी मुहब्बत पे वार दूँ

‘अदम’ हसीन नीन्द मिलेगी कहाँ मुझे
फिर क्यूँ न ज़िन्दगानी को तुर्बत पे वार दूँ

Abdul hameed Adam

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Apni zulfon ko sitaron ke hawale Kar do

अपनी ज़ुल्फ़ों को सितारों के हवाले कर दो

शहर-ए-गुल बादागुसारों के हवाले कर दो

तल्ख़ि-ए-होश हो या मस्ती-ए-इदराक-ए-जुनूँ
आज हर चीज़ बहारों के हवाले कर दो 

मुझ को यारो न करो रहनुमाओं के सुपुर्द
मुझ को तुम रहगुज़ारों के हवाले कर दो

जागने वालों का तूफ़ाँ से कर दो रिश्ता
सोने वालों को किनारों के हवाले कर दो

मेरी तौबा का बजा है यही एजाज़ ‘अदम’
मेरा साग़र मेरे यारों के हवाले कर दो

Abdul hameed Adam

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Suboo ko dour mein Lao bahar ke din hain

सुबू को दौर में लाओ बहार के दिन हैं

हमें शराब पिलाओ बहार के दिन हैं 

ये काम आईन-ए-इबादत है मौसम-ए-गुल में
हमें गले से लगओ बहार के दिन हैं

ठहर ठहर के न बरसो उमड़ पड़ो यक दम 
सितमगरी से घटाओ बहार के दिन हैं

शिकस्ता-ए-तौबा का कब ऐसा आयेगा मौसम
‘अदम’ को घेर के लाओ बहार के दिन हैं

Abdul hameed Adam

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Hans ke Bola Karo bulaya karo

हँस के बोला करो बुलाया करो

आप का घर है आया जाया करो

मुस्कुराहट है हुस्न का ज़ेवर
रूप बढ़ता है मुस्कुराया करो

हदसे बढ़कर हसीन लगते हो
झूठी क़स्में ज़रूर खाया करो

हुक्म करना भी एक सख़ावत है
हम को ख़िदमत कोई बताया करो

बात करना भी बादशाहत है
बात करना न भूल जाया करो

ता के दुनिय की दिलकशी न घटे
नित नये पैरहन में आया करो

कितने सादा मिज़ाज हो तुम ‘अदम’
उस गली में बहुत न जाया करो

Abdul hameed Adam

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Sagar se lab laga ke bahut khush hai zindgi

साग़र से लब लगा के बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी

सहन-ए-चमन में आके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी

आ जाओ और भी ज़रा नज़दीक जान-ए-मन
तुम को क़रीब पाके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी

होता कोई महल भी तो क्या पूछते हो फिर
बे-वजह मुस्कुरा के बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी

साहिल पे भी तो इतनी शगुफ़ता रविश न थी
तूफ़ाँ के बीच आके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी

वीरान दिल है और ‘अदम’ ज़िन्दगी का रक़्स
जंगल में घर बनाके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी

Abdul hameed Adam

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