Ishq

इश्क़ करोगे तो कमाओगे नाम
तोहमतें बटती नहीं खैरात में॥

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Mujhe aai na jag se laaj

मुझे आई ना जग से लाज
मैं इतना ज़ोर से नाची आज,
के घुंघरू टूट गए 

कुछ मुझ पे नया जोबन भी था
कुछ प्यार का पागलपन भी था
कभी पलक पलक मेरी तीर बनी
एक जुल्फ मेरी ज़ंजीर बनी
लिया दिल साजन का जीत
वो छेड़े पायलिया ने गीत,
के घुंघरू टूट गए

मैं बसी थी जिसके सपनों में
वो गिनेगा अब मुझे अपनों में
कहती है मेरी हर अंगड़ाई
मैं पिया की नींद चुरा लायी
मैं बन के गई थी चोर
मगर मेरी पायल थी कमज़ोर,
के घुंघरू टूट गए

धरती पे ना मेरे पैर लगे
बिन पिया मुझे सब गैर लगे
मुझे अंग मिले अरमानों के
मुझे पंख मिले परवानों के
जब मिला पिया का गाँव
तो ऐसा लचका मेरा पांव
के घुंघरू टूट गए

Qateel shifai

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Jab bhi chahe ek nai surat bana lety hai log

जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग

मिल भी लेते हैं गले से अपने मतलब के लिए
आ पड़े मुश्किल तो नज़रें भी चुरा लेते हैं लोग

है बजा उनकी शिकायत लेकिन इसका क्या इलाज
बिजलियाँ खुद अपने गुलशन पर गिरा लेते हैं लोग

हो खुशी भी उनको हासिल ये ज़रूरी तो नहीं
गम छुपाने के लिए भी मुस्कुरा लेते हैं लोग

ये भी देखा है कि जब आ जाये गैरत का मुकाम
अपनी सूली अपने काँधे पर उठा लेते हैं लोग

Qateel shifai

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Saya

सूरज ढला तो
कद से ऊँचे हो गए साये,
कभी पैरों से रौंदी थी,
यहीं परछाइयां हमने..

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Zindgi

तंग आ चुके हैं कशमकशे-जिन्दगी से हम
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बेदिली से हम

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Jawani

लोग हर मोड़ पे रुक रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं
मोड़  होता हैं जवानी का संभलने  के लिए
और सब लोग यही आ के फिसलते क्यों हैं

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Zindgi

हो सके तो मुड़ के देख लेना, जाते जाते,
तेरे आने के भ्रम में,ज़िन्दगी गुज़ार लेंगे…

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Tasavvur

जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए॥

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Tumhe yaad ho ke na yaad ho

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो 
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो के न याद हो

वो नये गिले वो शिकायतें वो मज़े-मज़े की हिकायतें 
वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो के न याद हो

कोई बात ऐसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी 
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो के न याद हो

सुनो ज़िक्र है कई साल का, कोई वादा मुझ से था आप का
वो निबाहने का तो ज़िक्र क्या, तुम्हें याद हो के न याद हो

कभी हम में तुम में भी चाह थी, कभी हम से तुम से भी राह थी 
कभी हम भी तुम भी थे आश्ना, तुम्हें याद हो के न याद हो

हुए इत्तेफ़ाक़ से गर बहम, वो वफ़ा जताने को दम-ब-दम 
गिला-ए-मलामत-ए-अर्क़बा, तुम्हें याद हो के न याद हो

वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे पेश्तर, वो करम के था मेरे हाल पर 
मुझे सब है याद ज़रा-ज़रा, तुम्हें याद हो के न याद हो

कभी बैठे सब में जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तगू 
वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो के न याद हो

किया बात मैं ने वो कोठे की, मेरे दिल से साफ़ उतर गई 
तो कहा के जाने मेरी बाला, तुम्हें याद हो के न याद हो

वो बिगड़ना वस्ल की रात का, वो न मानना किसी बात का 
वो नहीं-नहीं की हर आन अदा, तुम्हें याद हो के न याद हो

जिसे आप गिनते थे आशना जिसे आप कहते थे बावफ़ा 
मैं वही हूँ “मोमिन”-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो के न याद हो

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Dil

हाले-दिल यार को लिखूँ क्यूँकर,
हाथ दिल से जुदा नहीं होता । 

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