Akl ne ek din ye dil se kaha

अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा

भूले-भटके की रहनुमा हूँ मैं

दिल ने सुनकर कहा-ये सब सच है
पर मुझे भी तो देख क्या हूँ मैं

राज़े-हस्ती को तू समझती है
और आँखों से देखता हूँ मैं

Allama iqbal

Posted by | View Post | View Group

Ek Aarjoo

दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रब

क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
शोरिश से भागता हूँ दिल ढूँढता है मेरा
ऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा हो
मरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरी
दामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा हो
आज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँ
दुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया हो
लज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों में
चश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा हो
गुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी का
साग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा हो
हो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौना
शरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा हो
मानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुल
नन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा हो
सफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे हों
नद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा हो
हो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारा
पानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता हो
आग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ा
फिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा हो
पानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनी
जैसे हसीन कोई आईना देखता हो
मेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन को
सुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा हो
रातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दम
उम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया हो
बिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा दे
जब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ हो
पिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िन
मैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा हो
कानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँ
रौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा हो
फूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू कराने
रोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ हो
इस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नाले
तारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा हो
हर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला दे
बेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे

Allama iqbal

Posted by | View Post | View Group

Baad muddat unhe dekh kar yoon laga

बाद मुद्दत उन्हें देख कर यूँ लगा

जैसे बेताब दिल को क़रार आ गया

आरज़ू के गुल मुस्कुराने लगे
जैसे गुलशन में बहार आ गया

तिश्न नज़रें मिली शोख नज़रों से जब
मैं बरसने लगी जाम भरने लगे

साक़िया आज तेरी ज़रूरत नहीं
बिन पिये बिन पिलाये खुमार आ गया

रात सोने लगी सुबह होने लगी
शम्म बुझने लगी दिल मचलने लगे

वक़्त की रोश्नी में नहायी हुई
ज़िन्दगी पे अजब स निखार आ गया

Ali sardar zafri

Posted by | View Post | View Group

Ham bhi sharaabi tum bhi sharaabi

हम भी शराबी, तुम भी शराबी

छलके गुलाबी, छलके गुलाबी
तक़्दीर दिल कि ख़ाना ख़राबी
जब तक है जीना खुश हो के जी लें
जब तक है पीना जी भर के पी लें
हरत न कोइ रह जाये बाक़ी
कल सुबह के दामन में, तुम होगे न हुम होंगे
बस रेत के सीने पर कुछ नक्श क़दम होंगे
बस रात भर के मेहमान हम हैं
ज़ुल्फ़ों में शब के थोडे से कम हैं
बाक़ी रहेगा सागर न साक़ी

Ali sardar zafri

Posted by | View Post | View Group

Aao ki jashn-e-muhabbat manayen ham

आवो कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत मनायेँ हम

आती नहीं कहीं से दिल-ए-ज़िन्दा की सदा
सूने पड़े हैं कूचा-ओ-बाज़ार इश्क़ के
है शम-ए-अन्जुमन का नया हुस्न-ए-जाँ गुदाज़
शायद नहीं रहे वो पतंगों के वलवले
ताज़ा न रख सकेगी रिवायात-ए-दश्त-ओ-दर
वो फ़ित्नासर गये जिन्हें काँटें अज़ीज़ थे
अब कुछ नहीं तो नींद से आँखें जलायेँ हम
आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत मनायेँ हम
सोचा न था कि आयेगा ये दिन भी फिर कभी
इक बार हम मिले हैं ज़रा मुस्कुरा तो लें
क्या जाने अब न उल्फ़त-ए-देरीना याद आये
इस हुस्न-ए-इख़्तियार पे आँखें झुका तो लें
बरसा लबों से फूल तेरी उम्र हो दराज़
सँभले हुए तो हैं पर ज़रा डगमगा तो लें

Ali sardar zafri

Posted by | View Post | View Group

Tum se berangi-e-hasti ka gila karna tha

तुम से बेरंगी-ए-हस्ती का गिला करना था

दिल पे अंबार है ख़ूँगश्ता तमन्नाओं का
आज टूटे हुए तारों का ख़याल आया है
एक मेला है परेशान सी उम्मीदों का
चन्द पज़मुर्दा बहारों का ख़याल आया है
पाँव थक थक के रह जाते हैं मायूसी में
पुरमहन राहगुज़ारों का ख़याल आया है
साक़ी-ओ-बादा नहीं जाम-ओ-लब-ए-जू भी नहीं
तुम से कहना था कि अब आँख में आँसू भी नहीं

Ali sardar zafri

Posted by | View Post | View Group

Lamhon ke chiraag

वो नी‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍द की तरह नर्म सब्ज़ा

खवाबों की तरह रामिन्दा शबनम‌
फूलों की तरह शगुफ्ता चेहरे
खुशबू की तरह लतीफ़ बातें
किरनों की तरह जवाँ तबस्सुम‌
शोले की तरह दहकती काविशें‍‍‍‍‍
तारों की तरह चमकती आगोश
सागर की तरह छलकते सीने
सब काफिला‍ ऐ अदम के राही‌
वादी ऐ अदम में चल रहे हैं
तारीकियों कॆ खिले हैं परचम‌
लम्हों के चराग जल रहे हैं
हर लम्हा हसीन और जवाँ है
हर लम्हा फरोग ऐ जिस्मों जाँ है
हर लम्हा अज़ीमो जावीदान् है

Ali sardar zafri

Posted by | View Post | View Group

Fir wahi maange huye lamhe

फिर वही माँगे हुए लम्हे, फिर वही जाम-ए-शराब

फिर वही तारीक रातों में ख़याल-ए-माहताब
फिर वही तारों की पेशानी पे रंग-ए-लाज़वाल
फिर वही भूली हुई बातों का धुंधला सा ख़याल
फिर वो आँखें भीगी भीगी दामन-ए-शब में उदास
फिर वो उम्मीदों के मदफ़न ज़िन्दगी के आस-पास
फिर वही फ़र्दा की बातें फिर वही मीठे सराब
फिर वही बेदार आँखें फिर वही बेदार ख़्वाब
फिर वही वारफ़्तगी तनहाई अफ़सानों का खेल
फिर वही रुख़्सार वो आग़ोश वो ज़ुल्फ़-ए-सियाह
फिर वही शहर-ए-तमन्ना फिर वही तारीक राह
ज़िन्दगी की बेबसी उफ़्फ़ वक़्त के तारीक जाल
दर्द भी छिनने लगा उम्मीद भी छिनने लगी
मुझ से मेरी आरज़ू-ए-दीद भी छिनने लगी
फिर वही तारीक माज़ी फिर वही बेकैफ़ हाल
फिर वही बेसोज़ लम्हें फिर वही जाम-ए-शराब
फिर वही तारीक रातों में ख़याल-ए-माहताब

Ali sardar zafri

Posted by | View Post | View Group

Patthar ki tarah agar chup hu

पत्थर की तरह अगर मैं चुप रहूँ

तो ये न समझ कि मेरी हस्ती
बेग़ान-ए-शोल-ए-वफ़ा है
तहक़ीर से यूँ न देख मुझको
ऐ संगतराश
 तेरा तेशा
मुम्किन है कि ज़र्बे-अव्वली से
पहचान सके कि मेरे दिल में
जो आग तेरे लिए दबी है
वो आग ही मेरी ज़िंदगी है


Ahmed Faraz

Posted by | View Post | View Group

Maine is tour se chaha tujhe aksar jana

मैने इस तौर से चाहा तुझे अक्सर जाना

जैसे महताब को बे -अंत समंदर चाहे
जैसे सूरज की किरण सीप के दिल में उतरे
जैसे खुशबू को हवा , रंग से हट कर चाहे
जैसे पत्थर के कलेजे से किरण फूटती है
जैसे गुंचे खुले मौसम से हिना मांगते हैं 
जैसे ख्वाबों में खयालों की कमान टूटती है
जैसे बारिश की दुआ आबला -पा मांगते हैं
मेरा हर ख्वाब मेरे सच की गवाही देगा
वुस ’अत -ए -दीद ने तुझ से तेरी ख्वाहिश की है
मेरी सोचों में कभी देख सरापा अपना !
मैंने दुनिया से अलग तेरी परस्तीश की है
 
ख्वाहिश -ए -दीद का मौसम कभी धुंधला जो हुआ 
नोच डाली हैं जमाने की नकाबें मैंने 
तेरी पलकों पे उतरती हुई सुबहों के लिए
तोड़ डाली हैं सितारों की तनाबें मैंने
मैने चाहा कि तेरे हुस्न कि गुलनार फिजा
मेरी ग़ज़लों की कतारों से महकती जाए
मैंने चाहा कि मेरे फ़न के गुलिस्ताँ की बहार
तेरी आँखों के गुलाबों से महकती जाए
तय तो ये था के सजते रहे लफ्जों के कंवल 
मेरे खामोश ख़यालों में तकल्लुम तेरा
रक्स करता रहे , भरता रहे , खुशबू का खुमार 
मेरी ख्वाहिश के जज़ीरों में तकल्लुम तेरा
तू मगर अजनबी माहौल की पर्वर्दा किरन
मेरी बुझती हुई रातों को सहर कर न सकी
तेरी साँसों में मसीहाई तो थी लेकिन 
तू भी चारा-ए-जख्म-ए-ग़म-ए-दीदा-ए-तर , कर न सकी.
 
तुझ को मालूम ही कब है कि किसी दर्द का दाग
आँख से दिल में उतर जाए तो क्या होता है ???
तू कि सीमाब तबीयत है तुझे क्या मालूम
मौसम -ए -हिज्र ठहर जाए तो क्या होता है ???
तू ने उस मोड पे तोड़ा है त ’अल्लुक कि जहां
देख सकता नहीं कोई भी पलट कर जानां 
अब यह आलम है कि आँखें जो खुलेंगी अपनी
याद आएगा तेरी दीद का मंज़र जानां 
मुझ से मांगेगा तेरे एहद -ए -मोहब्बत का हिसाब
तेरे हिज़्रा का दहकता हुआ महशर जानां
यूं मेरे दिल के बराबर तेरा गम आया है
जैसे शीशे के मुक़ाबिल कोई पत्थर जानां  !!!
जैसे महताब को बे -अंत समंदर चाहे
मैंने इस तौर से चाहा तुझे अक्सर जानां

Mohsin naqvi

Posted by | View Post | View Group