ज़िंदगी शायद इसी का नाम है…. दूरियाँ…मजबूरियाँ…तन्हाइयाँ….!!

ज़िंदगी शायद इसी का नाम है….
दूरियाँ…मजबूरियाँ…तन्हाइयाँ….!!

Beautiful poem लेती नहीं दवाई “माँ”, जोड़े पाई-पाई “माँ”। दुःख…

Beautiful poem

लेती नहीं दवाई “माँ”,
जोड़े पाई-पाई “माँ”।

दुःख थे पर्वत, राई “माँ”,
हारी नहीं लड़ाई “माँ”।

इस दुनियां में सब मैले हैं,
किस दुनियां से आई “माँ”।

दुनिया के सब रिश्ते ठंडे,
गरमागर्म रजाई “माँ” ।

जब भी कोई रिश्ता उधड़े,
करती है तुरपाई “माँ” ।

बाबू जी तनख़ा लाये बस,
लेकिन बरक़त लाई “माँ”।

बाबूजी थे सख्त मगर ,
माखन और मलाई “माँ”।

बाबूजी के पाँव दबा कर
सब तीरथ हो आई “माँ”।

नाम सभी हैं गुड़ से मीठे,
मां जी, मैया, माई, “माँ” ।

सभी साड़ियाँ छीज गई थीं,
मगर नहीं कह पाई “माँ” ।

घर में चूल्हे मत बाँटो रे,
देती रही दुहाई “माँ”।

बाबूजी बीमार पड़े जब,
साथ-साथ मुरझाई “माँ” ।

रोती है लेकिन छुप-छुप कर,
बड़े सब्र की जाई “माँ”।

लड़ते-लड़ते, सहते-सहते,
रह गई एक तिहाई “माँ” ।

बेटी रहे ससुराल में खुश,
सब ज़ेवर दे आई “माँ”।

“माँ” से घर, घर लगता है,
घर में घुली, समाई “माँ” ।

बेटे की कुर्सी है ऊँची,
पर उसकी ऊँचाई “माँ” ।

दर्द बड़ा हो या छोटा हो,
याद हमेशा आई “माँ”।

घर के शगुन सभी “माँ” से,
है घर की शहनाई “माँ”।

सभी पराये हो जाते हैं,
होती नहीं पराई “माँ” ।…..
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

दूरियाँ हुई तो उनके और करीब हुए हम ये कैसे…

दूरियाँ हुई तो उनके और करीब हुए हम
ये कैसे फ़ासले थे जो बढ़ने से हुए कम

…….माँ बहुत झूठ बोलती है……. सुबह जल्दी जगाने को, सात…

…….माँ बहुत झूठ बोलती है…….

सुबह जल्दी जगाने को,
सात बजे को आठ कहती है।
नहा लो, नहा लो, के घर में नारे बुलंद करती है।
मेरी खराब तबियत का दोष बुरी नज़र पर मढ़ती है।
छोटी छोटी परेशानियों पर बड़ा बवंडर करती है।

……माँ बहुत झूठ बोलती है……

थाल भर खिलाकर,

तेरी भूख मर गयी कहती है।

जो मैं न रहूँ घर पे तो,

मेरी पसंद की कोई चीज़ रसोई में उससे नहीं पकती है।

मेरे मोटापे को भी,

कमजोरी की सूजन बोलती है।

……माँ बहुत झूठ बोलती है……

दो ही रोटी रखी है रास्ते के लिए, बोल कर,

मेरे साथ दस लोगों का खाना रख देती है।

कुछ नहीं-कुछ नहीं बोल,

नजर बचा बैग में,

छिपी शीशी अचार की बाद में निकलती है।

……माँ बहुत झूठ बोलती है……

टोका टाकी से जो मैं झुँझला जाऊँ कभी तो,

समझदार हो, अब न कुछ बोलूँगी मैं,

ऐंसा अक्सर बोलकर वो रूठती है।

अगले ही पल फिर चिंता में हिदायती हो जाती है।

……माँ बहुत झूठ बोलती है……

तीन घंटे मैं थियटर में ना बैठ पाऊँगी,

सारी फ़िल्में तो टी वी पे आ जाती हैं,

बाहर का तेल मसाला तबियत खराब करता है,

बहानों से अपने पर होने वाले खर्च टालती है।

……माँ बहुत झूठ बोलती है……

मेरी उपलब्धियों को बढ़ा चढ़ा कर बताती है।

सारी खामियों को सब से छिपा लिया करती है।

उसके व्रत, नारियल, धागे, फेरे, सब मेरे नाम,

तारीफ़ ज़माने में कर बहुत शर्मिंदा करती है।

……माँ बहुत झूठ बोलती है……

भूल भी जाऊँ दुनिया भर के कामों में उलझ,

उसकी दुनिया में वो मुझे कब भूलती है।

मुझ सा सुंदर उसे दुनिया में ना कोई दिखे,

मेरी चिंता में अपने सुख भी किनारे कर देती है।

……माँ बहुत झूठ बोलती है……

उसके फैलाए सामानों में से जो एक उठा लूँ

खुश होती जैसे, खुद पर उपकार समझती है।

मेरी छोटी सी नाकामयाबी पे उदास होकर,

सोच सोच अपनी तबियत खराब करती है।
……माँ बहुत झूठ बोलती है……

🙏हर माँ को समर्पित🙏
#MothersDay

मुझे कढ़े हुए तकिये की क्या ज़रूरत है किसी का…

मुझे कढ़े हुए तकिये की क्या ज़रूरत है
किसी का हाथ अभी मेरे सर के नीचे है

#मुनव्वर_राणा #MothersDay

बुज़ुर्गों का मेरे दिल से अभी तक डर नहीं जाता…

बुज़ुर्गों का मेरे दिल से अभी तक डर नहीं जाता
कि जब तक जागती रहती है माँ मैं घर नहीं जाता

#मुनव्वर_राणा #MothersDay

कुछ नहीं होगा तो आँचल में छुपा लेगी मुझे माँ…

कुछ नहीं होगा तो आँचल में छुपा लेगी मुझे
माँ कभी सर पे खुली छत नहीं रहने देगी

#मुनव्वर_राणा #MothersDay

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा…

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

#मुनव्वर_राणा #MothersDay

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ…

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

#मुनव्वर_राणा #MothersDay

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती बस एक माँ…

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

#मुनव्वर_राणा #MothersDay