Patthar ki tarah agar chup hu

पत्थर की तरह अगर मैं चुप रहूँ

तो ये न समझ कि मेरी हस्ती
बेग़ान-ए-शोल-ए-वफ़ा है
तहक़ीर से यूँ न देख मुझको
ऐ संगतराश
 तेरा तेशा
मुम्किन है कि ज़र्बे-अव्वली से
पहचान सके कि मेरे दिल में
जो आग तेरे लिए दबी है
वो आग ही मेरी ज़िंदगी है


Ahmed Faraz

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Maine is tour se chaha tujhe aksar jana

मैने इस तौर से चाहा तुझे अक्सर जाना

जैसे महताब को बे -अंत समंदर चाहे
जैसे सूरज की किरण सीप के दिल में उतरे
जैसे खुशबू को हवा , रंग से हट कर चाहे
जैसे पत्थर के कलेजे से किरण फूटती है
जैसे गुंचे खुले मौसम से हिना मांगते हैं 
जैसे ख्वाबों में खयालों की कमान टूटती है
जैसे बारिश की दुआ आबला -पा मांगते हैं
मेरा हर ख्वाब मेरे सच की गवाही देगा
वुस ’अत -ए -दीद ने तुझ से तेरी ख्वाहिश की है
मेरी सोचों में कभी देख सरापा अपना !
मैंने दुनिया से अलग तेरी परस्तीश की है
 
ख्वाहिश -ए -दीद का मौसम कभी धुंधला जो हुआ 
नोच डाली हैं जमाने की नकाबें मैंने 
तेरी पलकों पे उतरती हुई सुबहों के लिए
तोड़ डाली हैं सितारों की तनाबें मैंने
मैने चाहा कि तेरे हुस्न कि गुलनार फिजा
मेरी ग़ज़लों की कतारों से महकती जाए
मैंने चाहा कि मेरे फ़न के गुलिस्ताँ की बहार
तेरी आँखों के गुलाबों से महकती जाए
तय तो ये था के सजते रहे लफ्जों के कंवल 
मेरे खामोश ख़यालों में तकल्लुम तेरा
रक्स करता रहे , भरता रहे , खुशबू का खुमार 
मेरी ख्वाहिश के जज़ीरों में तकल्लुम तेरा
तू मगर अजनबी माहौल की पर्वर्दा किरन
मेरी बुझती हुई रातों को सहर कर न सकी
तेरी साँसों में मसीहाई तो थी लेकिन 
तू भी चारा-ए-जख्म-ए-ग़म-ए-दीदा-ए-तर , कर न सकी.
 
तुझ को मालूम ही कब है कि किसी दर्द का दाग
आँख से दिल में उतर जाए तो क्या होता है ???
तू कि सीमाब तबीयत है तुझे क्या मालूम
मौसम -ए -हिज्र ठहर जाए तो क्या होता है ???
तू ने उस मोड पे तोड़ा है त ’अल्लुक कि जहां
देख सकता नहीं कोई भी पलट कर जानां 
अब यह आलम है कि आँखें जो खुलेंगी अपनी
याद आएगा तेरी दीद का मंज़र जानां 
मुझ से मांगेगा तेरे एहद -ए -मोहब्बत का हिसाब
तेरे हिज़्रा का दहकता हुआ महशर जानां
यूं मेरे दिल के बराबर तेरा गम आया है
जैसे शीशे के मुक़ाबिल कोई पत्थर जानां  !!!
जैसे महताब को बे -अंत समंदर चाहे
मैंने इस तौर से चाहा तुझे अक्सर जानां

Mohsin naqvi

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Baadal barsen

बादल बरसें 

बादल इतनी ज़ोर से बरसें

मेरे शहर की बंजर धरती 
गुम सुम खाक उड़ाते रस्ते 
सुखाए चेहरे पीली अंखियन 
बोसीदा मटियाले पैकर ऐसी बहकें 
अपने को पहचान न पाएँ

बिजली चमके !
बिजली इतनी ज़ोर की चमके!
मेरे शहर की सूनी गलियाँ 
मुद्दत्त के तारीक झरोखे 
पुर’इसरार खंडहर वीराने
माज़ी की मद्धम तस्वीरें ऐसी चमकें
सीने का हर भेद ऊगल दें!

दिल भी धड़के 
दिल भी इतनी ज़ोर से धड़के!
सोचों की मजबूत तनाबे 
ख्वाहिश की अनदेखी गिरहें 
रिश्तों की बोझल ज़ंजीरें एक छंके से खुल जाएँ …
सराय रिश्ते 
सारे बंधन 
चाहूँ भी तो याद ना आएँ 
आखें अपनी दीद को तरसें 

बादल इतने ज़ोर से बरसें

Mohsin naqvi

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Kabhi yaad aao to is tarah

कभी याद आओ तो इस तरह 

कि लहू की सारी तमाज़तें 
तुम्हे धूप धूप समेट लें 
तुम्हे रंग रंग निखार दें 
तुम्हे हर्फ़ हर्फ में सोच लें 
तुम्हे देखने का जो शौक हो 
तू दयार -ए -हिज्र की तीरगी 
कोह मिचगां से नोच लें!
कभी याद आओ तो इस तरह 
कि दिल -ओ -नज़र में उतर सको 
कभी हद से हब्स -ए -जुनू बढ़े 
तो हवास बन के बिखर सको 
कभी खुल सको शब -ए -वस्ल में 
कभी खून -ए -दिल में सँवर सको 
सर -ए -रहगुज़र जो मिलो कभी 
न ठहर सको न गुज़र सको!
मेरा दर्द फिर से ग़ज़ल बुने 
कभी गुनगुनाओ तो इस तरह 
मेरे जख्म फिर से गुलाब हों 
कभी मुस्कुराओ तो इस तरह 
मेरी धड़कनें भी लरज़ उठें 
कभी चोट खाओ तो इस तरह 
जो नहीं तू फिर बड़े शौक से 
सभी राब्ते सभी जाब्ते 
कभी धूप छांव में तोड़ दो 
न शिकस्त -ए -दिल का सितम सहो 
न सुनो किसी का अज़ाब -ए -जाँ 
न किसी से अपनी ख़लिश कहो 
यूंही खुश फिरो यूंही खुश रहो’
न ऊजड़ सकें न सँवर सकें 
कभी दिल दुखाओ तो इस तरह 
न सिमट सकें न बिखर सकें 
कभी भूल जाओ तो इस तरह 
किसी तौर जाँ से गुज़र सकें 
कभी याद आओ तो इस तरह

Mohsin naqvi

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Maine dil se kaha

मैनें दिल से कहा 

ऐ दीवाने बता 
जब से कोई मिला 
तू है खोया हुआ 
ये कहानी है क्या 
है ये क्या सिलसिला 
ऐ दीवाने बता 

मैनें दिल से कहा 
ऐ दीवाने बता 
धड़कनों में छुपी 
कैसी आवाज़ है 
कैसा ये गीत है 
कैसा ये साज़ है 
कैसी ये बात है 
कैसा ये राज़ है 
ऐ दीवाने बता 

मेरे दिल ने कहा 
जब से कोई मिला 
चाँद तारे फ़िज़ा 
फूल भौंरे हवा 
ये हसीं वादियाँ 
नीला ये आसमाँ 
सब है जैसे नया 
मेरे दिल ने कहा 

Javed akhtar

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Kabhi yoon bhi to ho

कभी यूँ भी तो हो 

दरिया का साहिल हो 
पूरे चाँद की रात हो 
और तुम आओ 

कभी यूँ भी तो हो 
परियों की महफ़िल हो 
कोई तुम्हारी बात हो 
और तुम आओ 

कभी यूँ भी तो हो 
ये नर्म मुलायम ठंडी हवायें 
जब घर से तुम्हारे गुज़रें 
तुम्हारी ख़ुश्बू चुरायें 
मेरे घर ले आयें 

कभी यूँ भी तो हो 
सूनी हर मंज़िल हो 
कोई न मेरे साथ हो 
और तुम आओ 

कभी यूँ भी तो हो 
ये बादल ऐसा टूट के बरसे 
मेरे दिल की तरह मिलने को 
तुम्हारा दिल भी तरसे 
तुम निकलो घर से 

कभी यूँ भी तो हो 
तनहाई हो, दिल हो 
बूँदें हो, बरसात हो 
और तुम आओ 

कभी यूँ भी तो हो

Javed akhtar

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Ahsaas

मैं कोई शे’र न भूले से कहूँगा तुझ पर 
फ़ायदा क्या जो मुकम्मल तेरी तहसीन न हो 
कैसे अल्फ़ाज़ के साँचे में ढलेगा ये जमाल 
सोचता हूँ के तेरे हुस्न की तोहीन न हो 

हर मुसव्विर ने तेरा नक़्श बनाया लेकिन 
कोई भी नक़्श तेरा अक्से-बदन बन न सका 
लब-ओ-रुख़्सार में क्या क्या न हसीं रंग भरे 
पर बनाए हुए फूलों से चमन बन न सका

हर सनम साज़ ने मर-मर से तराशा तुझको
पर ये पिघली हुई रफ़्तार कहाँ से लाता
तेरे पैरों में तो पाज़ेब पहना दी लेकिन 
तेरी पाज़ेब की झनकार कहाँ से लाता

शाइरों ने तुझे तमसील में लाना चाहा 
एक भी शे’र न मोज़ूँ तेरी तस्वीर बना
तेरी जैसी कोई शै हो तो कोई बात बने
ज़ुल्फ़ का ज़िक्र भी अल्फ़ाज़ की ज़ंजीर बना 

तुझको को कोई परे-परवाज़ नहीं छू सकता
किसी तख़्यील में ये जान कहाँ से आए
एक हलकी सी झलक तेरी मुक़य्यद करले 
कोई भी फ़न हो ये इमकान कहाँ से आए 

तेर शायाँ कोईपेरायाए-इज़हार नहीं 
सिर्फ़ वजदान में इक रंग सा भर सकती है 
मैंने सोचा है तो महसूस किया है इतना
तू निगाहों से फ़क़त दिल में उतर सकती है

Jaan nissar akhtar

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Indhan

छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर – कान बनाकर
नाक सजाकर –
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला –
तेरा उपला –
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे

हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था –
इक मुन्ना था –
इक दशरथ था
बरसों बाद – मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया !

Gulzar

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Bas ek lamhe ka jhagda tha

बस एक लम्हे का झगड़ा था
दर-ओ-दीवार पे ऐसे छनाके से गिरी आवाज़
जैसे काँच गिरता है
हर एक शय में गई
उड़ती हुई, चलती हुई, किरचें
नज़र में, बात में, लहजे में,
सोच और साँस के अन्दर
लहू होना था इक रिश्ते का
सो वो हो गया उस दिन
उसी आवाज़ के टुकड़े उठा के फर्श से उस शब
किसी ने काट ली नब्जें
न की आवाज़ तक कुछ भी
कि कोई जाग न जाए
बस एक लम्हे का झगड़ा था

Gulzar

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Kitaaben jhankti hai

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से 
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके 
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं
कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़
जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते
जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का
अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे!!

Gulzar

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