Chashmein jahan se halate asli nahi chhupti

चश्मे जहाँ से हालते असली नहीं छुपती

अख्बार में जो चाहिए वह छाप दीजिए

दावा बहुत बड़ा है रियाजी मे आपको 
तूले शबे फिराक को तो नाप दीजिए 

सुनते नहीं हैं शेख नई रोशनी की बात 
इंजन कि उनके कान में अब भाप दीजिए 

जिस बुत के दर पे गौर से अकबर ने कह दिया 
जार ही मैं देने लाया हूँ जान आप दीजिए

Akbar Allahbadi

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Tajjub se kehne lage babu saheb

तअज्जुब से कहने लगे बाबू साहब

गौरमेन्ट सैयद पे क्यों मेहरबाँ है

उसे क्यों हुई इस क़दर कामियाबी
कि हर बज़्म में बस यही दास्ताँ है

कभी लाट साहब हैं मेहमान उसके
कभी लाट साहब का वह मेहमाँ है

नहीं है हमारे बराबर वह हरगिज़
दिया हमने हर सीग़े का इम्तहाँ है

वह अंग्रेज़ी से कुछ भी वाक़िफ़ नहीं है
यहाँ जितनी इंगलिश है सब बरज़बाँ हैं

कहा हँस के ‘अकबर’ ने ऎ बाबू साहब
सुनो मुझसे जो रम्ज़ उसमें निहाँ हैं

नहीं है तुम्हें कुछ भी सैयद से निस्बत
तुम अंग्रेज़ीदाँ हो वह अंग्रेज़दाँ है

Akbar Allahbadi

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Hasti ke shazar mein jo yeh chaho ki chamak jao

हस्ती के शज़र में जो यह चाहो कि चमक जाओ 

कच्चे न रहो बल्कि किसी रंग मे पक जाओ 

मैंने कहा कायल मै तसव्वुफ का नहीं हूँ 
कहने लगे इस बज़्म मे जाओ तो थिरक जाओ 

मैंने कहा कुछ खौफ कलेक्टर का नहीं है 
कहने लगे आ जाएँ अभी वह तो दुबक जाओ

मैंने कहा वर्जिश कि कोई हद भी है आखिर 
कहने लगे बस इसकी यही हद कि थक जाओ 

मैंने कहा अफ्कार से पीछा नहीं छूटता 
कहने लगे तुम जानिबे मयखाना लपक जाओ 

मैंने कहा अकबर मे कोई रंग नहीं है 
कहने लगे शेर उसके जो सुन लो तो फडक जाओ


Akbar Allahbadi

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Baithai jayengi parde mein bibiyan kab tak

बिठाई जाएंगी परदे में बीबियाँ कब तक

बने रहोगे तुम इस मुल्क में मियाँ कब तक

हरम-सरा की हिफ़ाज़त को तेग़ ही न रही
तो काम देंगी यह चिलमन की तितलियाँ कब तक

मियाँ से बीबी हैं, परदा है उनको फ़र्ज़ मगर
मियाँ का इल्म ही उट्ठा तो फिर मियाँ कब तक

तबीयतों का नमू है हवाए-मग़रिब में
यह ग़ैरतें, यह हरारत, यह गर्मियाँ कब तक

अवाम बांध ले दोहर को थर्ड-वो-इंटर में
सिकण्ड-ओ-फ़र्स्ट की हों बन्द खिड़कियाँ कब तक

जो मुँह दिखाई की रस्मों पे है मुसिर इब्लीस
छुपेंगी हज़रते हव्वा की बेटियाँ कब तक

जनाबे हज़रते ‘अकबर’ हैं हामिए-पर्दा
मगर वह कब तक और उनकी रुबाइयाँ कब तक

Akbar Allahbadi

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Hind mein to mazhabi halat hai ab nagufta beh

हिन्द में तो मज़हबी हालत है अब नागुफ़्ता बेह

मौलवी की मौलवी से रूबकारी हो गई

एक डिनर में खा गया इतना कि तन से निकली जान
ख़िदमते-क़ौमी में बारे जाँनिसारी हो गई

अपने सैलाने-तबीयत पर जो की मैंने नज़र
आप ही अपनी मुझे बेएतबारी हो गई

नज्द में भी मग़रिबी तालीम जारी हो गई
लैला-ओ-मजनूँ में आख़िर फ़ौजदारी हो गई


Akbar Allahbadi

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Aapse behad muhabbat hai mujhe

आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे

आप क्यों चुप हैं ये हैरत है मुझे

शायरी मेरे लिए आसाँ नहीं
झूठ से वल्लाह नफ़रत है मुझे

रोज़े-रिन्दी है नसीबे-दीगराँ
शायरी की सिर्फ़ क़ूवत है मुझे

नग़मये-योरप से मैं वाक़िफ़ नहीं
देस ही की याद है बस गत मुझे

दे दिया मैंने बिलाशर्त उन को दिल
मिल रहेगी कुछ न कुछ क़ीमत मुझे


Akbar Allahbadi


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Jaan hi lene ki hikmat mein tarrakki dekhi

जान ही लेने की हिकमत में तरक़्क़ी देखी

मौत का रोकने वाला कोई पैदा न हुआ

उसकी बेटी ने उठा रक्खी है दुनिया सर पर
ख़ैरियत गुज़री कि अंगूर के बेटा न हुआ

ज़ब्त से काम लिया दिल ने तो क्या फ़ख़्र करूँ
इसमें क्या इश्क की इज़्ज़त थी कि रुसवा न हुआ

मुझको हैरत है यह किस पेच में आया ज़ाहिद
दामे-हस्ती में फँसा, जुल्फ़ का सौदा न हुआ 

Akbar Allahbadi

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Dam labon par tha dilezaar ke ghabrane se

दम लबों पर था दिलेज़ार के घबराने से

आ गई है जाँ में जाँ आपके आ जाने से

तेरा कूचा न छूटेगा तेरे दीवाने से
उस को काबे से न मतलब है न बुतख़ाने से

शेख़ नाफ़ह्म हैं करते जो नहीं क़द्र उसकी
दिल फ़रिश्तों के मिले हैं तेरे दीवानों से

मैं जो कहता हूँ कि मरता हूँ तो फ़रमाते हैं
कारे-दुनिया न रुकेगा तेरे मर जाने से

कौन हमदर्द किसी का है जहाँ में ‘अक़बर’
इक उभरता है यहाँ एक के मिट जाने से

Akbar Allahbadi

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Shakl jab bas gai aankhon mein to chhupna kaisa

शक्ल जब बस गई आँखों में तो छुपना कैसा

दिल में घर करके मेरी जान ये परदा कैसा

आप मौजूद हैं हाज़िर है ये सामान-ए-निशात 
उज़्र सब तै हैं बस अब वादा-ए-फ़रदा कैसा 

तेरी आँखों की जो तारीफ़ सुनी है मुझसे 
घूरती है मुझे ये नर्गिस-ए-शेहला कैसा 

ऐ मसीहा यूँ ही करते हैं मरीज़ों का इलाज 
कुछ न पूछा कि है बीमार हमारा कैसा 

क्या कहा तुमने, कि हम जाते हैं, दिल अपना संभाल 
ये तड़प कर निकल आएगा संभलना कैसा

Akbar Allahbadi

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Kat gayi jhagde mein saari raat wasle yaar ki

कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की

शाम को बोसा लिया था, सुबह तक तक़रार की 

ज़िन्दगी मुमकिन नहीं अब आशिक़-ए-बीमार की
छिद गई हैं बरछियाँ दिल में निगाह-ए-यार की 

हम जो कहते थे न जाना बज़्म में अग़यार  की 
देख लो नीची निगाहें हो गईं सरकार की

ज़हर देता है तो दे, ज़ालिम मगर तसकीन  को 
इसमें कुछ तो चाशनी हो शरब-ए-दीदार की 

बाद मरने के मिली जन्नत ख़ुदा का शुक्र है 
मुझको दफ़नाया रफ़ीक़ों  ने गली में यार की 

लूटते हैं देखने वाले निगाहों से मज़े 
आपका जोबन मिठाई बन गया बाज़ार की 

थूक दो ग़ुस्सा, फिर ऐसा वक़्त आए या न आए 
आओ मिल बैठो के दो-दो बात कर लें प्यार की

हाल-ए-‘अकबर’ देख कर बोले बुरी है दोस्ती
ऐसे रुसवाई, ऐसे रिन्द, ऐसे ख़ुदाई ख़्वार की

Akbar Allahbadi

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