Aata hai yaad mujhko gujra hua zamana

आता है याद मुझको गुज़रा हुआ ज़माना
वो बाग़ की बहारें, वो सब का चह-चहाना

आज़ादियाँ कहाँ वो, अब अपने घोसले की
अपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जाना

लगती हो चोट दिल पर, आता है याद जिस दम
शबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुराना

वो प्यारी-प्यारी सूरत, वो कामिनी-सी मूरत
आबाद जिस के दम से था मेरा आशियाना

Allama iqbal

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Pareshaan  hoke meri khaaq aakhir dil na ban jaaye

परीशाँ होके मेरी खाक आखिर दिल न बन जाये

जो मुश्किल अब हे या रब फिर वही मुश्किल न बन जाये

न करदें मुझको मज़बूरे नवा फिरदौस में हूरें
मेरा सोज़े दरूं फिर गर्मीए महेफिल न बन जाये

कभी छोडी हूई मज़िलभी याद आती है राही को
खटक सी है जो सीने में गमें मंज़िल न बन जाये

कहीं इस आलमें बे रंगो बूमें भी तलब मेरी
वही अफसाना दुन्याए महमिल न बन जाये

अरूज़े आदमे खाकी से अनजुम सहमे जातें है
कि ये टूटा हुआ तारा महे कामिल न बन जा

Allama iqbal

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Sakhiyan karta hoon dil par

सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं

हाय क्या अच्छी कही ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं

है मेरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील
जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं

बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो
तू तो इक तस्वीर है महफ़िल की और महफ़िल हूँ मैं

ढूँढता फिरता हूँ ऐ “इक़बाल” अपने आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं

Allama iqbal

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Agar kaz-row hai anjum

अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा

मुझे फ़िक्र-ए-जहाँ क्यूँ हो जहाँ तेरा है या मेरा

अगर हँगामा-हा-ए-शौक़ से है ला-मकाँ ख़ाली
ख़ता किस की है या रब ला-मकाँ तेरा है या मेरा

उसे सुब्ह-ए-अज़ल इंकार की जुरअत हुई क्यूँकर
मुझे मालूम क्या वो राज़-दाँ तेरा है या मेरा

मोहम्मद भी तेरा जिब्रील भी क़ुरआन भी तेरा
मगर ये हर्फ़-ए-शीरीं तरजुमा तेरा है या मेरा

इसी कौकब की ताबानी से है तेरा जहाँ रौशन
ज़वाल-ए-आदम-ए-ख़ाकी ज़ियाँ तेरा है या मेरा

Allama iqbal

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Asar kare na kare sun to le meri fariyaad

असर करे न करे सुन तो ले मेरी फ़रियाद

नहीं है दाद का तालिब ये बंद-ए-आज़ाद

ये मुश्त-ए-ख़ाक ये सरसर ये वुसअत-ए-अफ़लाक
करम है या के सितम तेरी लज़्ज़त-ए-ईजाद

ठहर सका न हवा-ए-चमन में ख़ेम-ए-गुल
यही है फ़स्ल-ए-बहारी यही है बाद-ए-मुराद

क़ुसूर-वार ग़रीब-उद-दयार हूँ लेकिन
तेरा ख़राबा फ़रिश्ते न कर सके आबाद

मेरी जफ़ा-तलबी को दुआएँ देता है
वो दश्त-ए-सादा वो तेरा जहान-ए-बे-बुनियाद

ख़तर-पसंद तबीअत को साज़-गार नहीं
वो गुलसिताँ के जहाँ घात में न हो सय्याद

मक़ाम-ए-शौक़ तेरे क़ुदसियों के बस का नहीं
उन्हीं का काम है ये जिन के हौसले हैं ज़ियाद

Allama iqbal

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Jis khet se dekhan ko mayassar nahi roti

उट्ठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो

ख़ाक-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दो

गरमाओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं से
कुन्जिश्क-ए-फिरोमाया को शाहीं से लड़ा दो

सुल्तानी-ए-जमहूर का आता है ज़माना
जो नक़्श-ए-कुहन तुम को नज़र आये मिटा दो

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस ख़ेत के हर ख़ोशा-ए-गुन्दम को जला दो

क्यों ख़ालिक़-ओ-मख़लूक़ में हायल रहें पर्दे
पीरान-ए-कलीसा को कलीसा से हटा दो

मैं नाख़ुश-ओ-बेज़ार हूँ मरमर के सिलों से
मेरे लिये मिट्टी का हरम और बना दो

तहज़ीब-ए-नवीं कारगह-ए-शीशागराँ है
आदाब-ए-जुनूँ शायर-ए-मश्रिक़ को सिखा दो

Allama iqbal

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Har muqaam se aage muqaam hai tera

ख़िर्द के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं

तेरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं

हर मुक़ाम से आगे मुक़ाम है तेरा
हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं

रंगों में गर्दिश-ए-ख़ूँ है अगर तो क्या हासिल
हयात सोज़-ए-जिगर के सिवा कुछ और नहीं

उरूस-ए-लाला मुनासिब नहीं है मुझसे हिजाब
कि मैं नसीम-ए-सहर के सिवा कुछ और नहीं

जिसे क़ साद समझते हैं ताजरन-ए-फ़िरन्ग
वो शय मता-ए-हुनर के सिवा कुछ और नहीं

गिराँबहा है तो हिफ़्ज़-ए-ख़ुदी से है वरना
गौहर में आब-ए-गौहर के सिवा कुछ और नहीं


Allama iqbal

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Shaam hoti hai saher hoti hai

शाम होती है सहर होती है ये वक़्त-ए-रवाँ

जो कभी मेरे सर पे संग-गराँ बन के गिरा

राह में आया कभी मेरी हिमाला बन कर
जो कभी उक्दा बना ऐसा कि हल ही न हुआ

अश्क बन कर मेरी आँखों से कभी टपका है
जो कभी ख़ून-ए-जिगर बन के मिज़्श्ग़ाँ पर आया

आज बेवास्ता यूँ गुज़रा चला जाता है
जैसे मैं कशमकश-ए-ज़ीस्त में शामिल ही नहीं

Ali sardar zafri

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Tumhare kehte mein jo gharmi-o-halawat hai

तुम्हारे लहजे में जो गर्मी-ओ-हलावत है

इसे भला सा कोई नाम दो वफ़ा की जगह

गनीम-ए-नूर का हमला कहो अँधेरों पर
दयार-ए-दर्द में आमद कहो मसीहा की

रवाँ-दवाँ हुए ख़ुश्बू के क़ाफ़िले हर सू
ख़ला-ए-सुबह में गूँजी सहर की शहनाई

ये एक कोहरा सा ये धुँध सी जो छाई है
इस इल्तहाब में सुरमगीं उजाले में

सिवा तुम्हारे मुझे कुछ नज़र नहीं आता
हयात नाम है यादों का तल्ख़ और शीरीं

भला किसी ने कभी रग-ओ-बू को पकड़ा है
शफ़क़ को क़ैद में रखा सबा को बन्द किया

हर एक लमहा गुरेज़ाँ है जैसे दुश्मन है
तुम मिलोगी न मैं, हम भी दोनों लम्हे हैं

Ali sardar zafri

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Dayaar-e-gair mein koi jahan na apna ho

दयार-ए-ग़ैर में कोई जहाँ न अपना हो

शदीद कर्ब की घड़ियाँ गुज़ार चुकने पर

कुछ इत्तेफ़ाक़ हो ऐसा कि एक शाम कहीं
किसी एक ऐसी जगह से हो यूँ ही मेरा गुज़र

जहाँ हुजूम-ए-गुरेज़ाँ में तुम नज़र आ जाओ
और एक एक को हैरत से देखता रहे

Ali sardar zafri

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