Sarakti jaye hai rukh se nakab

सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता 
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता-आहिस्ता 

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा 
हया यकलख़त आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता 

शब-ए-फ़ुर्कत का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो 
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता 

सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना 
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता 

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतना 
इधर तो जल्दी जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता 

वो बेदर्दी से सर काटे ‘अमीर’ और मैं कहूँ उन से 
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता

Amir minai

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Ab ke rut badli to

अब के रुत बदली तो ख़ुशबू का सफ़र देखेगा कौन 
ज़ख़्म फूलों की तरह महकेंगे पर देखेगा कौन 

देखना सब रक़्स-ए-बिस्मल में मगन हो जाएँगे 
जिस तरफ़ से तीर आयेगा उधर देखेगा कौन 

वो हवस हो या वफ़ा हो बात महरूमी की है 
लोग तो फल-फूल देखेंगे शजर देखेगा कौन 

हम चिराग़-ए-शब ही जब ठहरे तो फिर क्या सोचना 
रात थी किस का मुक़द्दर और सहर देखेगा कौन 

आ फ़सील-ए-शहर से देखें ग़नीम-ए-शहर को 
शहर जलता हो तो तुझ को बाम पर देखेगा कौन

Ahmad faraz

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Faraz ab koi souda koi junun bhi nahi

“फ़राज़ अब कोई सौदा कोई जुनूँ भी नहीं 
मगर क़रार से दिन कट रहे हों यूँ भी नहीं 

लब-ओ-दहन भी मिला गुफ़्तगू का फ़न भी मिला 
मगर जो दिल पे गुज़रती है कह सकूँ भी नहीं 

मेरी ज़ुबाँ की लुक्नत से बदगुमाँ न हो 
जो तू कहे तो तुझे उम्र भर मिलूँ भी नहीं 

“फ़राज़” जैसे कोई दिया तुर्बत-ए-हवा चाहे है 
तू पास आये तो मुमकिन है मैं रहूँ भी नहीं
Ahmad faraz

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Judai

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ

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Achha tha agar zakhm na bharte koi din our

अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और
उस कू-ए-मलामत में गुजरते कोई दिन और

रातों के तेरी यादों के खुर्शीद उभरते
आँखों में सितारे से उभरते कोई दिन और

हमने तुझे देखा तो किसी और को ना देखा
ए काश तेरे बाद गुजरते कोई दिन और

राहत थी बहुत रंज में हम गमतलबों को
तुम और बिगड़ते तो संवरते कोई दिन और

गो तर्के-तअल्लुक था मगर जाँ पे बनी थी
मरते जो तुझे याद ना करते कोई दिन और

उस शहरे-तमन्ना से फ़राज़ आये ही क्यों थे
ये हाल अगर था तो ठहरते कोई दिन और

Ahmad faraz

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Pyas

तू किसी और के लिए होगा समन्दर-ए-इश्क़ फ़राज़
हम तो रोज़ तेरे साहिल से प्यासे गुज़र जाते हैं

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Bewafai

अपनी तबाहियों का मुझे कोई गम नहीं
तुमने किसी के साथ मुहब्बत निभा तो दी

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Choudhvi raat ke is chhand tale

चौदहवीं रात के इस चाँद तले
सुरमई रात में साहिल के क़रीब 
दूधिया जोड़े में आ जाए जो तू 
ईसा के हाथ से गिर जाए सलीब 
बुद्ध का ध्यान चटख जाए ,कसम से 
तुझ को बर्दाश्त न कर पाए खुदा भी 

दूधिया जोड़े में आ जाए जो तू 
चौदहवीं रात के इस चाँद तले !

Gulzar

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Sehra

सहरा-पसंद हो के सिमटने लगा हूँ मैं
अँदर से लग रहा हूँ कि बँटने लगा हूँ मैं

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Bekhudi kahan le gai humko

बेखुदी कहाँ ले गई हमको,

देर से इंतज़ार है अपना

रोते फिरते हैं सारी सारी रात,

अब यही रोज़गार है अपना

दे के दिल हम जो गए मजबूर,

इस मे क्या इख्तियार है अपना

कुछ नही हम मिसाल-ऐ- उनका लेक

शहर शहर इश्तिहार है अपना

जिसको तुम आसमान कहते हो,

सो दिलो का गुबार है अपना

Mir taqi mir

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