कुछ ठोकरो के बाद समझ आ गई मुझ मे मै…

कुछ ठोकरो के बाद समझ आ गई मुझ मे
मै अब दिल के मशवरो पे भरोसा नही करता..

लाख शिकायतें हैं मगर कैसे करूँ बयाँ… इधर दिल अपना,…

लाख शिकायतें हैं मगर कैसे करूँ बयाँ…
इधर दिल अपना, उधर तुम अपने…

लोग कहते है कि वक्त हर ज़ख्म को भर देता…

लोग कहते है कि वक्त हर ज़ख्म को भर देता है…
पर किताबों पर धूल जमने से कहानी बदल नहीं जाती

तहजीब सिखा दी मुझे एक छोटे से मकान ने, दरवाजे…

तहजीब सिखा दी मुझे एक छोटे से मकान ने,
दरवाजे पर लिखा था थोडा झुक कर चलिये..

आज आपको मिलवाता हूँ सर्वश्रेष्ठ लेखकों मे से एक Siddharth…

आज आपको मिलवाता हूँ सर्वश्रेष्ठ लेखकों मे से एक Siddharth Priyadarshi से इनकी ये कहानी पढ के अगर आपको ऐसा न लगे कि इस कहानी मे रिक्शे पे बैठा वो शख्स आप ही हैं तो कहियेगा ,पढ़िए फिर कहिये:
एक कहानी यह भी ***
पैंतालिस डिग्री सेल्सियस की झुलसाने वाली गरमी, सिर पर जलता हुआ एक करोड डिग्री सेल्सियस का सूरज, सूखे प्यासे और फटे होंठ, पैरों में टूटी चप्पलें, चौवालीस पैबंद लगी कमीज़ और सिर पर मैला सा अंगौछा !!!
बेचारा गरीब रिक्शेवाला धौंकनी की तरह चलती साँसे थामकर अपने सूखे होठों को जीभ से तर करता है.
–टैगोर टाउन चलोगे ?
–चलेंगे बाबूजी
–िकतना लोगे ?
–चालीस रूपया पड़ेगा बाबूजी
–का बकैती है में ! टैगोर टाउन का चालीस रूपया होता है !
–घाम बहुत है भइया. सगरी देह झुलसाय जाती है.
–अमे रहन देव. एतना भी घाम नही ना. (मैं मन ही मन कुदरत के कहर को कोसता हुआ रिक्शेवाले से जमकर मोल-भाव करने के मूड में हूँ )
–तीस देंगे. ढ़लाने-ढ़लान तो हय पूरे रास्ते
–पैंतीस दै देना भैया
— ना ना..रेट न िबगाड़ो. तीस से ज्यादा न देंगे
रिक्शेवाले ने कातर निगाहों से मुझे देखा. आसपास तीन रिक्शे वाले और खड़े हैं . मतलब कि बैकफुट पर वही है, हमें पूरा इत्मीनान है. इस भयानक दोपहरी में पूरा शहर घरों में बंद है. सवारियाँ तो हैं नहीं. कोई न कोई तो जाएगा ही तीस रूपए में ! #

— ठीक है भैया..चिलए.
मैं विजयी मुस्कान लिए दोस्त की एसी गाड़ी से उतरता हूँ. उतरते ही लगा जैसे पूरे बदन में आग मली जा रही हो. मैं फटाफट आँखों पर काला चश्मा चढ़ाता हूँ जो किसी महंगे स्टोर से २००० रू का खरीदा हुआ था, बिना मोलभाव किए. चेहरे को गीले तौलिए से बाँधता हूँ. पास की दुकान से गला तर करने और लू से बचने के लिए स्प्राइट की आधा लीटर की बोतल खरीदता हूँ.
— कस में, ए पे तो पैंतीस रूपया िलखा है तो चालीस काहे माँग रहे हो ? मैने पूरी ठसक से दुकानदार से शिकायत की..
— बकैती न झाड़ो, कम्पनी हमका ठंडा करै क पइसा नय देत…बर्फ लगावा है, ओका दाम कौन देइगा ? उपर से सप्लाई भी कम है. लेना है तो लो नहीं तो फूटो इहाँ से. दुकानदार ने एक मिनट में मेरी न्यायप्रियता सड़क पर बिखेर दी.#

मौके की नज़ाकत देख मै दुकानदार को चुपचाप चालीस रूपए देता हूँ, अपना दोगलापन वापस अपनी जेब में रखता हूँ, अभिजात्यपन के चश्मे को ठीक कर रिक्शे पर जा बैठता हूँ. आदमी के द्वारा आदमी को खींचे जाने का यह दृश्य मुझे हरगिज आहत नहीं करेगा. रिक्शे वाला कमर उठाकर मुझ पचहत्तर किलो की काया को खींचे जा रहा है. मैं उससे तेज चलने को कहता हूँ. वह पसीने से तर चेहरे को पोंछता फीकी मुस्कान लिए मुझे देखता है. इधर मैं मन ही मन भुनभुना रहा हूँ–किस मरियल को पकड़ लिया. देर करा देगा ये. धूप में झुलस ही जाऊंगा आज तो. बहुत काम है. पहले तो घर जाकर मजदूरों की दुर्दशा पर धाँसू लेख पोस्ट करना है फेसबुक पर. खूब लाईक्स उठाने हैं आज. रिक्शे पर बैठे-बैठे उस लेख की रूप रेखा बनाने की कोशिश करता हूँ– छोड़ो यार, घर जाकर आराम से एसी चलाकर बैठैंगे तब सोचेंगे. मैं शीतल पेय की चार घूँट हलक के नीचे उतारता हूं. पैडल मारने वाले का खून भाप बनकर उड़ रहा है पर मुझे ठंडक मिलती जा रही है…

© Siddharth Priyadarshi
Prisid.blogspot.com

मेरे बारे में अपनी सोच को थोड़ा बदलकर देख मुझसे…

मेरे बारे में अपनी सोच को थोड़ा बदलकर देख
मुझसे भी बुरे हैं लोग तू घर से निकलकर देख

शराफ़त से मुझे नफ़रत है ये जीने नहीं देती,
कि तुझको तोड़ लेंगे लोग तू फूलों सा खिलकर देख

ज़रुरी तो नहीं जो दिख रहा है सच मेँ वैसा हो
ज़मीं को जानना है ग़र तो बारिश में फिसलकर देख

पता लग जाएगा अपने ही सब बदनाम करते हैं
कभी ऊँचाइयोँ पर तू भी अपना नाम लिखकर देख

अगर मैँ कह नहीं पाया तो क्या चाहा नहीं तुझको
मोहब्बत की सनद चाहे तो मेरे घर पे चलकर देख

तुझे ही सब ज़माने में बुरा कहते हैँ क्यों ‘फ़ैसल’
बिखर जाएगा यूँ ना सोच दीवाने संभलकर देख ।

– सिराज फ़ैसल ख़ान

आपको इश्क के इज़हार से डर लगता है और हमें…

आपको इश्क के इज़हार से डर लगता है
और हमें आपके इनकार से डर लगता है

मेरे मासूम से बच्चे की आँख में आँसू
ऐ ग़रीबी हमें त्यौहार से डर लगता है

माँ मुझे अपने ही आँचल में छुपाये रखना
ढाल को कब किसी तलवार से डर लगता है

ये ही लूटेगा हमें जाके किसी कोने में
हमको इस काफ़िला सालार से डर लगता है

अब ग़ज़ल में किसी मुफलिस की कहानी कहिये
आँख से, ज़ुल्फ़ से, रुखसार से डर लगता है

ऐ सफीने तेरा अब कौन मुहाफ़िज़ होगा
जब तुझे अपनी ही पतवार से डर लगता है

खुद बना देते हैं नेता इन्हें हम लोग यहाँ
और कहते हैं कि सरकार से डर लगता है

मै नहीं डरता ‘मनु’ अपने किसी दुश्मन से
बस मुझे अपने किसी यार से डर लगता है

#मनु_भारद्वाज

ऐसा नहीं है कि अब तेरी जुस्तजू नहीं रही, बस…

ऐसा नहीं है कि अब तेरी जुस्तजू नहीं रही,
बस टूट-टूट कर बिखरने की हिम्मत नहीं रही

यूं न पढ़िए कहीं कहीं से हमें, हम इंसान हैं,…

यूं न पढ़िए कहीं कहीं से हमें,
हम इंसान हैं, कोई किताब नही..!!

हक़ीक़त रूबरू हो तो अदाकारी नही चलती, ख़ुदा के सामने…

हक़ीक़त रूबरू हो तो अदाकारी नही चलती,
ख़ुदा के सामने बन्दों की मक्कारी नही चलती…
तुम्हारा दबदबा ख़ाली तुम्हारी ज़िंदगी तक है,
किसी की क़ब्र के अन्दर ज़मींदारी नही चलती..!